Tuesday, February 26, 2013

किसी को कभी किसी जन्म में श्रोत्रिय ब्रहमनिष्ठ महापुरुष गुरु मिल जाये और वह श्रद्धालु विरक्त जिज्ञासु उसे गुरु मान ले यह बहुत बड़ी भगवदकृपा है। गुरु शिष्य नहीं बनायेगा,शिष्य को मन से गुरु मानना होगा। कोई महापुरुष किसी जीव को शिष्य तब तक न बनायेगा जब तक उसका अंत:करण पूर्णतया शुद्ध न हो जायेगा।

-------जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाप्रभु।
किसी को कभी किसी जन्म में श्रोत्रिय ब्रहमनिष्ठ महापुरुष गुरु मिल जाये और वह श्रद्धालु विरक्त जिज्ञासु उसे गुरु मान ले यह बहुत बड़ी भगवदकृपा है। गुरु शिष्य नहीं बनायेगा,शिष्य को मन से गुरु मानना होगा। कोई महापुरुष किसी जीव को शिष्य तब तक न बनायेगा जब तक उसका अंत:करण पूर्णतया शुद्ध न हो जायेगा।
 
-------जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाप्रभु।

 

JAGADGURU SHRI KRIPALUJI MAHARAJ HAS BEEN SHOWERING 'BRAJ RAS' SINCE 1938. FOR THE GOOD OF THE SOULS, HE HAS REVEALED A RECONCILED AND UNIFIED THEORY OF ALL THE BHARTIYA SCRIPTURES WHICH WAS PROPOUNDED BY PREVIOUS JAGADGURUS AND ACHARYAS IN VARIOUS WAYS,AND ESTABLISHED A SINGLE,SURE,SIMPLE,AND POTENT PATH OF DEVOTION TO GOD THAT COULD BE FOLLOWED BY EVERYONE DESIRING TO EXPERIENCE THE SUPREME FORM OF DIVINE LOVE.
JAGADGURU SHRI KRIPALUJI MAHARAJ HAS REJUVENATED AND RE-ESTABLISHED THE DEVOTIONAL PARAMPARA OF 'RAGANUGA BHAKTI' WHICH WAS INTRODUCED BY SHREE CHAITANYA MAHAPRABHU JI,AND HAS GIVEN IT A REFINED FORM THAT COULD BE FOLLOWED BY THE DEVOTEES OF THE WORLD,FOREVER.
JAGADGURU SHRI KRIPALUJI MAHARAJ HAS BEEN SHOWERING 'BRAJ RAS' SINCE 1938. FOR THE GOOD OF THE SOULS, HE HAS REVEALED A RECONCILED AND UNIFIED THEORY OF ALL THE BHARTIYA SCRIPTURES WHICH WAS PROPOUNDED BY PREVIOUS JAGADGURUS AND ACHARYAS IN VARIOUS WAYS,AND ESTABLISHED A SINGLE,SURE,SIMPLE,AND POTENT PATH OF DEVOTION TO GOD THAT COULD BE FOLLOWED BY EVERYONE DESIRING TO EXPERIENCE THE SUPREME FORM OF DIVINE LOVE.
 JAGADGURU SHRI KRIPALUJI MAHARAJ HAS REJUVENATED AND RE-ESTABLISHED THE DEVOTIONAL PARAMPARA OF 'RAGANUGA BHAKTI' WHICH WAS INTRODUCED BY SHREE CHAITANYA MAHAPRABHU JI,AND HAS GIVEN IT A REFINED FORM THAT COULD BE FOLLOWED BY THE DEVOTEES OF THE WORLD,FOREVER.

 

तत्वज्ञान हेतु दो हैं गोविंद राधे |
एक गुरु एक वैराग्य बता दे ||

भावार्थ- तत्व-ज्ञान की प्राप्ति में दो ही कारण है | प्रथम सांसारिक विषयों से वैराग्य हो, द्वितीय श्रोत्रिय ब्रह्मनिष्ठ गुरु प्राप्त हो | यदि वैराग्य नहीं है तो गुरु भी तत्व-ज्ञान प्रदान नहीं कर सकता | यदि वैराग्य है परन्तु गुरु प्राप्त नहीं है तो भी तत्व-ज्ञान नहीं होगा |

... गुरु ते ही हरिज्ञान गोविंद राधे |
गुरु बिनु क, ख, ग, घ, ज्ञान ना बता दे ||

भावार्थ- गुरु द्वारा ही श्रीहरि के स्वरूप का सच्चा तत्व-ज्ञान प्राप्त होता है | गुरु के अभाव में तो संसार में क, ख, ग, घ का ज्ञान भी असम्भव है |

श्रोत्रिय ब्रह्मनिष्ठ गोविंद राधे |
गुरु ही ईश्वरीय ज्ञान करा दे ||

भावार्थ- जो गुरु श्रोत्रिय व ब्रह्मनिष्ठ है अर्थात् जिसे वेद-शस्त्र का ज्ञान भी हो एवं भगवत्प्राप्ति भी किये हो, वही ईश्वरीय तत्व-ज्ञान प्रदान कर सकता है |

..................राधा गोविंद गीत ( जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज ).................
तत्वज्ञान हेतु दो हैं गोविंद राधे |
एक गुरु एक वैराग्य बता दे ||

भावार्थ-  तत्व-ज्ञान की प्राप्ति में दो ही कारण है | प्रथम सांसारिक विषयों से वैराग्य हो, द्वितीय श्रोत्रिय ब्रह्मनिष्ठ गुरु प्राप्त हो | यदि वैराग्य नहीं है तो गुरु भी तत्व-ज्ञान प्रदान नहीं कर सकता | यदि वैराग्य है परन्तु गुरु प्राप्त नहीं है तो भी तत्व-ज्ञान नहीं होगा |

गुरु ते ही हरिज्ञान गोविंद राधे | 
गुरु बिनु क, ख, ग, घ, ज्ञान ना बता दे ||

भावार्थ-  गुरु द्वारा ही श्रीहरि के स्वरूप का सच्चा तत्व-ज्ञान प्राप्त होता है | गुरु के अभाव में तो संसार में क, ख, ग, घ का ज्ञान भी असम्भव है |

श्रोत्रिय  ब्रह्मनिष्ठ गोविंद राधे |
गुरु ही ईश्वरीय ज्ञान करा दे || 

भावार्थ-  जो गुरु श्रोत्रिय व ब्रह्मनिष्ठ है अर्थात् जिसे वेद-शस्त्र का ज्ञान भी हो एवं भगवत्प्राप्ति भी किये हो, वही ईश्वरीय तत्व-ज्ञान प्रदान कर सकता है |

..................राधा गोविंद गीत ( जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज ).................

 

श्री कृष्ण का माधुर्य रस इतना विलक्षण है कि श्रीकृष्ण स्वंय अपने आप को देखकर मुग्ध हो जाते हैं एवं अपना ही आलिंगन करना चाहते हैं ! अतः वे निजजन के ही मनमोहन नहीं हैं , वरन अपने मन के भी मोहन हैं !
"""""""""जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज"""""""""""
श्री कृष्ण का माधुर्य रस इतना विलक्षण है कि श्रीकृष्ण स्वंय अपने आप को देखकर मुग्ध हो जाते हैं एवं अपना ही आलिंगन करना चाहते हैं ! अतः वे निजजन के ही मनमोहन नहीं हैं , वरन अपने मन के भी मोहन हैं !
"""""""""जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज"""""""""""

 

जो सेंट परसेंट आज्ञा पालन करने के लिये तैयार नहीं है ,वह कैसे आगे बढ़ने की आशा कर सकता है?
*****जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज*****
जो सेंट परसेंट आज्ञा पालन करने के लिये तैयार नहीं है ,वह कैसे आगे बढ़ने की आशा कर सकता है?
*****जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज*****


    One thing is certain, if the intellect makes a firm decision that the objects of the external world cannot fulfill our goal of supreme bliss then internal desires will automatically come to an end. So the first step is to make a firm decision, through constant reflection, that there is not a trace of true happiness in the material world.
    -----jagadguru shri kripalu ji maharaj.
    One thing is certain, if the intellect makes a firm decision that the objects of the external world cannot fulfill our goal of supreme bliss then internal desires will automatically come to an end. So the first step is to make a firm decision, through constant reflection, that there is not a trace of true happiness in the material world. 
-----jagadguru shri kripalu ji maharaj.

     



      हे मन ! तू मैं को मत छोड़। वरन मैं के आगे दास को और जोड़ दे ( मैं दास हूँ ) मेरा भी मत छोड़। वरन मेरा के आगे रसिक शेखर श्रीकृष्ण जोड़ दे। ( मेरा स्वामी )
      ~~~~~~~जगद्गुरु श्री कृपालु महाप्रभु~~~~~~~
      हे मन ! तू मैं को मत छोड़। वरन मैं के आगे दास को और जोड़ दे ( मैं दास हूँ ) मेरा भी मत छोड़। वरन मेरा के आगे रसिक शेखर श्रीकृष्ण जोड़ दे। ( मेरा स्वामी ) 
~~~~~~~~~~जगद्गुरु श्री कृपालु महाप्रभु~~~~~~~~~~~

       

      मन का अटैचमेंट किसमें करें?

      एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...