Sunday, February 17, 2013

सदा यही सोचो कि मेरे जीवन का एक क्षण भी बिना सेवा के नष्ट ना हो !
------श्री महाराज जी।
सदा यही सोचो कि मेरे जीवन का एक क्षण भी बिना सेवा के नष्ट ना हो !
------श्री महाराज जी।

Saturday, February 16, 2013

"हमसे तो कुछ होता नहीं। यह जो बैठे-बैठे निराशा का चिन्तन करते हो, यही सर्वनाश करता है। निराशा गुरु की शक्ति का अपमान है। निराशा तब होती है जब शरणागत यह सोचता है कि हमारा गुरु हमारी रक्षा नहीं कर रहा है न भविष्य में करेगा। वह रक्षा करने में असमर्थ है। स्वयं से पूछो क्या ऐसा है?"
"हमसे तो कुछ होता नहीं। यह जो बैठे-बैठे निराशा का चिन्तन करते हो, यही सर्वनाश करता है। निराशा गुरु की शक्ति का अपमान है। निराशा तब होती है जब शरणागत यह सोचता है कि हमारा गुरु हमारी रक्षा नहीं कर रहा है न भविष्य में करेगा। वह रक्षा करने में असमर्थ है। स्वयं से पूछो क्या ऐसा है?"

 

One should not harbour resentment even towards someone who is actually condemnable, because Shri Krishn resides even in his heart.
........SHRI MAHARAJJI.
One should not harbour resentment even towards someone who is actually condemnable, because Shri Krishn resides even in his heart.
........SHRI MAHARAJJI.

 
 

It is important to understand the fact that nobody can understand Krishna by his own material intellect. When you receive His Grace, only then with that Divine intellect you can understand Him.
........SHRI MAHARAJJI.

 



एक साधक का प्रश्न : जीव का कर्तव्य क्या है ?

श्री महाराजजी द्वारा उत्तर : सभी विवेकी जीवों को यही निश्चय करना है कि हमारा लक्ष्य , हमारे सेव्य श्रीकृष्ण की सेवा ही है ! वह सेवा भी उनकी इच्छानुसार हो ! अपनी इच्छानुसार सेवा , सेवा नहीं है ! वह तो अपने सुख वाली कही जायेगी ! यह सेवाधिकार स्वाभाविक है !

दासभूतो हरेरेव नान्यस्यैव कदाचन

अर्थात समस्त जीवमात्र , अपने अंशी ब्रहम श्रीकृष्ण के नित्य दास हैं ! यह दासत्व ही उनका स्व स्वरूप है ! जिस प्रकार वृक्ष के अंश स्वरूप मूल , शाखा , उप - शाखा , पत्रादि अपने अंशी वृक्ष की नित्य सेवा करते हैं ! अर्थात वृक्ष की जड़े पृथ्वी से तत्व निलाल कर वृक्ष को देती हैं ; शाखा , पत्ते आदि भी सूर्यपात , वायु आदि के द्वारा सेवा करते हैं ! इसी प्रकार जीवों को भी अपने अंशी श्रीकृष्ण की सेवा करनी है ! यही ज्ञातव्य है , यही कर्तव्य है !
एक साधक का प्रश्न : जीव का कर्तव्य क्या है ? 

श्री महाराजजी द्वारा उत्तर : सभी विवेकी जीवों को यही निश्चय करना है कि हमारा लक्ष्य , हमारे सेव्य श्रीकृष्ण की सेवा ही है ! वह सेवा भी उनकी इक्छानुसार हो ! अपनी इक्छानुसार सेवा , सेवा नहीं है ! वह तो अपने सुख वाली कही जायेगी ! यह सेवाधिकार स्वाभाविक है ! 

दासभूतो हरेरेव नान्यस्यैव कदाचन 

अर्थात समस्त जीवमात्र , अपने अंशी ब्रहम श्रीकृष्ण के नित्य दास हैं ! यह दासत्व ही उनका स्व स्वरूप है ! जिस प्रकार वृक्ष के अंश स्वरूप मूल , शाखा , उप - शाखा , पत्रादि अपने अंशी वृक्ष की नित्य सेवा करते हैं ! अर्थात वृक्ष की जड़े पृथ्वी से तत्व निलाल कर वृक्ष को देती हैं ; शाखा , पत्ते आदि भी सूर्यपात , वायु आदि के द्वारा सेवा करते हैं ! इसी प्रकार जीवों को भी अपने अंशी श्रीकृष्ण की सेवा करनी है ! यही ज्ञातव्य है , यही कर्तव्य है !


Friday, February 15, 2013

None of your worldly relatives will inspire you to move towards God. They all have their own selfish motives. It is only your Guru, who will show you the right path and guide you. He will make you realize that you are someone beyond this body. You are a soul, and you had innumerable mothers, fathers, sons and spouses, in your past endless lifetimes. You were born in all the 8.4 million species of life countless times and you surrendered to everyone for getting happiness. But all deceived you. How could have they given you happiness? They were all beggars themselves!
None of your worldly relatives will inspire you to move towards God. They all have their own selfish motives. It is only your Guru, who will show you the right path and guide you. He will make you realize that you are someone beyond this body. You are a soul, and you had innumerable mothers, fathers, sons and spouses, in your past endless lifetimes. You were born in all the 8.4 million species of life countless times and you surrendered to everyone for getting happiness. But all deceived you. How could have they given you happiness? They were all beggars themselves!

 
 
एक क़ानून है भगवान का कि भगवान डाइरैक्ट(direct) जीव को कुछ नहीं देते ,गुरु के द्वारा ही दिलवाते हैं। वे कहते हैं में डाइरैक्ट(direct) कुछ नहीं दूंगा, केयरऑफ(care of) महापुरुष तुमको सब कुछ मिलेगा 'तत्वज्ञान से लेकर भगवतप्राप्ति तक'।
एक क़ानून है भगवान का कि भगवान डाइरैक्ट(direct) जीव को कुछ नहीं देते ,गुरु के द्वारा ही दिलवाते हैं। वे कहते हैं में डाइरैक्ट(direct) कुछ नहीं दूंगा, केयरऑफ(care of) महापुरुष तुमको सब कुछ मिलेगा 'तत्वज्ञान से लेकर भगवतप्राप्ति तक'।
 
     

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...