Thursday, February 14, 2013

 
O MY DEAR MAHARAJJI (SHRI KRIPALUJI MAHARAJ),YOU ARE THE PROTECTOR OF HUMBLE SOULS BUT I AM AN INCARNATION OF VANITY.PLEASE DO SOMETHING FOR ME SO THAT I MAY BECOME HUMBLE.
O MY DEAR MAHARAJJI (SHRI KRIPALUJI MAHARAJ),YOU ARE THE PROTECTOR OF HUMBLE SOULS BUT I AM AN INCARNATION OF VANITY.PLEASE DO SOMETHING FOR ME SO THAT I MAY BECOME HUMBLE.
 
 
The lover, the beloved and divine love! There are three entities: the lover, the Beloved and love. That which unites the lover and the Beloved is called love.
-----Hamare pyare pyare shri maharaj ji.

 
तेरा मेरा प्यार अमर गोविन्द राधे,
स्वार्थी संसार से तू पीछा छुड़ा दे.

तेरे मेरे प्यार को जो गोविन्द राधे,
संसारी रोके वाये अंगूठा दिखा दे.
...

तेरा मेरा प्यार सच्चा गोविन्द राधे,
एक बार प्यारी कह के मोहि बुला दे .

- Jagadguru Shree Kripaluji Maharaj.
Happy Gopi Prem Diwas.
तेरा  मेरा  प्यार  अमर गोविन्द राधे,
स्वार्थी  संसार  से  तू  पीछा   छुड़ा  दे.
 
तेरे  मेरे  प्यार  को  जो  गोविन्द  राधे, 
संसारी  रोके  वाये  अंगूठा  दिखा  दे.

तेरा  मेरा  प्यार  सच्चा  गोविन्द  राधे, 
एक  बार  प्यारी  कह  के  मोहि  बुला  दे .

- Jagadguru Shree Kripaluji Maharaj.
Happy Gopi Prem Diwas.

 

Wednesday, February 13, 2013

भगवदप्राप्ति महापुरुष के बताये मार्ग पर चलने से होगी, न की उनकी नकल करने से।
-----श्री महाराजजी।
भगवदप्राप्ति महापुरुष के बताये मार्ग पर चलने से होगी, न की उनकी नकल करने से। 
-----श्री महाराजजी।

 
 

जिन्दगी उसी की महान है, जो गुरु के सुख में बीतती रहे।
------श्री महाराजजी।
जिन्दगी उसी की महान है, जो गुरु के सुख में बीतती रहे।
------श्री महाराजजी।

 

मन हरि में तन जगत में, कर्मयोग येहि जान।
तन हरि में मन जगत में, यह महान अज्ञान।।

जिसका मन सदा श्यामसुंदर में ही अनुरक्त रहे,और शरीर से संसार का कार्य करे, वह कर्मयोग है। किन्तु जिसका मन संसार में अनुरक्त रहे ,एवं शरीर से भगवद्भक्ति करे ,वह पराकाष्ठा का मूर्ख है।
-------भक्ति शतक.
-----जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज के श्रीमुख से.........
मन हरि में तन जगत में, कर्मयोग येहि जान।
 तन हरि में मन जगत में, यह महान अज्ञान।।

 जिसका मन सदा श्यामसुंदर में ही अनुरक्त रहे,और शरीर से संसार का कार्य करे, वह कर्मयोग है। किन्तु जिसका मन संसार में अनुरक्त रहे ,एवं शरीर से भगवद्भक्ति करे ,वह पराकाष्ठा का मूर्ख है।
-------भक्ति शतक.
-----जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज के श्रीमुख से.........

 
 

लोगों को दूसरों की तो बड़ी भारी फिक्र है, परन्तु हमारा स्वयं का क्या होगा ,इसकी फिक्र नहीं है। आश्चर्य: अपनी फिक्र क्यो नहीं करते हो।
-----श्री कृपालुजी महाराज.
लोगों को दूसरों की तो बड़ी भारी फिक्र है, परन्तु हमारा स्वयं का क्या होगा ,इसकी फिक्र नहीं है। आश्चर्य: अपनी फिक्र क्यो नहीं करते हो।
-----श्री कृपालुजी महाराज.

 
 

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...