This Blog is dedicated to the Lotus Feet of my Spiritual Master - Jagadguru Shri Kripaluji Maharaj, who is the Descension of the Bliss of Divine Love, who is illuminating the entire world with light of His Vedic and Yogic knowledge of our Scriptures. Jai Shree Radhey!!!
Tuesday, February 26, 2013
लोकरंजन का लक्ष्य भी घोर कुसंग है। प्राय: साधक थोड़ा बहुत समझ लेने पर अथवा थोड़ा बहुत अनुभव कर लेने पर, उसे दुनिया के सामने गाता फिरता है,एवं धीरे धीरे यह अभिमान का रूप धारण कर लेता है,जिसके परिणाम-स्वरूप साधक की वास्तविक निधि ,दीनता छिन जाती है एवं हँसी-हँसी में लोकरंजन की बुद्धि परिपक्व हो जाती है। अतएव साधक को लोकरंजन रूपी महाव्याधि से बचना चाहिये।
-------जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाप्रभु।
-------जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाप्रभु।
किसी को कभी किसी जन्म में श्रोत्रिय ब्रहमनिष्ठ महापुरुष गुरु मिल जाये और वह श्रद्धालु विरक्त जिज्ञासु उसे गुरु मान ले यह बहुत बड़ी भगवदकृपा है। गुरु शिष्य नहीं बनायेगा,शिष्य को मन से गुरु मानना होगा। कोई महापुरुष किसी जीव को शिष्य तब तक न बनायेगा जब तक उसका अंत:करण पूर्णतया शुद्ध न हो जायेगा।
-------जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाप्रभु।
-------जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाप्रभु।
JAGADGURU SHRI KRIPALUJI MAHARAJ HAS BEEN SHOWERING 'BRAJ RAS' SINCE 1938. FOR THE GOOD OF THE SOULS, HE HAS REVEALED A RECONCILED AND UNIFIED THEORY OF ALL THE BHARTIYA SCRIPTURES WHICH WAS PROPOUNDED BY PREVIOUS JAGADGURUS AND ACHARYAS IN VARIOUS WAYS,AND ESTABLISHED A SINGLE,SURE,SIMPLE,AND POTENT PATH OF DEVOTION TO GOD THAT COULD BE FOLLOWED BY EVERYONE DESIRING TO EXPERIENCE THE SUPREME FORM OF DIVINE LOVE.
JAGADGURU SHRI KRIPALUJI MAHARAJ HAS REJUVENATED AND RE-ESTABLISHED THE DEVOTIONAL PARAMPARA OF 'RAGANUGA BHAKTI' WHICH WAS INTRODUCED BY SHREE CHAITANYA MAHAPRABHU JI,AND HAS GIVEN IT A REFINED FORM THAT COULD BE FOLLOWED BY THE DEVOTEES OF THE WORLD,FOREVER.
JAGADGURU SHRI KRIPALUJI MAHARAJ HAS REJUVENATED AND RE-ESTABLISHED THE DEVOTIONAL PARAMPARA OF 'RAGANUGA BHAKTI' WHICH WAS INTRODUCED BY SHREE CHAITANYA MAHAPRABHU JI,AND HAS GIVEN IT A REFINED FORM THAT COULD BE FOLLOWED BY THE DEVOTEES OF THE WORLD,FOREVER.
तत्वज्ञान हेतु दो हैं गोविंद राधे |
एक गुरु एक वैराग्य बता दे ||
भावार्थ- तत्व-ज्ञान की प्राप्ति में दो ही कारण है | प्रथम सांसारिक विषयों से वैराग्य हो, द्वितीय श्रोत्रिय ब्रह्मनिष्ठ गुरु प्राप्त हो | यदि वैराग्य नहीं है तो गुरु भी तत्व-ज्ञान प्रदान नहीं कर सकता | यदि वैराग्य है परन्तु गुरु प्राप्त नहीं है तो भी तत्व-ज्ञान नहीं होगा |
... गुरु ते ही हरिज्ञान गोविंद राधे |
गुरु बिनु क, ख, ग, घ, ज्ञान ना बता दे ||
भावार्थ- गुरु द्वारा ही श्रीहरि के स्वरूप का सच्चा तत्व-ज्ञान प्राप्त होता है | गुरु के अभाव में तो संसार में क, ख, ग, घ का ज्ञान भी असम्भव है |
श्रोत्रिय ब्रह्मनिष्ठ गोविंद राधे |
गुरु ही ईश्वरीय ज्ञान करा दे ||
भावार्थ- जो गुरु श्रोत्रिय व ब्रह्मनिष्ठ है अर्थात् जिसे वेद-शस्त्र का ज्ञान भी हो एवं भगवत्प्राप्ति भी किये हो, वही ईश्वरीय तत्व-ज्ञान प्रदान कर सकता है |
..................राधा गोविंद गीत ( जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज ).................
एक गुरु एक वैराग्य बता दे ||
भावार्थ- तत्व-ज्ञान की प्राप्ति में दो ही कारण है | प्रथम सांसारिक विषयों से वैराग्य हो, द्वितीय श्रोत्रिय ब्रह्मनिष्ठ गुरु प्राप्त हो | यदि वैराग्य नहीं है तो गुरु भी तत्व-ज्ञान प्रदान नहीं कर सकता | यदि वैराग्य है परन्तु गुरु प्राप्त नहीं है तो भी तत्व-ज्ञान नहीं होगा |
... गुरु ते ही हरिज्ञान गोविंद राधे |
गुरु बिनु क, ख, ग, घ, ज्ञान ना बता दे ||
भावार्थ- गुरु द्वारा ही श्रीहरि के स्वरूप का सच्चा तत्व-ज्ञान प्राप्त होता है | गुरु के अभाव में तो संसार में क, ख, ग, घ का ज्ञान भी असम्भव है |
श्रोत्रिय ब्रह्मनिष्ठ गोविंद राधे |
गुरु ही ईश्वरीय ज्ञान करा दे ||
भावार्थ- जो गुरु श्रोत्रिय व ब्रह्मनिष्ठ है अर्थात् जिसे वेद-शस्त्र का ज्ञान भी हो एवं भगवत्प्राप्ति भी किये हो, वही ईश्वरीय तत्व-ज्ञान प्रदान कर सकता है |
..................राधा गोविंद गीत ( जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज ).................
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एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...
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Baar Baar suno, Baar Baar suno, tab tatvagyan paripakva hoga. Ye jo hum Logo ko Brham hota hai ki yeh to maine bahut suna hai, yeh to mein j...
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ए # मनुष्यों ! # मानव_देह प्राप्त हुआ है , # भगवतप्राप्ति के लिये केवल, इसकाे मत गँवाओ, व्यर्थ # भाेग_विलास में केवल लिप्त रह कर...






