Thursday, February 21, 2013

Radhopanishad states, "Radha and Krishna have one intellect, one mind, one soul, and even one face. They have one knowledge. This is why there is no difference between these two. If someone thinks there to be a difference, it is an offence."
Radhopanishad states, "Radha and Krishna have one intellect, one mind, one soul, and even one face. They have one knowledge. This is why there is no difference between these two. If someone thinks there to be a difference, it is an offence."

 

‎'SHRI KRISHNA' AND 'BLISS' ARE SYNONYMOUS WORDS.EVERY PERSON IN THE WORLD DESIRES ONLY BLISS.IN OTHER WORDS HE IS A SERVANT OF BLISS AND THEREFORE UNKNOWINGLY,A SERVANT OF SHRI KRISHNA.
------JAGADGURUTTAM SHRI KRIPALUJI MAHARAJ.
'SHRI KRISHNA' AND 'BLISS' ARE SYNONYMOUS WORDS.EVERY PERSON IN THE WORLD DESIRES ONLY BLISS.IN OTHER WORDS HE IS A SERVANT OF BLISS AND THEREFORE UNKNOWINGLY,A SERVANT OF SHRI KRISHNA.
 ------JAGADGURUTTAM SHRI KRIPALUJI MAHARAJ.

 

    आँसू बहाने से अन्तःकरण शुद्ध होगा, याद कर लो सब लोग, रट लो ये कृपालु का वाक्य। भोले बालक बनकर रोकर पुकारो, राम दौड़े आयेंगे। सब ज्ञान फेंक दो, कूड़ा-कबाड़ा जो इकट्ठा किया है। अपने को अकिंचन, निर्बल, असहाय, दींन हीन, पापात्मा रेअलाइज करो, भीतर से, तब आँसू की धार चलेगी, तब अन्तःकरण शुद्ध होगा, तब गुरु कृपा करेगा। गुरु की कृपा से राम के दर्शन होंगे, राम का प्यार मिलेगा और सदा के लिये आनन्दमय हो जाओगे.
    आँसू बहाने से अन्तःकरण शुद्ध होगा, याद कर लो सब लोग, रट लो ये कृपालु का वाक्य। भोले बालक बनकर रोकर पुकारो, राम दौड़े आयेंगे। सब ज्ञान फेंक दो, कूड़ा-कबाड़ा जो इकट्ठा किया है। अपने को अकिंचन, निर्बल, असहाय, दींन हीन, पापात्मा रेअलाइज करो, भीतर से, तब आँसू की धार चलेगी, तब अन्तःकरण शुद्ध होगा, तब गुरु कृपा करेगा। गुरु की कृपा से राम के दर्शन होंगे, राम का प्यार मिलेगा और सदा के लिये आनन्दमय हो जाओगे.

     

    God made many things in pairs but He made only one mind. He is very clever indeed! God knew that, if He gave us two minds we would attach one to the world and the other to Him and still lay claim to being His devotees. So, he gave us a single mind. Whether we attach it to Him, or to the world, the choice and decision is ours; it can be attached only to one place.
    God made many things in pairs but He made only one mind. He is very clever indeed! God knew that, if He gave us two minds we would attach one to the world and the other to Him and still lay claim to being His devotees. So, he gave us a single mind. Whether we attach it to Him, or to the world, the choice and decision is ours; it can be attached only to one place.

     

    सम्पूर्ण भुमंडल जिनकी दिव्य प्रभा से आलोकित हो रहा है, जिनका अवतरण कलिमल ग्रसित दैहिक,दैविक,भौतिक तापों से तप्त जिवों को श्रीकृष्ण के प्रेमानन्द और् प्रेमा-भक्ति में बरबस सराबोर करने के लिए ही हुआ है, एसे दिव्यातिदिव्य परमपुरुष पंचम मुल जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज के पादपल्लवों में कोटि-कोटि नमन् !

    जिन्होंने काशीपुरी के कई शत प्रकांड विद्वानों के ज्ञान-गर्व का मर्दन कर विश्व को नाना प्रकार के मत-मतांतरों के जाल-फ़ंदों से मुक्त किया है और भगवत्प्राप्ति का प्रमाणित और वैज्ञानिक मार्ग प्रशस्त किया है, एसे सन्ताग्रगण्य श्री कृपालु जी महाराज के वैष्णव अभिवंदित चरणकमलों में हमारे भगवद् सेवा हित होने वाले कोटि-कोटि जन्मों का सानंद समर्पण !
    सम्पूर्ण भुमंडल जिनकी दिव्य प्रभा से आलोकित हो रहा है, जिनका अवतरण कलिमल ग्रसित दैहिक,दैविक,भौतिक तापों से तप्त जिवों को श्रीकृष्ण के प्रेमानन्द और् प्रेमा-भक्ति में बरबस सराबोर करने के लिए ही हुआ है, एसे दिव्यातिदिव्य परमपुरुष पंचम मुल जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज के पादपल्लवों में कोटि-कोटि नमन् !

जिन्होंने काशीपुरी के कई शत प्रकांड विद्वानों के ज्ञान-गर्व का मर्दन कर विश्व को नाना प्रकार के मत-मतांतरों के जाल-फ़ंदों से मुक्त किया है और भगवत्प्राप्ति का प्रमाणित और वैज्ञानिक मार्ग प्रशस्त किया है, एसे सन्ताग्रगण्य श्री कृपालु जी महाराज के वैष्णव अभिवंदित चरणकमलों में हमारे भगवद् सेवा हित होने वाले कोटि-कोटि जन्मों का सानंद समर्पण !

     



    दीनता , गुरु शरणागति , हरि - अभेदवाद तथा निरंतर दिव्य दर्शन एवं दिव्य प्रेम -प्राप्ति की परमव्याकुलता को ही वास्तविक साधना मानो !
    :::::::::जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज::::::::
    दीनता , गुरु शरणागति , हरि - अभेदवाद तथा निरंतर दिव्य दर्शन एवं दिव्य प्रेम -प्राप्ति की परमव्याकुलता को ही वास्तविक साधना मानो ! 
::::::::::::::जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज:::::::::::::::::

     



      जो प्रेम गुरु कृपा द्वारा प्राप्त होता है वह भगवान् की प्राइवेट शक्ति है ! उसी प्रेम के लिए कहा जाता है कि भगवान् प्रेम के आधीन हैं !
      *******जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज*******
      जो प्रेम गुरु कृपा द्वारा प्राप्त होता है वह भगवान् की प्राइवेट शक्ति है ! उसी प्रेम के लिए कहा जाता है कि भगवान् प्रेम के आधीन हैं !
*******जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज*******

       



      मन का अटैचमेंट किसमें करें?

      एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...