Sunday, February 17, 2013

गुरु में हरिबुद्धि रखो सदा गुरुधामा |
नरबुद्धि आने नहिं पाये आठु यामा ||

गुरु के प्रति सदैव भगवद् बुद्धि ही रखो | निरन्तर यह सावधानी रखो कि उनके प्रति मनुष्य की बुद्धि न आने पाये | तभी गुरुधाम में वास करना सफल होगा |

...
गुरु की हो भक्ति वैसी जैसी श्याम श्यामा |
या करो गुरु की ही भक्ति आठु यामा ||

अपने इष्ट श्यामा-श्याम एवं गुरु की एक जैसी भक्ति ही करनी चाहिये अथवा केवल गुरु की ही भक्ति करें | यह भक्ति निरन्तर बनी रहे इस का ध्यान रखना है |

.............. श्यामा श्याम गीत ( जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज ).....
गुरु में हरिबुद्धि रखो सदा गुरुधामा |
नरबुद्धि आने नहिं पाये आठु यामा ||

गुरु के प्रति सदैव भगवद् बुद्धि ही रखो | निरन्तर यह सावधानी रखो कि उनके प्रति मनुष्य की बुद्धि न आने पाये | तभी गुरुधाम में वास करना सफल होगा |

गुरु की हो भक्ति वैसी जैसी श्याम श्यामा |
या करो गुरु की ही भक्ति आठु यामा ||

अपने इष्ट श्यामा-श्याम एवं गुरु की एक जैसी भक्ति ही करनी चाहिये अथवा केवल गुरु की ही भक्ति करें | यह भक्ति निरन्तर बनी रहे इस का ध्यान रखना है | 


.............. श्यामा श्याम गीत ( जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज )...............

 

The Vedanta declares that even though attempts are made to prove God’s existence by means of logical reasoning, the existence of God is not a subject of logic. The surest proof of the existence of God is scriptural evidence. We must believe in Him because it is written in the Vedas, as they are divine in origin. If someone has doubts, he should engage in the spiritual practice or sadhana prescribed in the Vedas and experience for himself whether God is a reality or not.
------SHRI MAHARAJ JI.
The Vedanta declares that even though attempts are made to prove God’s existence by means of logical reasoning, the existence of God is not a subject of logic. The surest proof of the existence of God is scriptural evidence. We must believe in Him because it is written in the Vedas, as they are divine in origin. If someone has doubts, he should engage in the spiritual practice or sadhana prescribed in the Vedas and experience for himself whether God is a reality or not.
------SHRI MAHARAJ JI.

मन एक समय में एक ही काम कर सकता है । मन के सयोंग के बिना कोई काम नहीं हो सकता । किसी भी काम को मन लगाकर तो करना चाहिये किंतु अटैचमेंट भगवान में ही रखना चाहिये ।
-----जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज.
मन एक समय में एक ही काम कर सकता है । मन के सयोंग के बिना कोई काम नहीं हो सकता । किसी भी काम को मन लगाकर तो करना चाहिये किंतु अटैचमेंट भगवान में ही रखना चाहिये । 
-----जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज.

 

परदोष-चिन्तन करना ही स्वयं के सदोष होने का पक्का प्रमाण है।

परदोष दर्शन साधना में सबसे बडी बाधा है क्योंकि परदोष दर्शन से दो हानि हैं- एक तो यह कि परदोष दर्शन काल में स्वाभाविक रुप में स्वाभिमान ब्रुद्धि होति है, जो की साधक के लिये तत्क्ष्यण ही पतन का कारण बन जाती है । दुसरे यह कि परदोष चिन्तन करते हुए शनैः शनैः बुद्धि भी दिषमय हो जाती है, जिसके परिणामस्वरुप उन्हीं सदोष विषय में ही प्रव्रुत्ति होने लगती है, अतएव सदोष कार्य होने लगता है॥

-जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज.
परदोष-चिन्तन करना ही स्वयं के सदोष होने का पक्का प्रमाण है।

परदोष दर्शन साधना में सबसे बडी बाधा है क्योंकि परदोष दर्शन से दो हानि हैं- एक तो यह कि परदोष दर्शन काल में स्वाभाविक रुप में स्वाभिमान ब्रुद्धि होति है, जो की साधक के लिये तत्क्ष्यण ही पतन का कारण बन जाती है । दुसरे यह कि परदोष चिन्तन करते हुए शनैः शनैः बुद्धि भी दिषमय हो जाती है, जिसके परिणामस्वरुप उन्हीं सदोष विषय में ही प्रव्रुत्ति होने लगती है, अतएव सदोष कार्य होने लगता है॥

-जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज

 

सदा यही सोचो कि मेरे जीवन का एक क्षण भी बिना सेवा के नष्ट ना हो !
------श्री महाराज जी।
सदा यही सोचो कि मेरे जीवन का एक क्षण भी बिना सेवा के नष्ट ना हो !
------श्री महाराज जी।

Saturday, February 16, 2013

"हमसे तो कुछ होता नहीं। यह जो बैठे-बैठे निराशा का चिन्तन करते हो, यही सर्वनाश करता है। निराशा गुरु की शक्ति का अपमान है। निराशा तब होती है जब शरणागत यह सोचता है कि हमारा गुरु हमारी रक्षा नहीं कर रहा है न भविष्य में करेगा। वह रक्षा करने में असमर्थ है। स्वयं से पूछो क्या ऐसा है?"
"हमसे तो कुछ होता नहीं। यह जो बैठे-बैठे निराशा का चिन्तन करते हो, यही सर्वनाश करता है। निराशा गुरु की शक्ति का अपमान है। निराशा तब होती है जब शरणागत यह सोचता है कि हमारा गुरु हमारी रक्षा नहीं कर रहा है न भविष्य में करेगा। वह रक्षा करने में असमर्थ है। स्वयं से पूछो क्या ऐसा है?"

 

One should not harbour resentment even towards someone who is actually condemnable, because Shri Krishn resides even in his heart.
........SHRI MAHARAJJI.
One should not harbour resentment even towards someone who is actually condemnable, because Shri Krishn resides even in his heart.
........SHRI MAHARAJJI.

 
 

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...