Thursday, March 7, 2013

बिना कहे सेवा जो करे योग्य शिष्य वो होता है ,बिना कहे सेवा करता है , आइडिया ( idea ) लगा करके , गुरु को क्या चाहिये इस समय , क्या आवश्यकता है, उनको ? और नं .2 की सेवा है , हम नहीं जान पाते क्या चाहिए , तो गुरु ने जो आज्ञा दी, उसको अपना सौभाग्य मानकर सहर्ष सेवा करे , ये नं .2 की सेवा है। और अब गुरु जी ने कहा है तो करना पड़ेगा , ये सोचकर के सेवा करें ये थर्ड क्लास (third class) की सेवा है , और सेवा की सामर्थ्य होते हुए भी कह दे , झूठ बोल दे कि , मैं नहीं कर सकता , ये नामापराध है।
::::::::::::जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज:::::::::::::
बिना कहे सेवा जो करे योग्य शिष्य वो होता है ,बिना कहे सेवा करता है , आइडिया ( idea ) लगा करके , गुरु को क्या चाहिये इस समय , क्या आवश्यकता है, उनको ? और नं .2 की सेवा है , हम नहीं जान पाते क्या चाहिए , तो गुरु ने जो आज्ञा दी, उसको  अपना सौभाग्य मानकर सहर्ष सेवा करे , ये नं .2 की सेवा है। और अब गुरु जी ने कहा है तो करना पड़ेगा , ये सोचकर के सेवा करें ये थर्ड क्लास (third class) की सेवा है , और सेवा की सामर्थ्य होते हुए भी कह दे , झूठ बोल दे कि , मैं नहीं कर सकता , ये नामापराध है।
::::::::::::जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज:::::::::::::

 

Priceless Treasure revealed by - Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj.

1 - Shri Krishna and Bliss are synonymous. Every person in the world desires only Bliss. In other words he is a servant of Bliss and therefore unknowingly, a servant of Shri Krishna.

2 - Shri Krishna (Divine Bliss) can be attained only through Bhaktiyoga, which is popularly known as Navadha Bhakti, the nine forms of devotional practice.
...
3 - It is only by devotional practice that the heart becomes pure and then one can attain Divine Love of Shri Krishna.

4 - It is impossible to attain the divine qualities such as truth, non-violence, etc. without the purification of heart.

5 - Every devotional practice is related only to the mind. Any spiritual discipline practised merely with the senses is not spiritual discipline at all.

6 - The consequences of love and hatred in the material world are the same; therefore, true detachment can be attained only by being neutral.

7 - The perfection of spiritual life is to perceive Shri Krishna in all objects of the world - animate as well as inanimate.

8 - Although human body is invaluable, yet it is transient. Therefore to procrastinate in devotional practice even for a moment is the greatest loss.

9 - To see faults in others is the surest proof that we possess faults our -selves.

10 - Spiritual practice is possible only under the guidance of a True Saint or Master.
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Priceless Treasure revealed by - Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj.

1 - Shri Krishna and Bliss are synonymous. Every person in the world desires only Bliss. In other words he is a servant of Bliss and therefore unknowingly, a servant of Shri Krishna.

2 - Shri Krishna (Divine Bliss) can be attained only through Bhaktiyoga, which is popularly known as Navadha Bhakti, the nine forms of devotional practice.

3 - It is only by devotional practice that the heart becomes pure and then one can attain Divine Love of Shri Krishna.

4 - It is impossible to attain the divine qualities such as truth, non-violence, etc. without the purification of heart.

5 - Every devotional practice is related only to the mind. Any spiritual discipline practised merely with the senses is not spiritual discipline at all.

6 - The consequences of love and hatred in the material world are the same; therefore, true detachment can be attained only by being neutral.

7 - The perfection of spiritual life is to perceive Shri Krishna in all objects of the world - animate as well as inanimate.

8 - Although human body is invaluable, yet it is transient. Therefore to procrastinate in devotional practice even for a moment is the greatest loss.

9 - To see faults in others is the surest proof that we possess faults our -selves.

10 - Spiritual practice is possible only under the guidance of a True Saint or Master.

 



रूपध्यान करते समय गुरु या भगवान् की जिस लीला में जाना चाहो , चले जाओ तथा उनके दिव्य मिलन व दर्शन के लिए तड़पन पैदा करो। लाख - लाख आसूँ बहाओ लेकिन किसी भी आसूँ को जब तक सच्चा न मानो , तब तक स्वयं श्यामसुंदर आकर अपने पीताम्बर से आँसुओं को न पोंछें। इतनी व्याकुलता पैदा करो कि नेत्र और प्राणों में बाजी लग जाये , पल-पल युग के समान लगे।

::::::::::जगद्गुरुत्तम श्री कृपालु महाप्रभु:::::::::::
रूपध्यान करते समय गुरु या भगवान् की जिस लीला में जाना चाहो , चले जाओ तथा उनके दिव्य मिलन व दर्शन के लिए तड़पन पैदा करो। लाख - लाख आसूँ बहाओ लेकिन किसी भी आसूँ को जब तक सच्चा न मानो , तब तक स्वयं श्यामसुंदर आकर अपने पीताम्बर से आँसुओं को न पोंछें। इतनी व्याकुलता पैदा करो कि नेत्र और प्राणों में बाजी लग जाये , पल-पल युग के समान लगे।

:::::::::::::::::::::::::जगद्गुरुत्तम श्री कृपालु महाप्रभु::::::::::::::::::::::::

 
देवदुर्लभ मानव देह अनन्त जीवों में किसी किसी भाग्यशाली को मिलता है। यानी पुरे ब्रह्माण्ड में केवल 7 अरब मानव हैं। जब कि एक फुट के गड्ढे में 7 अरब जीव रहते हैं। सोचो की तुम कितने भाग्यशाली हो।
फिर उन पाँच अरब में भी वे और भी भाग्यशाली हैं जो भारत में जन्म लिये हैं क्योंकि यहाँ जन्म से ही भगवान् का शब्द सुनने में आता है।
फिर भारत में भी वे और भी भाग्यशाली हैं जिनको कोई महापुरुष मिल गया है। जिसके पीछे भगवान् चरणधूलि के लिये चलते हैं।
फिर उन भाग्यशालियों में भी वे और भी भाग्यशाली हैं जो गृहस्थ के प्रपंच से गुरु द्वारा बचाये गये हैं।
फिर उनके भाग्य की सराहना कितनी की जाय जो गुरु आश्रम में परम त्यागमय जीवन - युक्त गुरु की सेवा करते हैं। इससे अधिक सौभाग्य असम्भव है।
~~~~~~~~~~जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज~~~~~~~~~~~
देवदुर्लभ मानव देह अनन्त जीवों में किसी किसी भाग्यशाली को मिलता है। यानी  पुरे ब्रह्माण्ड में केवल 5 अरब मानव हैं। जब कि एक फुट के गड्ढे में 5 अरब जीव रहते हैं। सोचो की तुम कितने भाग्यशाली हो।
फिर उन पाँच अरब में  भी वे और भी भाग्यशाली हैं जो भारत में जन्म लिये हैं क्योंकि यहाँ जन्म से ही भगवान् का शब्द सुनने में आता है।
फिर भारत में भी वे और भी भाग्यशाली हैं जिनको कोई महापुरुष मिल गया है। जिसके पीछे भगवान् चरणधूलि के लिये चलते हैं।
 फिर उन भाग्यशालियों में भी वे और भी भाग्यशाली हैं जो गृहस्थ के प्रपंच से गुरु द्वारा बचाये गये हैं।
फिर उनके भाग्य की सराहना कितनी की जाय जो गुरु आश्रम में परम त्यागमय जीवन - युक्त गुरु की सेवा करते हैं। इससे अधिक सौभाग्य असम्भव है।
~~~~~~~~~~जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज~~~~~~~~~~~

 

वेद से लेकर रामायण तक अनन्त कोटि कल्प तक अध्ययन करके देख लो यही पाओगे कि गुरु और भगवान् एक ही हैं , अतः गुरु - सेवा ही सर्वश्रेष्ठ लक्ष्य है।
::::::::::जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज:::::::::::
वेद से लेकर रामायण तक अनन्त कोटि कल्प तक अध्ययन  करके देख लो यही पाओगे कि  गुरु और भगवान् एक ही हैं , अतः गुरु - सेवा ही सर्वश्रेष्ठ लक्ष्य है।
::::::::::जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज:::::::::::

 
 

Tuesday, March 5, 2013

बिना सद्गुरु की कृपा के इस संसार रूपी भवसागर से पार पाना मुश्किल ही नहीं, असम्भव है।
बिना सद्गुरु की कृपा के इस संसार रूपी भवसागर से पार पाना मुश्किल ही नहीं, असम्भव है।

 

"जिस वातावरण से तुमको नुकसान होने वाला है,उस वातावरण में तुम क्यों जाते हों। शास्त्रों में लिखा है- धधकते अंगारों के बीच लोहे के पिंजरे में प्राण त्याग देना अच्छा है, बजाय इसके कि गलत atmosphere में पहुँच जाना। भगवदप्राप्ति के एक सेकंड पहले तक पग पग पर खतरा है। शास्त्रों का ज्ञाता जितेंद्रिय धर्मात्मा अजामिल भी एक क्षण के कुसंग से पापियों की example बन गया। अनंत जन्मों का गलत अभ्यास है इसलिए बिगड़ना जल्दी हो जाता है और बनना देर में होता है। बिगड़ने की बहुत लंबी प्रैक्टिस है।
-----जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज।"

"जिस वातावरण से तुमको नुकसान होने वाला है,उस वातावरण में तुम क्यों जाते हों। शास्त्रों में लिखा है- धधकते अंगारों के बीच लोहे के पिंजरे में प्राण त्याग देना अच्छा है, बजाय इसके कि गलत atmosphere में पहुँच जाना। भगवदप्राप्ति के एक सेकंड पहले तक पग पग पर खतरा है। शास्त्रों का ज्ञाता जितेंद्रिय धर्मात्मा अजामिल भी एक क्षण के कुसंग से पापियों की example बन गया। अनंत जन्मों का गलत अभ्यास है इसलिए बिगड़ना जल्दी हो जाता है और बनना देर में होता है। बिगड़ने की बहुत लंबी प्रैक्टिस है।
-----जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज।"

 

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...