Friday, February 15, 2013

Shri Radha is that Superior most personality for whom Vedas proclaim that they - 'The Vedas' cannot comprehend Her. Her foot dust is adored by the Supreme Lord Shri Krishn. The sovereign divine ladies Uma, Rama and Brahmani are the embodiment of just one power of Shri Radha. We offer millions of obeisances to that Supreme power known as Shri Radha.
 
चितवत चित कर्षत जिते, चित समाधि महं लाय।
औरन की का बात कह, शिव गोपी तनु पाय।।

भावार्थ: श्यामसुंदर की एक रसमयी दृष्टि से बड़े-बड़े परमहंस समाधि भुला देते हैं। और परमहंसों की तो चर्चा ही क्या है- सायं भगवान शंकर तक ने गोपी शरीर धारण किया।
 
जाको आत्माराम कहि,वेद ऋचान बखान।
सोई गोपिन सँग रास कर,गोपिहु वेद ऋचान।।

भावार्थ: ब्रह्म श्रीकृष्ण को वेदों की ऋचाएँ बार-बार आत्माराम,आत्मरति,आत्मक्रीड़ कह कर निरूपित करती हैं।वही ब्रह्म बृज में गोपियों के साथ महारास रूपी रमण करता है। और आश्चर्य यह है की वे वेद की ऋचाएँ रास में सम्मिलित हैं।

भक्ति शतक ग्रंथ से........जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाप्रभु द्वारा रचित।
चितवत चित कर्षत जिते, चित समाधि महं लाय।
औरन की का बात कह, शिव गोपी तनु पाय।।

भावार्थ: श्यामसुंदर की एक रसमयी दृष्टि से बड़े-बड़े परमहंस समाधि भुला देते हैं। और परमहंसों की तो चर्चा ही क्या है- सायं भगवान शंकर तक ने गोपी शरीर धारण किया।

जाको आत्माराम कहि,वेद ऋचान बखान।
सोई गोपिन सँग रास कर,गोपिहु वेद ऋचान।।

भावार्थ: ब्रह्म श्रीकृष्ण को वेदों की ऋचाएँ बार-बार आत्माराम,आत्मरति,आत्मक्रीड़ कह कर निरूपित करती हैं।वही ब्रह्म बृज में गोपियों के साथ महारास रूपी रमण करता है। और आश्चर्य यह है की वे वेद की ऋचाएँ रास में सम्मिलित हैं।

भक्ति शतक ग्रंथ से........जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाप्रभु द्वारा रचित।
 
 
हरि गुरु एक ही हैं गोविंद राधे |
दोनों को प्रणाम एक साथ बता दे ||

हरि के अधीन गुरु गोविंद राधे |
गुरु के अधीन हरि भेद ना बता दे ||
...

स्वार्थ की दृष्टि ते गोविंद राधे |
गुरु को बड़ा ही कह रसिक बता दे ||

गुरु प्रेमदान करे गोविंद राधे |
हरि प्रेम ना दे यह भेद बता दे ||

राधा गोविन्द गीत
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज.
हरि गुरु एक ही हैं गोविंद राधे |
दोनों को प्रणाम एक साथ बता दे ||

हरि के अधीन गुरु गोविंद राधे |
गुरु के अधीन हरि भेद ना बता दे ||

स्वार्थ की दृष्टि ते गोविंद राधे |
गुरु को बड़ा ही कह रसिक बता दे ||

गुरु प्रेमदान करे गोविंद राधे |
हरि प्रेम ना दे यह भेद बता दे ||

    राधा गोविन्द गीत
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
 
हरि गुरु एक ही हैं गोविंद राधे |
दोनों को प्रणाम एक साथ बता दे ||

हरि के अधीन गुरु गोविंद राधे |
गुरु के अधीन हरि भेद ना बता दे ||
...
स्वार्थ की दृष्टि ते गोविंद राधे |
गुरु को बड़ा ही कह रसिक बता दे ||

गुरु प्रेमदान करे गोविंद राधे |
हरि प्रेम ना दे यह भेद बता दे ||

राधा गोविन्द गीत
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज.
हरि गुरु एक ही हैं गोविंद राधे |
दोनों को प्रणाम एक साथ बता दे ||

हरि के अधीन गुरु गोविंद राधे |
गुरु के अधीन हरि भेद ना बता दे ||

स्वार्थ की दृष्टि ते गोविंद राधे |
गुरु को बड़ा ही कह रसिक बता दे ||

गुरु प्रेमदान करे गोविंद राधे |
हरि प्रेम ना दे यह भेद बता दे ||

    राधा गोविन्द गीत
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
 
मन को भरोसा दिलाओ आठु यामा। तेरे तो हैं परम हितेषी श्याम श्यामा।।

और द्वार जाओ न,अनन्य बनो बामा।त्रिगुण ,त्रिताप,त्रिकर्म,काटें श्यामा।।

भोरे बनि जाओ क्योंकि भोरी भारी श्यामा। भोरी भारी को प्रिय भोरा उरधामा।।
...

हरि-गुरु ते न कछु माँगो ब्रजबामा। दोनों ते सदा करो प्रेम निष्कामा।।

माँगना हो तो माँगो सेवा श्याम श्यामा। सेवा हित पुनि माँगो प्रेम निष्कामा।।

जल बिनु मीन ज्यों विकल कह बामा। वैसे मन व्याकुल हो जाये बिनु श्यामा।।

रहा नहीं जाये जब मिले बिनु श्यामा। तब जानो प्रेमबीज़,जामा उरधामा।।

--------जगद्गुरुत्तम श्री कृपालुजी महाराज द्वारा रचित।
मन को भरोसा दिलाओ आठु यामा। तेरे तो हैं परम हितेषी श्याम श्यामा।।

 और द्वार जाओ न,अनन्य बनो बामा।त्रिगुण ,त्रिताप,त्रिकर्म,काटें श्यामा।।

 भोरे बनि जाओ क्योंकि भोरी भारी श्यामा। भोरी भारी को प्रिय भोरा उरधामा।।

 हरि-गुरु ते न कछु माँगो ब्रजबामा। दोनों ते सदा करो प्रेम निष्कामा।।

 माँगना हो तो माँगो सेवा श्याम श्यामा। सेवा हित पुनि माँगो प्रेम निष्कामा।।

 जल बिनु मीन ज्यों विकल कह बामा। वैसे मन व्याकुल हो जाये बिनु श्यामा।।

 रहा नहीं जाये जब मिले बिनु श्यामा। तब जानो प्रेमबीज़,जामा उरधामा।।

 --------जगद्गुरुत्तम श्री कृपालुजी महाराज द्वारा रचित।

 

कर्म है इनकी निष्काम सेवा, धर्म है उनकी इच्छा में इच्छा,
सौंप दो इनके हाथो में डोरी, ये कृपालु है तंगदिल नहीं है .
कर्म है इनकी निष्काम सेवा, धर्म है उनकी इच्छा में इच्छा,
सौंप दो इनके हाथो में डोरी, ये कृपालु है तंगदिल नहीं है .


"Unless Shree Krishna Himself comes and wipes your tears with His own Pītāṁbar, consider your sādhanā as hypocritical”

- Jagadguru Shree Kripaluji Maharaj.

"Unless Shree Krishna Himself comes and wipes your tears with His own Pītāṁbar, consider your sādhanā as hypocritical”

- Jagadguru Shree Kripaluji Maharaj

 

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...