This Blog is dedicated to the Lotus Feet of my Spiritual Master - Jagadguru Shri Kripaluji Maharaj, who is the Descension of the Bliss of Divine Love, who is illuminating the entire world with light of His Vedic and Yogic knowledge of our Scriptures. Jai Shree Radhey!!!
Saturday, March 2, 2013
ALWAYS REMEMBER..........Rules for doing devotion...............
1. Remember the form of God (Roop Dhyan) while singing the glories of God.
2. Apart from the Sankirtan in your free time, chant Radhey-Radhey with every breath.
3. Realizing the Grace of God and Guru, be grateful to them all the time and try to shed tears.
4. Think of yourselves as the most powerless person and treat the other devotees with extreme respect.
5. Think of God and Guru positively.
6. Do your devotion with a feeling that God and Guru are one.
7. Feel that God and Guru are monitoring and protecting you all the time.
8. Spend every moment in remembrance of God.
9. Never make a desire for liberation. Cry and beg Radha Rani and Shri Krishn for their selfless love only.
10. Do not show ecstasy.
11. Avoid criticizing or complaining about others.
.......AS TOLD BY SHRI KRIPALUJI MAHAPRABHU.
1. Remember the form of God (Roop Dhyan) while singing the glories of God.
2. Apart from the Sankirtan in your free time, chant Radhey-Radhey with every breath.
3. Realizing the Grace of God and Guru, be grateful to them all the time and try to shed tears.
4. Think of yourselves as the most powerless person and treat the other devotees with extreme respect.
5. Think of God and Guru positively.
6. Do your devotion with a feeling that God and Guru are one.
7. Feel that God and Guru are monitoring and protecting you all the time.
8. Spend every moment in remembrance of God.
9. Never make a desire for liberation. Cry and beg Radha Rani and Shri Krishn for their selfless love only.
10. Do not show ecstasy.
11. Avoid criticizing or complaining about others.
.......AS TOLD BY SHRI KRIPALUJI MAHAPRABHU.
Friday, March 1, 2013
ऐसे शब्द ज्ञानी भी गोविंद राधे |
ज्ञान दे आपु रहे कोरा बता दे ||
भावार्थ- जिसे केवल शास्त्रीय ज्ञान है, ईश्वर का अनुभव नहीं है वह दूसरों को ज्ञान तो प्रदान कर सकता है किन्तु प्रेम के बिना वह स्वयं अज्ञानी ही बना रहता है |
... शास्त्रानभिज्ञ जन गोविंद राधे |
विरक्त भी ज्ञान दे ना बता दे ||
भावार्थ- शस्त्र ज्ञान से रहित कोई यदि पूर्ण विरक्त भी है तो भी वह किसी को ज्ञान प्रदान नहीं कर सकता |
गुरु वेदवित हो गोविंद राधे |
दिव्य प्रेमयुक्त भी हो हरि ते मिला दे ||
भावार्थ- गुरु जो शास्त्रों वेदों का ज्ञाता भी हो और जिसके पास दिव्य प्रेम भी हो वही भगवत्प्राप्ति करा सकता है |
..................राधा गोविंद गीत ( जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज )...........
ज्ञान दे आपु रहे कोरा बता दे ||
भावार्थ- जिसे केवल शास्त्रीय ज्ञान है, ईश्वर का अनुभव नहीं है वह दूसरों को ज्ञान तो प्रदान कर सकता है किन्तु प्रेम के बिना वह स्वयं अज्ञानी ही बना रहता है |
... शास्त्रानभिज्ञ जन गोविंद राधे |
विरक्त भी ज्ञान दे ना बता दे ||
भावार्थ- शस्त्र ज्ञान से रहित कोई यदि पूर्ण विरक्त भी है तो भी वह किसी को ज्ञान प्रदान नहीं कर सकता |
गुरु वेदवित हो गोविंद राधे |
दिव्य प्रेमयुक्त भी हो हरि ते मिला दे ||
भावार्थ- गुरु जो शास्त्रों वेदों का ज्ञाता भी हो और जिसके पास दिव्य प्रेम भी हो वही भगवत्प्राप्ति करा सकता है |
..................राधा गोविंद गीत ( जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज )...........
पुण्यपुंज हरि कृपा गोविंद राधे |
संत मिले सत्संग बिगरी बना दे ||
भावार्थ- संत मिलन के दो हेतु हैं पुण्य पुंज भी हों और हरि कृपा भी हो | जब संत मिलन हो जाय तब सत्संग से ही मनुष्य की अनादि काल की बिगड़ी बन जाती है |
प्रेम सम साध्य नहिं गोविंद राधे |
सद्गुरु सम न हितैषी बता दे ||
भावार्थ- जगत में जितने भी साधन हैं उन सबके द्वारा प्राप्तव्य साध्य एकमात्र प्रेम ही है | उस प्राप्तव्य को दिलाने वाले सद्गुरु के समान कोई हितैषी नहीं है |
पाप ते बचावे अरु गोविंद राधे |
हरि में लगावे सो हितैषी बता दे ||
भावार्थ- जो पाप कर्म से बचाने में सहायक बने तथा हरि के मार्ग पर चलावे वही सच्चा हितैषी है |
.राधा गोविंद गीत ( जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज ).
संत मिले सत्संग बिगरी बना दे ||
भावार्थ- संत मिलन के दो हेतु हैं पुण्य पुंज भी हों और हरि कृपा भी हो | जब संत मिलन हो जाय तब सत्संग से ही मनुष्य की अनादि काल की बिगड़ी बन जाती है |
प्रेम सम साध्य नहिं गोविंद राधे |
सद्गुरु सम न हितैषी बता दे ||
भावार्थ- जगत में जितने भी साधन हैं उन सबके द्वारा प्राप्तव्य साध्य एकमात्र प्रेम ही है | उस प्राप्तव्य को दिलाने वाले सद्गुरु के समान कोई हितैषी नहीं है |
पाप ते बचावे अरु गोविंद राधे |
हरि में लगावे सो हितैषी बता दे ||
भावार्थ- जो पाप कर्म से बचाने में सहायक बने तथा हरि के मार्ग पर चलावे वही सच्चा हितैषी है |
.राधा गोविंद गीत ( जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज ).
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मन का अटैचमेंट किसमें करें?
एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...
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Baar Baar suno, Baar Baar suno, tab tatvagyan paripakva hoga. Ye jo hum Logo ko Brham hota hai ki yeh to maine bahut suna hai, yeh to mein j...
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गुरु में हरिबुद्धि रखो सदा गुरुधामा | नरबुद्धि आने नहिं पाये आठु यामा || गुरु के प्रति सदैव भगवद् बुद्धि ही रखो | निरन्तर यह सावधानी र...
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ए # मनुष्यों ! # मानव_देह प्राप्त हुआ है , # भगवतप्राप्ति के लिये केवल, इसकाे मत गँवाओ, व्यर्थ # भाेग_विलास में केवल लिप्त रह कर...






