Saturday, February 23, 2013

If you really believed that Paramatma is within you and really loves and cares for you then you wouldn't have looked for attention, love and care from the world.
......SHRI MAHARAJJI.
If you really believed that Paramatma is within you and really loves and cares for you then you wouldn't have looked for attention, love and care from the world.
......SHRI MAHARAJJI.

 
 

Friday, February 22, 2013

श्री महाराजजी के श्रीमुख से.................

1.हरि और गुरु केवल अधिकारी जीव को ही खींच सकते हैं, अनाधिकारी जीव को नहीं। जैसे लोहा जितनी ज्यादा मात्रा में शुद्ध होगा ,चुंबक से उतना ही शीघ्र खिंच जाएगा।

2.जब तक लोक और परलोक दोनों की चाहत रहेगी ,तब तक प्रेमानन्द नहीं मिल सकता।
...
3.प्रारब्ध उसी को कहते हैं कि जब दुख कि कल्पना की जाये किन्तु सुख प्राप्त हो,अथवा सुख की कल्पना की जाये और दुख प्राप्त हो।


4.श्री महाराजजी कहते हैं कि: जितनी क्षमा हम करते हैं ,उतना कोई नहीं कर सकता। कई बार सोचते है कि उसका परित्याग कर दिया जाये ,किन्तु फिर दया आ जाती है।

5.श्री महाराजजी समझाते हैं कि: जब हम कोई बात पूछे तो भोले बच्चों की भाँति सीधा सा उत्तर दिया करो।


6.जो शत प्रतिशत आज्ञापालन के लिए तैयार नहीं है ,वह कैसे आगे बढ्ने की आशा कर सकता है।

7.बुद्धि से गलत और विपरीत चिंतन करके साधक स्वयं अपना अहित कर लेता है।

8.दैहिक, दैविक, भौतिक तापो से तप्त भगवदबहिर्मुख जीवों को हरि सन्मुख करने के लिए जगदगुरु श्री कृपालुजी महाराज भगवन्नाम संकीर्तन को ही सर्वश्रेष्ठ बताते है ,भगवन्नाम में पाप नाश करने की ऐसी शक्ति है की बड़े से बड़े पापी, सभी पापों से मुक्त होकर दिव्य प्रेम का पात्र बन जाता है.

-------जगद्गुरुत्तम भगवान श्री कृपालुजी महाराज.
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श्री महाराजजी के श्रीमुख से.................
 
1.हरि और गुरु केवल अधिकारी जीव को ही खींच सकते हैं, अनाधिकारी जीव को नहीं। जैसे लोहा जितनी ज्यादा मात्रा में शुद्ध होगा ,चुंबक से उतना ही शीघ्र खिंच जाएगा।
 
2.जब तक लोक और परलोक दोनों की चाहत रहेगी ,तब तक प्रेमानन्द नहीं मिल सकता।
 
3.प्रारब्ध उसी को कहते हैं कि जब दुख कि कल्पना की जाये किन्तु सुख प्राप्त हो,अथवा सुख की कल्पना की जाये और दुख प्राप्त हो।
 

4.श्री महाराजजी कहते हैं कि: जितनी क्षमा हम करते हैं ,उतना कोई नहीं कर सकता। कई बार सोचते है कि उसका परित्याग कर दिया जाये ,किन्तु फिर दया आ जाती है।

 5.श्री महाराजजी समझाते हैं कि: जब हम कोई बात पूछे तो भोले बच्चों की भाँति सीधा सा उत्तर दिया करो।

 
6.जो शत प्रतिशत आज्ञापालन के लिए तैयार नहीं है ,वह कैसे आगे बढ्ने की आशा कर सकता है।
 
7.बुद्धि से गलत और विपरीत चिंतन करके साधक स्वयं अपना अहित कर लेता है।

 8.दैहिक, दैविक, भौतिक तापो से तप्त भगवदबहिर्मुख जीवों को हरि सन्मुख करने के लिए जगदगुरु श्री कृपालुजी महाराज भगवन्नाम संकीर्तन को ही सर्वश्रेष्ठ बताते है ,भगवन्नाम में पाप नाश करने की ऐसी शक्ति है की बड़े से बड़े पापी, सभी पापों से मुक्त होकर दिव्य प्रेम का पात्र बन जाता है.

 -------जगद्गुरुत्तम भगवान श्री कृपालुजी महाराज.

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कोई कहता है कि कामनाओं को छोड़ दो ! एवं कोई कहता है कि केवल श्याम भजन करो ! मेरी राय में दोनों ही भोले हैं ! अतः कामना त्याग एवं हरि अनुराग - साथ साथ करना है !

""""जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज""""
कोई कहता है कि कामनाओं को छोड़ दो ! एवं कोई कहता है कि केवल श्याम भजन करो ! मेरी राय में दोनों ही भोले हैं ! अतः कामना त्याग एवं हरि अनुराग - साथ साथ करना है !

""""""""जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज""""""""

 
 
 

Can you guarantee that you will live to see tomorrow?
कौन जानता है कल का दिन मिले ना मिले ?

----jagadguru shri kripalu ji maharaj.
Can you guarantee that you will live to see tomorrow?
कौन जानता है कल का दिन मिले ना मिले ?
----jagadguru shri kripalu ji maharaj.

 

No one can know God even if he endeavours to know Him for innumerable lifetimes, but when God imparts His Grace to a soul, he can know Him and attain divine bliss for eternity.
-------jagadguru shri kripalu ji maharaj.
No one can know God even if he endeavours to know Him for innumerable lifetimes, but when God imparts His Grace to a soul, he can know Him and attain divine bliss for eternity.
-------jagadguru shri kripalu ji maharaj.




भक्त्ति अर्थात् मन से भगवान् को सोचो, उनका चिंतन, उनका स्मरण करो, भगवान् को पाने के लिये और कुछ नहीं करना ।

 भक्त का चिन्तन भी प्राकृत होता है, लेकिन वो भगवान् से सम्बद्ध है, तो भगवान् अपनी स्वरुप शक्त्ति के द्वारा उस चिन्तन को दिव्य बना देते हैं, इसलिये भक्त का मन वास्तविक भगवान् का चिन्तन करने लगता है । भगवान् शरणागत ज्ञानियों को अपना दिव्य बुद्धियोग, दिव्य ज्ञान देते हैं, जिससे वो मोक्ष प्राप्त करते हैं॥

-जगद्गुरु कृपालुजी महाप्रभु.
भक्त्ति अर्थात् मन से भगवान् को सोचो, उनका चिंतन, उनका स्मरण करो, भगवान् को पाने के लिये और कुछ नहीं करना ।

भक्त्त का चिन्तन भी प्राक्रुत होता है, लेकिन वो भगवान् से सम्बद्ध है, तो भगवान् अपनी स्वरुप शक्त्ति के द्वारा उस चिन्तन को दिव्य बना देते हैं, इसलिये भक्त्त का मन वास्तविक भगवान् का चिन्तन करने लगता है । भगवान् शरणागत ज्ञानियों को अपना दिव्य बुद्धियोग, दिव्य ज्ञान देते हैं, जिससे वो मोक्ष्य प्राप्त करते हैं॥

-जगद्गुरु कृपालुजी महाप्रभु

 

Thursday, February 21, 2013

ब्रह्म जीव माया तत्व, गोविंद राधे |
तीनों हैं अनादि अनंत बता दे ||

ब्रह्म जीव चेतन, गोविंद राधे |
ब्रह्म शक्ति जीव याते अंश बता दे ||
...

ब्रह्म शक्ति माया जड़, गोविंद राधे |
जीव माया शासक ब्रह्म बता दे ||

.............कृपालु – त्रयोदशी
( जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज )
ब्रह्म जीव माया तत्व, गोविंद राधे |
तीनों हैं अनादि अनंत बता दे ||

ब्रह्म जीव चेतन, गोविंद राधे |
ब्रह्म शक्ति जीव याते अंश बता दे ||

ब्रह्म शक्ति माया जड़, गोविंद राधे |
जीव माया शासक ब्रह्म बता दे ||
    
      कृपालु – त्रयोदशी
( जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज )

 

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...