Tuesday, March 5, 2013

एक क़ानून है भगवान का कि भगवान डाइरैक्ट जीव को कुछ नहीं देते ,गुरु के द्वारा ही दिलवाते हैं। वे कहते हैं में डाइरैक्ट कुछ नहीं दूंगा, केयर ऑफ महापुरुष तुमको सब कुछ मिलेगा 'तत्वज्ञान से लेकर भगवतप्राप्ति तक'।
एक क़ानून है भगवान का कि भगवान डाइरैक्ट जीव को कुछ नहीं देते ,गुरु के द्वारा ही दिलवाते हैं। वे कहते हैं में डाइरैक्ट कुछ नहीं दूंगा, केयर ऑफ महापुरुष तुमको सब कुछ मिलेगा 'तत्वज्ञान से लेकर भगवतप्राप्ति तक'।


What you need to know about Shree Maharajji is that if you have accepted him in your heart, then he has already accepted you. There does not have to be a formal recognition of that. Shree Maharajji does not do formal initiation, nor is there any need to verbally state that you have accepted him as your Guru. If you have surrendered to him internally, then he is already Gracing you. You should focus on applying his teachings in your life.
"What you need to know about Shree Maharajji is that if you have accepted him in your heart, then he has already accepted you. There does not have to be a formal recognition of that. Shree Maharajji does not do formal initiation, nor is there any need to verbally state that you have accepted him as your Guru. If you have surrendered to him internally, then he is already Gracing you. You should focus on applying his teachings in your life."

 

Always remember your impending time of death. No one knows if he will live to see the next moment or not. Who knows if he will live to see tomorrow?
----jagadguru shri kripaluji maharaj.
Always remember your impending time of death. No one knows if he will live to see the next moment or not. Who knows if he will live to see tomorrow?
 ----jagadguru shri kripaluji maharaj.

In God's court, there cannot be any mistakes because He, Himself is the witness. He, Himself is the judge and He, Himself is the Dispenser of justice.

- Jagadguru Shree Kripaluji Maharaj.
In God's court, there cannot be any mistakes because He, Himself is the witness. He, Himself is the judge and He, Himself is the Dispenser of justice.
 
- Jagadguru Shree Kripaluji Maharaj.

 
 

"BHAKTI IS THE ONLY SUPREME PATH TO GOD.SELFLESS BHAKTI ENSURES DIVINE VISION,DIVINE KNOWLEDGE AND DIVINE UNITY WITH THE SUPREME FORM OF GOD,KRISHN.
-----JAGADGURU SHRI KRIPALUJI MAHARAJ."

"BHAKTI IS THE ONLY SUPREME PATH TO GOD.SELFLESS BHAKTI ENSURES DIVINE VISION,DIVINE KNOWLEDGE AND DIVINE UNITY WITH THE SUPREME FORM OF GOD,KRISHN.
 -----JAGADGURU SHRI KRIPALUJI MAHARAJ."

 

कुछ समय का नियम बनाकर प्रतिदिन श्यामसुन्दर का स्मरण करते हुए रोकर उनके नाम, गुण, लीलादी का संकीर्तन एवं स्मरण करो एवं शेष समय में संसार का आवश्यक कार्य करते हुए बार बार यह महसूस करो के श्यामसुंदर और गुरु हमारे प्रत्येक कार्य को देख रहे है और उन्हें हम दिखा दिखाकर कार्य कर रहे है. इस प्रकार कर्म भी न्यायपूर्ण होगा एवं थकावट भी न होगी. एक बार करके देखिये.
.......जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज.
कुछ समय का नियम बनाकर प्रतिदिन श्यामसुन्दर का स्मरण करते हुए रोकर उनके नाम, गुण, लीलादी का संकीर्तन एवं स्मरण करो एवं शेष समय में संसार का आवश्यक कार्य करते हुए बार बार यह महसूस करो के श्यामसुंदर और गुरु हमारे प्रत्येक कार्य को देख रहे है और उन्हें हम दिखा दिखाकर कार्य कर रहे है. इस प्रकार कर्म भी न्यायपूर्ण होगा एवं थकावट भी न होगी. एक बार करके देखिये. 
.......जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज.


स्वार्थ तजि जो कर गोविंद राधे |
पर उपकार महामानव बता दे ||

भावार्थ- जो स्वार्थ त्याग कर परोपकार करता है वह महामानव है |

...
स्वार्थ साथ जो कर गोविंद राधे |
पर उपकार वाय मानव बता दे ||

भावार्थ- अपने स्वार्थ की पूर्ति के साथ साथ जो दूसरों के सुख का भी ध्यान रखता है वह मानव है |

स्वार्थ हित जो कर गोविंद राधे |
पर अपकार वाय असुर बता दे ||

भावार्थ- जो अपने स्वार्थ के वशीभूत होकर दूसरे का अपकार करता है वह दानव है |

..................राधा गोविंद गीत ( जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज ).................
स्वार्थ तजि जो कर गोविंद राधे |
पर उपकार महामानव बता दे ||

भावार्थ- जो स्वार्थ त्याग कर परोपकार करता है वह महामानव है |

स्वार्थ साथ जो कर गोविंद राधे |
पर उपकार वाय मानव बता दे ||

भावार्थ- अपने स्वार्थ की पूर्ति के साथ साथ जो दूसरों के सुख का भी ध्यान रखता है वह मानव है | 

स्वार्थ हित जो कर गोविंद राधे |
पर अपकार वाय असुर बता दे ||

भावार्थ- जो अपने स्वार्थ के वशीभूत होकर दूसरे का अपकार करता है वह दानव है |

..................राधा गोविंद गीत ( जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज ).................

 

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...