Thursday, February 21, 2013

जब किसी चीज को धारण करते समय हमको सुख मिलेगा और उसके न मिलने पर दुःख मिलेगा , तब धारण करना माना जायेगा ! धारण करना केवल मन से है इन्द्रियों से नहीं ! सुख के साधन से सुख नहीं होता है क्योंकि साधन अनित्य है ! श्रीकृष्ण ही भूमा आनंद है उनसे प्रेम करोगे तो आनंद प्राप्ति होगी !
"""*जगद्गुरुत्तम श्री कृपालु महाप्रभु*"""
जब किसी चीज को धारण करते समय हमको सुख मिलेगा और उसके न मिलने पर दुःख मिलेगा , तब धारण करना माना जायेगा ! धारण करना केवल मन से है इन्द्रियों से नहीं ! सुख के साधन से सुख नहीं होता है क्योंकि साधन अनित्य है ! श्रीकृष्ण ही भूमा आनंद है उनसे प्रेम करोगे तो आनंद प्राप्ति होगी ! 
"""""""""*जगद्गुरुत्तम श्री कृपालु महाप्रभु*"""""""""

 

तुम अपने को क्यों शरीर मानते हो ? अपने को केवल आत्मा मानो और सबमें हमारा प्रेमास्पद , हमारा परमात्मा बैठा हुआ है ! यह द्रढ़ विश्वास करो ! और सोचो किसी के दिल को दुखाना , किसी की बुराई करना , किसी में दुर्भावना लाना इससे हमारे प्रभु को कितना कष्ट होगा !

******जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज******
तुम अपने को क्यों शरीर मानते हो ? अपने को केवल आत्मा मानो और सबमें हमारा प्रेमास्पद , हमारा परमात्मा बैठा हुआ है ! यह द्रढ़ विश्वास करो ! और सोचो किसी के दिल को दुखाना , किसी की बुराई करना , किसी में दुर्भावना लाना इससे हमारे प्रभु को कितना कष्ट होगा !

******जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज******

 

Tuesday, February 19, 2013

 
‎"श्री महाराजजी के मुखारविंद से:
टाइम बरबाद न करो। जितना समय पेट भरने के लिए जरूरी है उतना समय संसार को दो,बाकी टाइम का उपयोग करो। भगवदविषय में लगाओगे तो बहुत जल्दी आगे बढ़ जाओगे अंत:करण की शुद्धि की और। और अगर मर गए बीच में तो जो साधना की है हमारी है वो तुमको फिर मनुष्य बना देगी और फिर कोई गुरु मिल जायेगा या तुम्हारा वही पुराना गुरु दूसरा रूप धारण करके आ जायेगा और तुमको फिर आगे बढ़ाएगा। अँधेर नहीं है भगवान के यहाँ कि बीच में छोड़ दिया गुरुजी ने। ऐसा नहीं होता। वो सदा के लिए हमारा साथ देता है भगवद प्राप्ति तक। इसलिए टाइम का उपयोग करो,समय नष्ट न करो, साधना करते रहो।"
"श्री महाराजजी के मुखारविंद से:
टाइम बरबाद न करो। जितना समय पेट भरने के लिए जरूरी है उतना समय संसार को दो,बाकी टाइम का उपयोग करो। भगवदविषय में लगाओगे तो बहुत जल्दी आगे बढ़ जाओगे अंत:करण की शुद्धि की और। और अगर मर गए बीच में तो जो साधना की है हमारी है वो तुमको फिर मनुष्य बना देगी और फिर कोई गुरु मिल जायेगा या तुम्हारा वही पुराना गुरु दूसरा रूप धारण करके आ जायेगा और तुमको फिर आगे बढ़ाएगा। अँधेर नहीं है भगवान के यहाँ कि बीच में छोड़ दिया गुरुजी ने। ऐसा नहीं होता। वो सदा के लिए हमारा साथ देता है भगवद प्राप्ति तक। इसलिए टाइम का उपयोग करो,समय नष्ट न करो, साधना करते रहो।"
 
 
     
     
अनंत जन्मों तक माथा पच्ची करने के पश्चात भी जो दिव्य ज्ञान हमें न मिलता वह हमारे गुरु ने इतने सरल और सहज रूप में हमें प्रदान कर दिया, अब इसके बाद हमारी ड्यूटि है कि उस तत्त्वज्ञान को बार-बार चिंतन द्वारा पक्का करके उसके अनुसार प्रैक्टिकल करें। अब हमने यहाँ लापरवाही की, एक ने कुछ परवाह की, एक ने और परवाह की, एक ने पूर्ण परवाह की, पूर्ण शरणागत हो गया, अब महापुरुष ने तो अकारण कृपा सबके ऊपर की, सबको समझाया। लेकिन उसमें एक घोर संसारी ही रहा, एक थोड़ा बहुत आगे बढ़ा, एक कुछ ज्यादा आगे बढ़ा, एक सब कुछ त्याग करके 24 घंटे लग गया लक्ष्य प्राप्ति पर। पर जो 24 घंटे लग गया लक्ष्य प्राप्ति हेतु क्या उसके ऊपर विशेष कृपा हुई, यह सोचना मूर्खता है। कृपा तो सब पर बराबर हुई लेकिन तपे लोहे पर पानी पड़ा छन्न, जल गया और कमल के पत्ते पर पड़ा तो मोती की तरह चमकने लगा और वही पानी अगर सीप में पड़ा स्वाति का तो मोती बन गया। पानी तो सब पर बराबर पड़ रहा है लेकिन जैसा पात्र है, जैसा मूल्य समझा जितना विश्वास किया जितना वैराग्य है जिसको उसका बर्तन उतना बना, उसके हिसाब से उसने उतना लाभ उठाया। तो महापुरुष की यह कृपा है तत्त्वज्ञान करवा देना। क्योंकि बिना तत्त्वज्ञान के हम साधना भी क्या करते, भगवदप्राप्ति का तो प्रश्न ही नहीं है। तर्क, कुतर्क, संशय ही करते रहते, इसी में पूरा जीवन बीत जाता, मानव देह व्यर्थ हो जाता। साधना करते भी तो अपने अल्पज्ञान या गलत ज्ञान के अनुसार ही करते जिससे कोई लाभ नहीं होता।

--------जगद्गुरुत्तम श्री कृपालुजी महाप्रभु।
अनंत जन्मों तक माथा पच्ची करने के पश्चात भी जो दिव्य ज्ञान हमें न मिलता वह हमारे गुरु ने इतने सरल और सहज रूप में हमें प्रदान कर दिया, अब इसके बाद हमारी ड्यूटि है कि उस तत्त्वज्ञान को बार-बार चिंतन द्वारा पक्का करके उसके अनुसार प्रैक्टिकल करें। अब हमने यहाँ लापरवाही की, एक ने कुछ परवाह की, एक ने और परवाह की, एक ने पूर्ण परवाह की, पूर्ण शरणागत हो गया, अब महापुरुष ने तो अकारण कृपा सबके ऊपर की, सबको समझाया। लेकिन उसमें एक घोर संसारी ही रहा, एक थोड़ा बहुत आगे बढ़ा, एक कुछ ज्यादा आगे बढ़ा, एक सब कुछ त्याग करके 24 घंटे लग गया लक्ष्य प्राप्ति पर। पर जो 24 घंटे लग गया लक्ष्य प्राप्ति हेतु क्या उसके ऊपर विशेष कृपा हुई, यह सोचना मूर्खता है। कृपा तो सब पर बराबर हुई लेकिन तपे लोहे पर पानी पड़ा छन्न, जल गया और कमल के पत्ते पर पड़ा तो मोती की तरह चमकने लगा और वही पानी अगर सीप में पड़ा स्वाति का तो मोती बन गया। पानी तो सब पर बराबर पड़ रहा है लेकिन जैसा पात्र है, जैसा मूल्य समझा जितना विश्वास किया जितना वैराग्य है जिसको उसका बर्तन उतना बना, उसके हिसाब से उसने उतना लाभ उठाया। तो महापुरुष की यह कृपा है तत्त्वज्ञान करवा देना। क्योंकि बिना तत्त्वज्ञान के हम साधना भी क्या करते, भगवदप्राप्ति का तो प्रश्न ही नहीं है। तर्क, कुतर्क, संशय ही करते रहते, इसी में पूरा जीवन बीत जाता, मानव देह व्यर्थ हो जाता। साधना करते भी तो अपने अल्पज्ञान या गलत ज्ञान के अनुसार ही करते जिससे कोई लाभ नहीं होता।

 --------जगद्गुरुत्तम श्री कृपालुजी महाप्रभु।

 



गुरुधाम सम नहिं और कोउ धामा |
गुरु की शरण जाय, जाय हरि ठामा ||

गुरु-धाम के समान अन्य कोई धाम नहीं | गुरु शरणागति से ही श्री हरि का धाम प्राप्त हो जाता है |
 
हरि धाम देखा नहिं देखा गुरुधामा |
गुरु सेवा ते ही मिले दिव्य हरिधामा ||

साधारण जीव गुरु-धाम का दर्शन प्राप्त कर सकते हैं | हरिधाम तो बिरले ही प्राप्त करते हैं | गुरु-सेवा के प्रभाव से ही दिव्य-हरिधाम गोलोक की प्राप्ति होती है |

.............. श्यामा श्याम गीत ( जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज ).............
गुरुधाम सम नहिं और कोउ धामा |
गुरु की शरण जाय, जाय हरि ठामा ||

गुरु-धाम के समान अन्य कोई धाम नहीं | गुरु शरणागति से ही श्री हरि का धाम प्राप्त हो जाता है |

हरि धाम देखा नहिं देखा गुरुधामा |
गुरु सेवा ते ही मिले दिव्य हरिधामा ||

साधारण जीव गुरु-धाम का दर्शन प्राप्त कर सकते हैं | हरिधाम तो बिरले ही प्राप्त करते हैं | गुरु-सेवा के प्रभाव से ही दिव्य-हरिधाम गोलोक की प्राप्ति होती है |

.............. श्यामा श्याम गीत ( जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज )...............

 

दीन के तुम ही दीनानाथ |
नर किन्नर सुर कोउ देत नहिं, दीन हीन को साथ |
जब लौं तन धन जन को बल रह, गावत सब गुन गाथ |
लखतहिं निबल प्रबल स्वारथरत, तजत दंपतिहुं हाथ |
पुनि उन बाँह गहे न गहे का ? तुम बिनु सबै अनाथ |
...
अब कृपालु अपनाय ‘कृपालुहिं’ धरहु हाथ मम माथ ||


भावार्थ - हे दीनानाथ श्यामसुन्दर ! दीन जनों के एकमात्र तुम्हीं नाथ हो | हे श्यामसुन्दर ! मनुष्य, किन्नर, देवता आदि कोई भी असमर्थ का साथ नहीं देता | संसार में जब तक किसी के पास शरीर, सम्पति एवं व्यक्तियों का बल रहता है तब तक सभी लोग उसके गुण गाया करते हैं और जैसे ही वह इन साधनों से रहित हो जाता है, वैसे ही प्रबल स्वार्थी प्राणाधिक प्यार का वादा करने वाले स्त्री पति भी हाथ छोड़ देते हैं | फिर इन मायाधीन रंग साथियों के हाथ पकड़ने से भी क्या लाभ | तुम्हारे बिना मैं अनाथ के समान हूँ | ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं – हे श्यामसुन्दर ! अब ‘कृपालु’ को अपनाकर कृतार्थ करो, एवं अपना हाथ सदा के लिए मेरे सिर पर रख दो |

( प्रेम रस मदिरा दैन्य – माधुरी )
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
सर्वाधिकार सुरक्षित - राधा गोविन्द समिति,
दीन के तुम ही दीनानाथ |
नर किन्नर सुर कोउ देत नहिं, दीन हीन को साथ |
जब लौं तन धन जन को बल रह, गावत सब गुन गाथ |
लखतहिं निबल प्रबल स्वारथरत, तजत दंपतिहुं हाथ | 
पुनि उन बाँह गहे न गहे का ? तुम बिनु सबै अनाथ |
अब कृपालु अपनाय ‘कृपालुहिं’ धरहु हाथ मम माथ ||
 

भावार्थ  -   हे दीनानाथ श्यामसुन्दर ! दीन जनों के एकमात्र तुम्हीं नाथ हो | हे श्यामसुन्दर ! मनुष्य, किन्नर, देवता आदि कोई भी असमर्थ का साथ नहीं देता | संसार में जब तक किसी के पास शरीर, सम्पति एवं व्यक्तियों का बल रहता है तब तक सभी लोग उसके गुण गाया करते हैं और जैसे ही वह इन साधनों से रहित हो जाता है, वैसे ही प्रबल स्वार्थी प्राणाधिक प्यार का वादा करने वाले स्त्री पति भी हाथ छोड़ देते हैं | फिर इन मायाधीन रंग साथियों के हाथ पकड़ने से भी क्या लाभ | तुम्हारे बिना मैं अनाथ के समान हूँ | ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं – हे श्यामसुन्दर ! अब ‘कृपालु’ को अपनाकर कृतार्थ करो, एवं अपना हाथ सदा के लिए मेरे सिर पर रख दो |


( प्रेम रस मदिरा   दैन्य – माधुरी )
 जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
सर्वाधिकार सुरक्षित - राधा गोविन्द समिति

 

"हम पापात्मा जीव संतो को सदा बिच्छू की तरह डंक मारते जाते हैं लेकिन संत फिर भी कृपा करते जाते हैं। जब संत यह संसार छोड़ कर चले जाते हैं, तब हम उनकी पूजा करते हैं लेकिन अपने जीवन काल में बेचारे सदैव अत्याचार और अन्याय के जाल में फंस जाते हैं। संत का तो स्वभाव ही है परोपकार। सर्वस्व लुट जाये, नाम, प्रतिष्ठा सब समाप्त हो जाये लेकिन जीव कल्याण का व्रत उनका स्वभाव ही है।"
"हम पापात्मा जीव संतो को सदा बिच्छू की तरह डंक मारते जाते हैं लेकिन संत फिर भी कृपा करते जाते हैं। जब संत यह संसार छोड़ कर चले जाते हैं, तब हम उनकी पूजा करते हैं लेकिन अपने जीवन काल में बेचारे सदैव अत्याचार और अन्याय के जाल में फंस जाते हैं। संत का तो स्वभाव ही है परोपकार। सर्वस्व लुट जाये, नाम, प्रतिष्ठा सब समाप्त हो जाये लेकिन जीव कल्याण का व्रत उनका स्वभाव ही है।"


मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...