Sunday, February 17, 2013

Devotion to Shri Krishna must be exclusive. The attachment of the mind must be reserved for God while worldly duties are being performed externally. The performance of any work requires involvement of the mind, not attachment of the mind.
Devotion to Shri Krishna must be exclusive. The attachment of the mind must be reserved for God while worldly duties are being performed externally. The performance of any work requires involvement of the mind, not attachment of the mind.

 
महाराजजी (जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाप्रभु) के मुखारविंद से:-

साधना में सबसे बड़ा अवरोधक है अहंकार ,आपस में ईर्ष्या, द्वेष जो हमको भगवदीय मार्ग में आगे नहीं बढ्ने देता। हमें तो विनम्रता, दीनता, सहिष्णुता का पाठ सदा याद रखना चाहिये। ये गुण जिस दिन आप में आ जायेंगे उस दिन आपका अंत:करण शुद्ध होने लगेगा और गुरु कृपा से हरि गुरु आपके अंत:करण में बैठ कर आपका योगक्षेम वहन करने लगेंगे।

श्री महाराजजी (जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाप्रभु) के मुखारविंद से:- 

साधना में सबसे बड़ा अवरोधक है अहंकार ,आपस में ईर्ष्या, द्वेष जो हमको भगवदीय मार्ग में आगे नहीं बढ्ने देता। हमें तो विनम्रता, दीनता, सहिष्णुता का पाठ सदा याद रखना चाहिये। ये गुण जिस दिन आप में आ जायेंगे उस दिन आपका अंत:करण शुद्ध होने लगेगा और गुरु कृपा से हरि गुरु आपके अंत:करण में बैठ कर आपका योगक्षेम वहन करने लगेंगे।

 

Kishori Ji! Although I am known as Your devotee, yet I have great love for only worldly wealth and family members. Shri ‘Kripalu’ Ji says, “Bless me also with Your grace and gratify me by giving me Your selfless love.”
Kishori Ji! Although I am known as Your devotee, yet I have great love for only worldly wealth and family members. Shri ‘Kripalu’ Ji says, “Bless me also with Your grace and gratify me by giving me Your selfless love.”

 
 
 



गुरु में हरिबुद्धि रखो सदा गुरुधामा |
नरबुद्धि आने नहिं पाये आठु यामा ||

गुरु के प्रति सदैव भगवद् बुद्धि ही रखो | निरन्तर यह सावधानी रखो कि उनके प्रति मनुष्य की बुद्धि न आने पाये | तभी गुरुधाम में वास करना सफल होगा |

...
गुरु की हो भक्ति वैसी जैसी श्याम श्यामा |
या करो गुरु की ही भक्ति आठु यामा ||

अपने इष्ट श्यामा-श्याम एवं गुरु की एक जैसी भक्ति ही करनी चाहिये अथवा केवल गुरु की ही भक्ति करें | यह भक्ति निरन्तर बनी रहे इस का ध्यान रखना है |

.............. श्यामा श्याम गीत ( जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज ).....
गुरु में हरिबुद्धि रखो सदा गुरुधामा |
नरबुद्धि आने नहिं पाये आठु यामा ||

गुरु के प्रति सदैव भगवद् बुद्धि ही रखो | निरन्तर यह सावधानी रखो कि उनके प्रति मनुष्य की बुद्धि न आने पाये | तभी गुरुधाम में वास करना सफल होगा |

गुरु की हो भक्ति वैसी जैसी श्याम श्यामा |
या करो गुरु की ही भक्ति आठु यामा ||

अपने इष्ट श्यामा-श्याम एवं गुरु की एक जैसी भक्ति ही करनी चाहिये अथवा केवल गुरु की ही भक्ति करें | यह भक्ति निरन्तर बनी रहे इस का ध्यान रखना है | 


.............. श्यामा श्याम गीत ( जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज )...............

 

The Vedanta declares that even though attempts are made to prove God’s existence by means of logical reasoning, the existence of God is not a subject of logic. The surest proof of the existence of God is scriptural evidence. We must believe in Him because it is written in the Vedas, as they are divine in origin. If someone has doubts, he should engage in the spiritual practice or sadhana prescribed in the Vedas and experience for himself whether God is a reality or not.
------SHRI MAHARAJ JI.
The Vedanta declares that even though attempts are made to prove God’s existence by means of logical reasoning, the existence of God is not a subject of logic. The surest proof of the existence of God is scriptural evidence. We must believe in Him because it is written in the Vedas, as they are divine in origin. If someone has doubts, he should engage in the spiritual practice or sadhana prescribed in the Vedas and experience for himself whether God is a reality or not.
------SHRI MAHARAJ JI.

मन एक समय में एक ही काम कर सकता है । मन के सयोंग के बिना कोई काम नहीं हो सकता । किसी भी काम को मन लगाकर तो करना चाहिये किंतु अटैचमेंट भगवान में ही रखना चाहिये ।
-----जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज.
मन एक समय में एक ही काम कर सकता है । मन के सयोंग के बिना कोई काम नहीं हो सकता । किसी भी काम को मन लगाकर तो करना चाहिये किंतु अटैचमेंट भगवान में ही रखना चाहिये । 
-----जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज.

 

परदोष-चिन्तन करना ही स्वयं के सदोष होने का पक्का प्रमाण है।

परदोष दर्शन साधना में सबसे बडी बाधा है क्योंकि परदोष दर्शन से दो हानि हैं- एक तो यह कि परदोष दर्शन काल में स्वाभाविक रुप में स्वाभिमान ब्रुद्धि होति है, जो की साधक के लिये तत्क्ष्यण ही पतन का कारण बन जाती है । दुसरे यह कि परदोष चिन्तन करते हुए शनैः शनैः बुद्धि भी दिषमय हो जाती है, जिसके परिणामस्वरुप उन्हीं सदोष विषय में ही प्रव्रुत्ति होने लगती है, अतएव सदोष कार्य होने लगता है॥

-जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज.
परदोष-चिन्तन करना ही स्वयं के सदोष होने का पक्का प्रमाण है।

परदोष दर्शन साधना में सबसे बडी बाधा है क्योंकि परदोष दर्शन से दो हानि हैं- एक तो यह कि परदोष दर्शन काल में स्वाभाविक रुप में स्वाभिमान ब्रुद्धि होति है, जो की साधक के लिये तत्क्ष्यण ही पतन का कारण बन जाती है । दुसरे यह कि परदोष चिन्तन करते हुए शनैः शनैः बुद्धि भी दिषमय हो जाती है, जिसके परिणामस्वरुप उन्हीं सदोष विषय में ही प्रव्रुत्ति होने लगती है, अतएव सदोष कार्य होने लगता है॥

-जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज

 

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...