Monday, February 25, 2013

हे श्रीकृष्ण ! यदि दीनता से ही तुम कृपा करते हो तो वह तो मेरे पास थोड़ा भी नहीं है ! अतः पहले ऐसी कृपा करो कि दीन भाव युक्त बनूँ ! ' ऐसा कह कर आँसू बहाओ ! यह करना पड़ेगा ! मानवदेह क्षणिक है ! जल्दी करो ! पता नहीं कब टिकिट कट जाय !

यह मेरा नम्र निवेदन सभी से है !
..........जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज.

' हे श्रीकृष्ण !  यदि दीनता से ही तुम कृपा करते हो तो वह तो मेरे पास थोड़ा भी नहीं है ! अतः पहले ऐसी कृपा करो कि दीन भाव युक्त बनूँ ! '  ऐसा कह कर आँसू बहाओ ! यह करना पड़ेगा ! मानवदेह क्षणिक है ! जल्दी करो ! पता नहीं कब टिकिट कट जाय !

यह  मेरा नम्र निवेदन सभी से है !
(जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज)
Just as it is impossible to run with tied feet, or speak with a closed mouth, it is impossible to practice devotion to God with the mind attached elsewhere. In reality, it is only the attachment of the mind which is referred to as devotion in the spiritual realm. But this same attachment, if directed to the material world, is referred to as infatuation.
-----jagadguru shri kripalu ji maharaj.
Just as it is impossible to run with tied feet, or speak with a closed mouth, it is impossible to practice devotion to God with the mind attached elsewhere. In reality, it is only the attachment of the mind which is referred to as devotion in the spiritual realm. But this same attachment, if directed to the material world, is referred to as infatuation. 
-----jagadguru shri kripalu ji maharaj.

 
 

सभी प्राणियों के अंतःकरण में हमारे प्राण वल्लभ श्री कृष्ण का निवास है अतः अपनी कठोर वाणी , या अपने व्यवहार द्वारा किसी को भी दुःखी मत करो !

----जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।
सभी प्राणियों के अंतःकरण में हमारे प्राण वल्लभ श्री कृष्ण का निवास है अतः अपनी कठोर वाणी , या अपने व्यवहार द्वारा किसी को भी दुःखी मत करो !

----जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।

 

Saturday, February 23, 2013

विश्व में कौन किससे प्यार करता है.......सब का अपना-अपना स्वार्थ है।
.....श्री महाराजजी।
विश्व में कौन किससे प्यार करता है.......सब का अपना-अपना स्वार्थ है।
.....श्री महाराजजी।

 

कमर कस कर जिद कर लो कि मुझे अपने प्राणवल्लभ श्रीकृष्ण से मिलना ही है। इसी जन्म में ही, नहीं-नहीं इसी वर्ष, नहीं-नहीं आज ही मिलना है। यह व्याकुलता बढ़ाना ही वास्तविक साधना है। इस प्रकार यह व्याकुलता इतनी बढ़ जाय कि अपने प्रियतम से मिले बिना एक क्षण भी युग के सामान बीतने लगे, बस यही साधना की चरम सीमा है। इसी सीमा पर भगवत्कृपा, गुरु कृपा द्वारा दिव्य प्रेम मिलेगा।
--- जगदगुरु श्री कृपालु जी महाराज.
कमर कस कर जिद कर लो कि मुझे अपने प्राणवल्लभ श्रीकृष्ण से मिलना ही है। इसी जन्म में ही, नहीं-नहीं इसी वर्ष, नहीं-नहीं आज ही मिलना है। यह व्याकुलता बढ़ाना ही वास्तविक साधना है। इस प्रकार यह व्याकुलता इतनी बढ़ जाय कि अपने प्रियतम से मिले बिना एक क्षण भी युग के सामान बीतने लगे, बस यही साधना की चरम सीमा है। इसी सीमा पर भगवत्कृपा, गुरु कृपा द्वारा दिव्य प्रेम मिलेगा।
 --- जगदगुरु श्री कृपालु जी महाराज.


SOMEONE MIGHT WONDER HOW CONTINUING HUMBLENESS CAN WITHSTAND SURVIVAL IN THIS WORLD. WELL, YOU SHOULD KNOW THAT THERE IS A DIFFERENCE IN SHOWING HUMBLENESS AND IN BEING HUMBLE.
'CHAITANYA MAHAPRABHU' JI DID NOT SAY TO SHOW YOUR HUMBLENESS AROUND IN THE WORLD.HE SAID TO BE HUMBLE IN YOUR HEART AND MIND.HE MEANT HUMBLENESS AS AN INNER QUALITY FOR DEVOTIONAL PURPOSES.
MAINTAINING THIS VIRTUE,YOU SHOULD BEHAVE IN THE WORLD AS REQUIRED AND AS THE SITUATION PERMITS.YOU MAY REBUKE AND GROWL AT THE MISTAKE OF YOUR EMPLOYEE BUT STILL RETAIN YOUR INNER SELF CALM.
SOMEONE MIGHT WONDER HOW CONTINUING HUMBLENESS CAN WITHSTAND SURVIVAL IN THIS WORLD. WELL, YOU SHOULD KNOW THAT THERE IS A DIFFERENCE IN SHOWING HUMBLENESS AND IN BEING HUMBLE.
 'CHAITANYA MAHAPRABHU' JI DID NOT SAY TO SHOW YOUR HUMBLENESS AROUND IN THE WORLD.HE SAID TO BE HUMBLE IN YOUR HEART AND MIND.HE MEANT HUMBLENESS AS AN INNER QUALITY FOR DEVOTIONAL PURPOSES.
 MAINTAINING THIS VIRTUE,YOU SHOULD BEHAVE IN THE WORLD AS REQUIRED AND AS THE SITUATION PERMITS.YOU MAY REBUKE AND GROWL AT THE MISTAKE OF YOUR EMPLOYEE BUT STILL RETAIN YOUR INNER SELF CALM.

 

गुरु ने बताया मोहिं गोविंद राधे।
उन्हीं का दिया है उन्हीं को लुटा दे।।
......श्री महाराजजी।
गुरु ने बताया मोहिं गोविंद राधे। 
उन्हीं का दिया है उन्हीं को लुटा दे।।
......श्री महाराजजी।


    मन का अटैचमेंट किसमें करें?

    एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...