This Blog is dedicated to the Lotus Feet of my Spiritual Master - Jagadguru Shri Kripaluji Maharaj, who is the Descension of the Bliss of Divine Love, who is illuminating the entire world with light of His Vedic and Yogic knowledge of our Scriptures. Jai Shree Radhey!!!
Monday, February 25, 2013
भगवान् के अतिरिक्त्त जो बचे, उनमें एक तो भगवान् के स्वांश हैं, एक विभिन्नांश । भगवान् के समस्त अवतार स्वांश हैं, अर्थात् भगवान् ही हैं, ये सब स्वरुप शक्त्ति के नियन्ता (GOVERNOR) हैं। विभिन्नांश अर्थात् भगवान् की तटस्था शक्त्ति के जो अंश हैं वो विभिन्नांश कहलाते हैं।विभिन्नांश में एक नित्य मुक्त(ललीता,विशाखादि) दुसरे साधन मुक्त (तुलसी,सुर,मीरा अदि) होते हैं ।
बचे हुये विभिन्नांश जो मायाधीन हैं, जिन्होंने अभी सम्बन्ध का ज्ञान नहीं माना और भगवान् के शरणापन्न नहीं हुये, इनको साधना भक्त्ति करनी है॥
-......जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज.
बचे हुये विभिन्नांश जो मायाधीन हैं, जिन्होंने अभी सम्बन्ध का ज्ञान नहीं माना और भगवान् के शरणापन्न नहीं हुये, इनको साधना भक्त्ति करनी है॥
-......जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज.
हे श्रीकृष्ण ! यदि दीनता से ही तुम कृपा करते हो तो वह तो मेरे पास थोड़ा भी नहीं है ! अतः पहले ऐसी कृपा करो कि दीन भाव युक्त बनूँ ! ' ऐसा कह कर आँसू बहाओ ! यह करना पड़ेगा ! मानवदेह क्षणिक है ! जल्दी करो ! पता नहीं कब टिकिट कट जाय !
यह मेरा नम्र निवेदन सभी से है !
..........जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज.
यह मेरा नम्र निवेदन सभी से है !
..........जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज.
Just as it is impossible to run with tied feet, or speak with a closed mouth, it is impossible to practice devotion to God with the mind attached elsewhere. In reality, it is only the attachment of the mind which is referred to as devotion in the spiritual realm. But this same attachment, if directed to the material world, is referred to as infatuation.
-----jagadguru shri kripalu ji maharaj.
-----jagadguru shri kripalu ji maharaj.
Saturday, February 23, 2013
कमर कस कर जिद कर लो कि मुझे अपने प्राणवल्लभ श्रीकृष्ण से मिलना ही है। इसी जन्म में ही, नहीं-नहीं इसी वर्ष, नहीं-नहीं आज ही मिलना है। यह व्याकुलता बढ़ाना ही वास्तविक साधना है। इस प्रकार यह व्याकुलता इतनी बढ़ जाय कि अपने प्रियतम से मिले बिना एक क्षण भी युग के सामान बीतने लगे, बस यही साधना की चरम सीमा है। इसी सीमा पर भगवत्कृपा, गुरु कृपा द्वारा दिव्य प्रेम मिलेगा।
--- जगदगुरु श्री कृपालु जी महाराज.
--- जगदगुरु श्री कृपालु जी महाराज.
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मन का अटैचमेंट किसमें करें?
एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...
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Baar Baar suno, Baar Baar suno, tab tatvagyan paripakva hoga. Ye jo hum Logo ko Brham hota hai ki yeh to maine bahut suna hai, yeh to mein j...
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गुरु में हरिबुद्धि रखो सदा गुरुधामा | नरबुद्धि आने नहिं पाये आठु यामा || गुरु के प्रति सदैव भगवद् बुद्धि ही रखो | निरन्तर यह सावधानी र...
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ए # मनुष्यों ! # मानव_देह प्राप्त हुआ है , # भगवतप्राप्ति के लिये केवल, इसकाे मत गँवाओ, व्यर्थ # भाेग_विलास में केवल लिप्त रह कर...









