Monday, February 25, 2013

‎"God possesses innumerable mutual contradictions within Him. He is bigger than the biggest, yet smaller than the smallest. He is without name and form, but also with name and form. He is farther than the farthest, yet nearer than the nearest. God does not take birth, yet takes birth innumerable times. For all these reasons and more, it is impossible to know God with material senses, mind and intellect."
 
 



भगवान् के अतिरिक्त्त जो बचे, उनमें एक तो भगवान् के स्वांश हैं, एक विभिन्नांश । भगवान् के समस्त अवतार स्वांश हैं, अर्थात् भगवान् ही हैं, ये सब स्वरुप शक्त्ति के नियन्ता (GOVERNOR) हैं। विभिन्नांश अर्थात् भगवान् की तटस्था शक्त्ति के जो अंश हैं वो विभिन्नांश कहलाते हैं।विभिन्नांश में एक नित्य मुक्त(ललीता,विशाखादि) दुसरे साधन मुक्त (तुलसी,सुर,मीरा अदि) होते हैं ।

बचे हुये विभिन्नांश जो मायाधीन हैं, जिन्होंने अभी सम्बन्ध का ज्ञान नहीं माना और भगवान् के शरणापन्न नहीं हुये, इनको साधना भक्त्ति करनी है॥

-......जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज.
 



हे श्रीकृष्ण ! यदि दीनता से ही तुम कृपा करते हो तो वह तो मेरे पास थोड़ा भी नहीं है ! अतः पहले ऐसी कृपा करो कि दीन भाव युक्त बनूँ ! ' ऐसा कह कर आँसू बहाओ ! यह करना पड़ेगा ! मानवदेह क्षणिक है ! जल्दी करो ! पता नहीं कब टिकिट कट जाय !

यह मेरा नम्र निवेदन सभी से है !
..........जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज.

' हे श्रीकृष्ण !  यदि दीनता से ही तुम कृपा करते हो तो वह तो मेरे पास थोड़ा भी नहीं है ! अतः पहले ऐसी कृपा करो कि दीन भाव युक्त बनूँ ! '  ऐसा कह कर आँसू बहाओ ! यह करना पड़ेगा ! मानवदेह क्षणिक है ! जल्दी करो ! पता नहीं कब टिकिट कट जाय !

यह  मेरा नम्र निवेदन सभी से है !
(जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज)
Just as it is impossible to run with tied feet, or speak with a closed mouth, it is impossible to practice devotion to God with the mind attached elsewhere. In reality, it is only the attachment of the mind which is referred to as devotion in the spiritual realm. But this same attachment, if directed to the material world, is referred to as infatuation.
-----jagadguru shri kripalu ji maharaj.
Just as it is impossible to run with tied feet, or speak with a closed mouth, it is impossible to practice devotion to God with the mind attached elsewhere. In reality, it is only the attachment of the mind which is referred to as devotion in the spiritual realm. But this same attachment, if directed to the material world, is referred to as infatuation. 
-----jagadguru shri kripalu ji maharaj.

 
 

सभी प्राणियों के अंतःकरण में हमारे प्राण वल्लभ श्री कृष्ण का निवास है अतः अपनी कठोर वाणी , या अपने व्यवहार द्वारा किसी को भी दुःखी मत करो !

----जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।
सभी प्राणियों के अंतःकरण में हमारे प्राण वल्लभ श्री कृष्ण का निवास है अतः अपनी कठोर वाणी , या अपने व्यवहार द्वारा किसी को भी दुःखी मत करो !

----जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।

 

Saturday, February 23, 2013

विश्व में कौन किससे प्यार करता है.......सब का अपना-अपना स्वार्थ है।
.....श्री महाराजजी।
विश्व में कौन किससे प्यार करता है.......सब का अपना-अपना स्वार्थ है।
.....श्री महाराजजी।

 

कमर कस कर जिद कर लो कि मुझे अपने प्राणवल्लभ श्रीकृष्ण से मिलना ही है। इसी जन्म में ही, नहीं-नहीं इसी वर्ष, नहीं-नहीं आज ही मिलना है। यह व्याकुलता बढ़ाना ही वास्तविक साधना है। इस प्रकार यह व्याकुलता इतनी बढ़ जाय कि अपने प्रियतम से मिले बिना एक क्षण भी युग के सामान बीतने लगे, बस यही साधना की चरम सीमा है। इसी सीमा पर भगवत्कृपा, गुरु कृपा द्वारा दिव्य प्रेम मिलेगा।
--- जगदगुरु श्री कृपालु जी महाराज.
कमर कस कर जिद कर लो कि मुझे अपने प्राणवल्लभ श्रीकृष्ण से मिलना ही है। इसी जन्म में ही, नहीं-नहीं इसी वर्ष, नहीं-नहीं आज ही मिलना है। यह व्याकुलता बढ़ाना ही वास्तविक साधना है। इस प्रकार यह व्याकुलता इतनी बढ़ जाय कि अपने प्रियतम से मिले बिना एक क्षण भी युग के सामान बीतने लगे, बस यही साधना की चरम सीमा है। इसी सीमा पर भगवत्कृपा, गुरु कृपा द्वारा दिव्य प्रेम मिलेगा।
 --- जगदगुरु श्री कृपालु जी महाराज.


मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...