Saturday, March 2, 2013

ALWAYS REMEMBER..........Rules for doing devotion...............

1. Remember the form of God (Roop Dhyan) while singing the glories of God.

2. Apart from the Sankirtan in your free time, chant Radhey-Radhey with every breath.

3. Realizing the Grace of God and Guru, be grateful to them all the time and try to shed tears.

4. Think of yourselves as the most powerless person and treat the other devotees with extreme respect.

5. Think of God and Guru positively.

6. Do your devotion with a feeling that God and Guru are one.

7. Feel that God and Guru are monitoring and protecting you all the time.

8. Spend every moment in remembrance of God.

9. Never make a desire for liberation. Cry and beg Radha Rani and Shri Krishn for their selfless love only.

10. Do not show ecstasy.

11. Avoid criticizing or complaining about others.

.......AS TOLD BY SHRI KRIPALUJI MAHAPRABHU.

 
ठहराये गए मुजरिम हम प्यार कर के तुमसे,
तुमसे भी तो कोई पूछे, तुम क्यों हुए प्यारे..........
ठहराये गए मुजरिम हम प्यार कर के तुमसे,
तुमसे भी तो कोई पूछे, तुम क्यों हुए प्यारे..........

Friday, March 1, 2013

श्यामा श्याम की प्राप्ति गुरु द्वारा ही होगी। अतएव गुरु की शरणागति निरंतर बनी रहे, तदर्थ निरंतर अनुकूल भाव से ही अनुसरण करना है तथा सदा यही सोचना है कि वे ही हमारे हैं। शेष सभी सफर के यात्री मिलन के समान हैं।
------जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज।
श्यामा श्याम की प्राप्ति गुरु द्वारा ही होगी। अतएव गुरु की शरणागति निरंतर बनी रहे, तदर्थ निरंतर अनुकूल भाव से ही अनुसरण करना है तथा सदा यही सोचना है कि वे ही हमारे हैं। शेष सभी सफर के यात्री मिलन के समान हैं।
 ------जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज।




ऐसे शब्द ज्ञानी भी गोविंद राधे |
ज्ञान दे आपु रहे कोरा बता दे ||

भावार्थ- जिसे केवल शास्त्रीय ज्ञान है, ईश्वर का अनुभव नहीं है वह दूसरों को ज्ञान तो प्रदान कर सकता है किन्तु प्रेम के बिना वह स्वयं अज्ञानी ही बना रहता है |

... शास्त्रानभिज्ञ जन गोविंद राधे |
विरक्त भी ज्ञान दे ना बता दे ||

भावार्थ- शस्त्र ज्ञान से रहित कोई यदि पूर्ण विरक्त भी है तो भी वह किसी को ज्ञान प्रदान नहीं कर सकता |

गुरु वेदवित हो गोविंद राधे |
दिव्य प्रेमयुक्त भी हो हरि ते मिला दे ||

भावार्थ- गुरु जो शास्त्रों वेदों का ज्ञाता भी हो और जिसके पास दिव्य प्रेम भी हो वही भगवत्प्राप्ति करा सकता है |

..................राधा गोविंद गीत ( जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज )...........

 



पुण्यपुंज हरि कृपा गोविंद राधे |
संत मिले सत्संग बिगरी बना दे ||

भावार्थ- संत मिलन के दो हेतु हैं पुण्य पुंज भी हों और हरि कृपा भी हो | जब संत मिलन हो जाय तब सत्संग से ही मनुष्य की अनादि काल की बिगड़ी बन जाती है |
 
प्रेम सम साध्य नहिं गोविंद राधे |
सद्गुरु सम न हितैषी बता दे ||

भावार्थ- जगत में जितने भी साधन हैं उन सबके द्वारा प्राप्तव्य साध्य एकमात्र प्रेम ही है | उस प्राप्तव्य को दिलाने वाले सद्गुरु के समान कोई हितैषी नहीं है |

पाप ते बचावे अरु गोविंद राधे |
हरि में लगावे सो हितैषी बता दे ||

भावार्थ- जो पाप कर्म से बचाने में सहायक बने तथा हरि के मार्ग पर चलावे वही सच्चा हितैषी है |

.राधा गोविंद गीत ( जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज ).
पुण्यपुंज हरि कृपा गोविंद राधे |
संत मिले सत्संग बिगरी बना दे ||

भावार्थ- संत मिलन के दो हेतु हैं पुण्य पुंज भी हों और हरि कृपा भी हो | जब संत मिलन हो जाय तब सत्संग से ही मनुष्य की अनादि काल की बिगड़ी बन जाती है |

प्रेम सम साध्य नहिं गोविंद राधे | 
सद्गुरु सम न हितैषी बता दे ||

भावार्थ-  जगत में जितने भी साधन हैं उन सबके द्वारा प्राप्तव्य साध्य एकमात्र प्रेम ही है | उस प्राप्तव्य को दिलाने वाले सद्गुरु के समान कोई हितैषी नहीं है |

पाप ते बचावे अरु गोविंद राधे |
हरि में लगावे सो हितैषी बता दे ||

भावार्थ-  जो पाप कर्म से बचाने में सहायक बने तथा हरि के मार्ग पर चलावे वही सच्चा हितैषी है |

..................राधा गोविंद गीत ( जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज ).................

 
 

येषां संस्मरणात पुंसां सधयःशुद्धयन्ति वै गृहाः
किं पुनदर्शनस्पर्शपादशौचासनादिभिः (भागवत - 1 -19 -33 )

शास्त्र कहते है की गुरु के स्मरण मात्र से ही अन्तः करण रूपी गृह शुद्ध हो जाता है. फिर उनके साक्षात् दर्शन, उनके श्री चरणों का स्पर्श, उनके श्री युगल चरणों का प्रक्षालन, उनका सानिध्य एवं सत्संग आदि मिल जाये, ये तो हम कलयुग के अधम जीवो का परम सौभाग्य है, ये विशेष भगवत्कृपा है.
येषां संस्मरणात पुंसां सधयःशुद्धयन्ति वै गृहाः 
किं पुनदर्शनस्पर्शपादशौचासनादिभिः (भागवत - 1 -19 -33 ) 

शास्त्र कहते है की गुरु के स्मरण मात्र से ही अन्तः करण रूपी गृह शुद्ध हो जाता है. फिर उनके साक्षात् दर्शन, उनके श्री चरणों का स्पर्श, उनके श्री युगल चरणों का प्रक्षालन, उनका सानिध्य एवं सत्संग आदि मिल जाये, ये तो हम कलयुग के अधम जीवो का परम सौभाग्य है, ये विशेष भगवत्कृपा है.
Be a lover of God, not of the world. Do not beg your God and Master for health, wealth and material goods. When you bow to God but desire the world, you prove that you love not the Creator, but His creation. If you insist on asking God for something, ask the same thing as Prahlad: "God! Kindly destroy the very seed of desire that exists in my heart."

- Jagadguru Shree Kripaluji Maharaj.
Be a lover of God, not of the world. Do not beg your God and Master for health, wealth and material goods. When you bow to God but desire the world, you prove that you love not the Creator, but His creation. If you insist on asking God for something, ask the same thing as Prahlad: "God! Kindly destroy the very seed of desire that exists in my heart."
 
- Jagadguru Shree Kripaluji Maharaj.

 

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...