Saturday, February 23, 2013

श्रीकृष्ण प्राप्ति से ही, गोविंद राधे |
जीव को दिव्य सुख प्राप्त हो बता दे ||

श्रीकृष्ण प्राप्ति हेतु, गोविंद राधे |
श्रीकृष्ण-कृपा अनिवार्य बता दे ||
...

श्रीकृष्ण कृपा हेतु, गोविंद राधे |
साधन केवल भक्ति बता दे ||

..........कृपालु – त्रयोदशी
( जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज )
श्रीकृष्ण प्राप्ति से ही, गोविंद राधे |
जीव को दिव्य सुख प्राप्त हो बता दे ||

श्रीकृष्ण प्राप्ति हेतु, गोविंद राधे | 
श्रीकृष्ण-कृपा अनिवार्य बता दे ||

श्रीकृष्ण कृपा हेतु, गोविंद राधे |
साधन केवल भक्ति बता दे ||


      कृपालु – त्रयोदशी
( जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज )

 

In this world, there are few fortunate ones, who move towards God. Amongst them, only a few are fortunate enough to get the association of a genuine Saint. Amongst them too, there are a few who are fortunate enough to get the Divine knowledge. Nevertheless, there is one flaw, which does not let them progress. It is their habit of procrastination. When it comes to worldly activities, we do these immediately. We never defer activities like attaching our minds somewhere, or showing aversion somewhere, or insulting someone, or causing damage to someone. We do these instantly. But we always postpone God related activities. Vedas say – "Don’t leave anything for tomorrow. Who knows, tomorrow may not come in your life". So, do not procrastinate even for a moment. Start practicing devotion right from this moment.
.........Shri Kripalu Maharaj Ji.
In this world, there are few fortunate ones, who move towards God. Amongst them, only a few are fortunate enough to get the association of a genuine Saint. Amongst them too, there are a few who are fortunate enough to get the Divine knowledge. Nevertheless, there is one flaw, which does not let them progress. It is their habit of procrastination. When it comes to worldly activities, we do these immediately. We never defer activities like attaching our minds somewhere, or showing aversion somewhere, or insulting someone, or causing damage to someone. We do these instantly. But we always postpone God related activities. Vedas say – "Don’t leave anything for tomorrow. Who knows, tomorrow may not come in your life". So, do not procrastinate even for a moment. Start practicing devotion right from this moment.
.........Shri Kripalu Maharaj Ji.

 

नाम पतित पावन सुनि, निर्भय हवे किय पाप।
यामें दोष बताउ मम, दोषी तो हैं आप।।

हे श्रीकृष्ण! मैंने आपका पतितपावन नाम सुनकर ही निर्भयता पूर्वक दिन रात धुआँदार, बिना सोचे विचारे ही पाप किए। किन्तु इसमे मेरा क्या दोष है? दोष तो आपके 'पतित पावन' नाम का है।
------श्री कृपालुजी महाप्रभु।
नाम पतित पावन सुनि, निर्भय हवे किय पाप।
 यामें दोष बताउ मम, दोषी तो हैं आप।।

 हे श्रीकृष्ण! मैंने आपका पतितपावन नाम सुनकर ही निर्भयता पूर्वक दिन रात धुआँदार, बिना सोचे विचारे ही पाप किए। किन्तु इसमे मेरा क्या दोष है? दोष तो आपके 'पतित पावन' नाम का है।
------श्री कृपालुजी महाप्रभु।

 
हौं मानत हौं सदा को, हौं पातक अवतार।
अधम उधारन विरद पर, तुम तो करहु विचार।।
हे श्रीकृष्ण! अनादिकाल से मैंने सदा पाप ही किया है,यह में मानता हूँ। किन्तु तुम भी तो अपनी पतित पावनी प्रतिज्ञा पर विचार करो।
-----जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज.
हौं मानत हौं सदा को, हौं पातक अवतार।
 अधम उधारन विरद पर, तुम तो करहु विचार।।
 हे श्रीकृष्ण! अनादिकाल से मैंने सदा पाप ही किया है,यह में मानता हूँ। किन्तु तुम भी तो अपनी पतित पावनी प्रतिज्ञा पर विचार करो।
-----जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज.

 

सब लोग दीनता, कम बोलने का अभ्यास करो, सहनशीलता बढ़ाने का अभ्यास करो। यही मेरी खुशी है।
------श्री महाराजजी।
सब लोग दीनता, कम बोलने का अभ्यास करो, सहनशीलता बढ़ाने का अभ्यास करो। यही मेरी खुशी है।
------श्री महाराजजी।

 

If you really believed that Paramatma is within you and really loves and cares for you then you wouldn't have looked for attention, love and care from the world.
......SHRI MAHARAJJI.
If you really believed that Paramatma is within you and really loves and cares for you then you wouldn't have looked for attention, love and care from the world.
......SHRI MAHARAJJI.

 
 

Friday, February 22, 2013

श्री महाराजजी के श्रीमुख से.................

1.हरि और गुरु केवल अधिकारी जीव को ही खींच सकते हैं, अनाधिकारी जीव को नहीं। जैसे लोहा जितनी ज्यादा मात्रा में शुद्ध होगा ,चुंबक से उतना ही शीघ्र खिंच जाएगा।

2.जब तक लोक और परलोक दोनों की चाहत रहेगी ,तब तक प्रेमानन्द नहीं मिल सकता।
...
3.प्रारब्ध उसी को कहते हैं कि जब दुख कि कल्पना की जाये किन्तु सुख प्राप्त हो,अथवा सुख की कल्पना की जाये और दुख प्राप्त हो।


4.श्री महाराजजी कहते हैं कि: जितनी क्षमा हम करते हैं ,उतना कोई नहीं कर सकता। कई बार सोचते है कि उसका परित्याग कर दिया जाये ,किन्तु फिर दया आ जाती है।

5.श्री महाराजजी समझाते हैं कि: जब हम कोई बात पूछे तो भोले बच्चों की भाँति सीधा सा उत्तर दिया करो।


6.जो शत प्रतिशत आज्ञापालन के लिए तैयार नहीं है ,वह कैसे आगे बढ्ने की आशा कर सकता है।

7.बुद्धि से गलत और विपरीत चिंतन करके साधक स्वयं अपना अहित कर लेता है।

8.दैहिक, दैविक, भौतिक तापो से तप्त भगवदबहिर्मुख जीवों को हरि सन्मुख करने के लिए जगदगुरु श्री कृपालुजी महाराज भगवन्नाम संकीर्तन को ही सर्वश्रेष्ठ बताते है ,भगवन्नाम में पाप नाश करने की ऐसी शक्ति है की बड़े से बड़े पापी, सभी पापों से मुक्त होकर दिव्य प्रेम का पात्र बन जाता है.

-------जगद्गुरुत्तम भगवान श्री कृपालुजी महाराज.
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श्री महाराजजी के श्रीमुख से.................
 
1.हरि और गुरु केवल अधिकारी जीव को ही खींच सकते हैं, अनाधिकारी जीव को नहीं। जैसे लोहा जितनी ज्यादा मात्रा में शुद्ध होगा ,चुंबक से उतना ही शीघ्र खिंच जाएगा।
 
2.जब तक लोक और परलोक दोनों की चाहत रहेगी ,तब तक प्रेमानन्द नहीं मिल सकता।
 
3.प्रारब्ध उसी को कहते हैं कि जब दुख कि कल्पना की जाये किन्तु सुख प्राप्त हो,अथवा सुख की कल्पना की जाये और दुख प्राप्त हो।
 

4.श्री महाराजजी कहते हैं कि: जितनी क्षमा हम करते हैं ,उतना कोई नहीं कर सकता। कई बार सोचते है कि उसका परित्याग कर दिया जाये ,किन्तु फिर दया आ जाती है।

 5.श्री महाराजजी समझाते हैं कि: जब हम कोई बात पूछे तो भोले बच्चों की भाँति सीधा सा उत्तर दिया करो।

 
6.जो शत प्रतिशत आज्ञापालन के लिए तैयार नहीं है ,वह कैसे आगे बढ्ने की आशा कर सकता है।
 
7.बुद्धि से गलत और विपरीत चिंतन करके साधक स्वयं अपना अहित कर लेता है।

 8.दैहिक, दैविक, भौतिक तापो से तप्त भगवदबहिर्मुख जीवों को हरि सन्मुख करने के लिए जगदगुरु श्री कृपालुजी महाराज भगवन्नाम संकीर्तन को ही सर्वश्रेष्ठ बताते है ,भगवन्नाम में पाप नाश करने की ऐसी शक्ति है की बड़े से बड़े पापी, सभी पापों से मुक्त होकर दिव्य प्रेम का पात्र बन जाता है.

 -------जगद्गुरुत्तम भगवान श्री कृपालुजी महाराज.

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मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...