Saturday, March 2, 2013

वे जरा अटपटे स्वभाव के हैं । छिप छिप कर देखते हैं एवं अब तुम जरा सा असावधान होकर संसारी वस्तु की आसक्ति मे बह जाते हो तब श्याम सुंदर को वेदना होती है की यह मुझे अपना मान कर भी गलत काम कर रहा है । मन श्यामसुंदर को दे देने के पश्चात ! उसमे संसारिक चाह न लाना चाहिए । यह श्यामसुंदर के लिए कष्टप्रद है ।
जीवन क्षणभंगुर है, अपने जीवन का क्षण क्षण हरि-गुरु के स्मरण में ही व्यतीत करो, अनावश्यक बातें करके समय बरबाद न करो। कुसंग से बचो, कम से कम लोगो से संबंध रखो, काम जितना जरूरी हो बस उतना बोलो।
वे जरा अटपटे स्वभाव के हैं । छिप छिप कर देखते हैं एवं अब तुम जरा सा असावधान होकर संसारी वस्तु की आसक्ति मे बह जाते हो तब श्याम सुंदर को वेदना होती है की यह मुझे अपना मान कर भी गलत काम कर रहा है । मन श्यामसुंदर को दे देने के पश्चात ! उसमे संसारिक चाह न लाना चाहिए । यह श्यामसुंदर के लिए कष्टप्रद है ।
 जीवन क्षणभंगुर है, अपने जीवन का क्षण क्षण हरि-गुरु के स्मरण में ही व्यतीत करो, अनावश्यक बातें करके समय बरबाद न करो। कुसंग से बचो, कम से कम लोगो से संबंध रखो, काम जितना जरूरी हो बस उतना बोलो।

 

एक भक्त की विनती.........
एक आस विश्वास तुम्हारों तुम हो करुणाकर सरकार।
दान करे से घटी नहीं जाइहै, तुम्हारी कृपा का भण्डार।
भक्तन की सौगन्ध तुम्हें है,सुन लो भक्तन के रखवार।
नाम 'कृपालु' काम तुम जानत,दे दो प्रेम सुधा रससार।।
एक भक्त की विनती.........
एक आस विश्वास तुम्हारों तुम हो करुणाकर सरकार।
दान करे से घटी नहीं जाइहै, तुम्हारी कृपा का भण्डार।
भक्तन की सौगन्ध तुम्हें है,सुन लो भक्तन के रखवार।
नाम 'कृपालु' काम तुम जानत,दे दो प्रेम सुधा रससार।।

 
 
 

 
‎1.हरि और गुरु केवल अधिकारी जीव को ही खींच सकते हैं, अनाधिकारी जीव को नहीं। जैसे लोहा जितनी ज्यादा मात्रा में शुद्ध होगा ,चुंबक से उतना ही शीघ्र खिंच जाएगा।

2.जब तक लोक और परलोक दोनों की चाहत रहेगी ,तब तक प्रेमानन्द नहीं मिल सकता।

3.प्रारब्ध उसी को कहते हैं कि जब दुख कि कल्पना की जाये किन्तु सुख प्राप्त हो,अथवा सुख की कल्पना की जाये और दुख प्राप्त हो।

4.श्री महाराजजी कहते हैं कि: जितनी क्षमा हम करते हैं ,उतना कोई नहीं कर सकता। कई बार सोचते है कि उसका परित्याग कर दिया जाये ,किन्तु फिर दया आ जाती है।

5.श्री महाराजजी समझाते हैं कि: जब हम कोई बात पूछे तो भोले बच्चों की भाँति सीधा सा उत्तर दिया करो।


6.जो शत प्रतिशत आज्ञापालन के लिए तैयार नहीं है ,वह कैसे आगे बढ्ने की आशा कर सकता है।

7.बुद्धि से गलत और विपरीत चिंतन करके साधक स्वयं अपना अहित कर लेता है।

8.दैहिक, दैविक, भौतिक तापो से तप्त भगवदबहिर्मुख जीवो को हरि सन्मुख करने के लिए जगदगुरू श्री कृपालुजी महाराज भगवन्नाम संकीर्तन को ही सर्वश्रेष्ठ बताते है . भगवन्नाम में पाप नाश करने को ऐसी शक्ति है की बड़े से बड़े पापी पापो से मुक्त होकर दिव्य प्रेम का पात्र बन जाता है।

-------जगद्गुरुत्तम भगवान श्री कृपालुजी महाराज।
1.हरि और गुरु केवल अधिकारी जीव को ही खींच सकते हैं, अनाधिकारी जीव को नहीं। जैसे लोहा जितनी ज्यादा मात्रा में शुद्ध होगा ,चुंबक से उतना ही शीघ्र खिंच जाएगा।

2.जब तक लोक और परलोक दोनों की चाहत रहेगी ,तब तक प्रेमानन्द नहीं मिल सकता।

3.प्रारब्ध उसी को कहते हैं कि जब दुख कि कल्पना की जाये किन्तु सुख प्राप्त हो,अथवा सुख की कल्पना की जाये और दुख प्राप्त हो।
 
4.श्री महाराजजी कहते हैं कि: जितनी क्षमा हम करते हैं ,उतना कोई नहीं कर सकता। कई बार सोचते है कि उसका परित्याग कर दिया जाये ,किन्तु फिर दया आ जाती है।
 
5.श्री महाराजजी समझाते हैं कि: जब हम कोई बात पूछे तो भोले बच्चों की भाँति सीधा सा उत्तर दिया करो।
 

6.जो शत प्रतिशत आज्ञापालन के लिए तैयार नहीं है ,वह कैसे आगे बढ्ने की आशा कर सकता है।

7.बुद्धि से गलत और विपरीत चिंतन करके साधक स्वयं अपना अहित कर लेता है।
 
8.दैहिक, दैविक, भौतिक तापो से तप्त भगवदबहिर्मुख जीवो को हरि सन्मुख करने के लिए जगदगुरू श्री कृपालुजी महाराज भगवन्नाम संकीर्तन को ही सर्वश्रेष्ठ बताते है . भगवन्नाम में पाप नाश करने को ऐसी शक्ति है की बड़े से बड़े पापी पापो से मुक्त होकर दिव्य प्रेम का पात्र बन जाता है।
 
-------जगद्गुरुत्तम भगवान श्री कृपालुजी महाराज।
 
O MY BELOVED,Everyone in the world,big or small,is a beggar,looking for material benefit and worldly love.It is only you,O Ocean of Love, who is the Giver of Divine Love.
O MY BELOVED,Everyone in the world,big or small,is a beggar,looking for material benefit and worldly love.It is only you,O Ocean of Love, who is the Giver of Divine Love.

 

सदा ये ध्यान रखो कि हरि-गुरु सदा मुझे एवं मेरे संकल्पों को देख रहे हैं। बस फिर न लापरवाही ही आयेगी न विस्मरण ही होगा।
........श्री महाराजजी।
ALWAYS REMEMBER..........Rules for doing devotion...............

1. Remember the form of God (Roop Dhyan) while singing the glories of God.

2. Apart from the Sankirtan in your free time, chant Radhey-Radhey with every breath.

3. Realizing the Grace of God and Guru, be grateful to them all the time and try to shed tears.

4. Think of yourselves as the most powerless person and treat the other devotees with extreme respect.

5. Think of God and Guru positively.

6. Do your devotion with a feeling that God and Guru are one.

7. Feel that God and Guru are monitoring and protecting you all the time.

8. Spend every moment in remembrance of God.

9. Never make a desire for liberation. Cry and beg Radha Rani and Shri Krishn for their selfless love only.

10. Do not show ecstasy.

11. Avoid criticizing or complaining about others.

.......AS TOLD BY SHRI KRIPALUJI MAHAPRABHU.

 
ठहराये गए मुजरिम हम प्यार कर के तुमसे,
तुमसे भी तो कोई पूछे, तुम क्यों हुए प्यारे..........
ठहराये गए मुजरिम हम प्यार कर के तुमसे,
तुमसे भी तो कोई पूछे, तुम क्यों हुए प्यारे..........

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...