Saturday, March 9, 2013

अपना प्रत्येक कार्य करते समय सदा यही विश्वास रखो कि मेरे प्रत्येक कार्य को महाराजजी देख रहें हैं।
अपना प्रत्येक कार्य करते समय सदा यही विश्वास रखो कि मेरे प्रत्येक कार्य को महाराजजी देख रहें हैं।

 

तुम लोग अपने मन को अपने शरण्य में रखो। परस्पर प्यार से रहो एवं स्वयं में दोष देखो, अपनी-अपनी सेवा करो। यदि मुझे सुख देना चाहते हो तो, सदा अपने मन को राग द्वेष रहित रखो एवं शरण्य से प्यार बढ़ाओ। मैं सदा तुम लोगो को याद करता हूँ, तथा एक-एक क्षण का आइडिया नोट करता हूँ। वेद से लेकर रामायण तक अनंत कोटि-कल्प तक अध्ययन करके देख लो यही पाओगे कि गुरु और भगवान एक ही है अत: गुरु सेवा ही सर्वश्रेष्ठ लक्ष्य है।
..........श्री महाराजजी।
तुम लोग अपने मन को अपने शरण्य में रखो। परस्पर प्यार से रहो एवं स्वयं में दोष देखो, अपनी-अपनी सेवा करो। यदि मुझे सुख देना चाहते हो तो, सदा अपने मन को राग द्वेष रहित रखो एवं शरण्य से प्यार बढ़ाओ। मैं सदा तुम लोगो को याद करता हूँ, तथा एक-एक क्षण का आइडिया नोट करता हूँ। वेद से लेकर रामायण तक अनंत कोटि-कल्प तक अध्ययन करके देख लो यही पाओगे कि गुरु और भगवान एक ही है अत: गुरु सेवा ही सर्वश्रेष्ठ लक्ष्य है।
 ..........श्री महाराजजी।

 
 

Thursday, March 7, 2013

समस्त आध्यात्मिक शंकाओ का अकाट्य तर्कों द्वारा पूर्ण समाधान........

जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज के प्रवचन नित्य प्रतिदिन अवश्य सुने।

राधे-राधे।
समस्त आध्यात्मिक शंकाओ का अकाट्य तर्कों द्वारा पूर्ण समाधान........
 
जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज के प्रवचन नित्य प्रतिदिन अवश्य सुने।
 
राधे-राधे।

 
साधूनां दर्शनं तिर्थभूता ही साधवः।
कालेन फलते तीर्थं सद्य साधुसमागमः।।

साधुओं का शरीर ही तीर्थ स्वरुप है, उनके दर्शन से ही पुण्य होता है।साधुओ में और तीर्थो में एक बड़ा भारी अंतर है,तीर्थो में जाने का फल तो कालांतर से मिलता है,किन्तु साधुओ के समागम का फल तत्काल ही मिल जाता है.।अतः सच्चे साधुओ का सत्संग तो बहुत दूर की बात है , उनका दर्शन ही कोटि तीर्थो से अधिक होता है।

The body of the saints are just like a pilgrim. The only darshan of a true saint equalizes Punya(Good Deeds) of that obtained from going to a pilgrims. The most important difference between the saint and pilgrims is that the fruit of going to pilgrims will be obtained after long long time but the benefit or fruit of saints company will be obtained immediately. Therefore only the darshan of true saints have more fruit or good deeds than that of going to the pilgrims.
साधूनां दर्शनं तिर्थभूता ही साधवः।
कालेन फलते तीर्थं सद्य साधुसमागमः।।
 
साधुओं का शरीर ही तीर्थ स्वरुप है, उनके दर्शन से ही पुण्य होता है।साधुओ में और तीर्थो में एक बड़ा भारी अंतर है,तीर्थो में जाने का फल तो कालांतर से मिलता है,किन्तु साधुओ के समागम का फल तत्काल ही मिल जाता है.।अतः सच्चे साधुओ का सत्संग तो बहुत दूर की बात है , उनका दर्शन ही कोटि तीर्थो से अधिक होता है।

The body of the saints are just like a pilgrim. The only darshan of a true saint equalizes Punya(Good Deeds) of that obtained from going to a pilgrims. The most important difference between the saint and pilgrims is that the fruit of going to pilgrims will be obtained after long long time but the benefit or fruit of saints company will be obtained immediately. Therefore only the darshan of true saints have more fruit or good deeds than that of going to the pilgrims.

 

खल मिलि दु:ख देत गोविंद राधे |
सन्त बिछुरि दुख देत बता दे ||

भावार्थ- दुष्टों के मिलन में महान दु:ख की प्राप्ति होती है तो संतों के वियोग में |

...
नारियल सम सन्त गोविंद राधे |
बाहर कठोर भीतर मधुर बता दे ||

भावार्थ- संतजन नारियल फल के समान बाहर से कठोर तथा भीतर से सरस होते हैं |

बेर फल सम खल गोविंद राधे |
भीतर कठोर बाहर मधुर बता दे ||

भावार्थ- दुर्जन बेर के फल के समान बाहर मनोहर और भीतर से कठोर होते हैं |

खलमुख पद्मदल गोविंद राधे |
वाणी मधुर उर कैंची बता दे ||

भावार्थ- दुष्टों के मुख की वाणी कमल-दल के समान सुन्दर और मधुर अनुभव होती है किन्तु उनके हृदय में कपट की कैंची सी चला करती हैं |

..................राधा गोविंद गीत--------जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज.
खल मिलि दु:ख देत गोविंद राधे |
सन्त बिछुरि दुख देत बता दे ||

भावार्थ- दुष्टों के मिलन में महान दु:ख की प्राप्ति होती है तो संतों के वियोग में |

नारियल सम सन्त गोविंद राधे | 
बाहर कठोर भीतर मधुर बता दे ||

भावार्थ- संतजन नारियल फल के समान बाहर से कठोर तथा भीतर से सरस होते हैं |

बेर फल सम खल गोविंद राधे |
भीतर कठोर बाहर मधुर बता दे || 

भावार्थ- दुर्जन बेर के फल के समान बाहर मनोहर और भीतर से कठोर होते हैं |

खलमुख पद्मदल गोविंद राधे | 
वाणी मधुर उर कैंची बता दे ||

भावार्थ- दुष्टों के मुख की वाणी कमल-दल के समान सुन्दर और मधुर अनुभव होती है किन्तु उनके हृदय में कपट की कैंची सी चला करती हैं |


 ..................राधा गोविंद गीत ( जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज ).................


"ALWAYS REMEMBER: God's names, forms, attributes, pastimes, abodes and His saints are all one and the same, therefore keeping your mind attached to any of these is known as devotion."
........SHRI MAHARAJJI.

"ALWAYS REMEMBER: God's names, forms, attributes, pastimes, abodes and His saints are all one and the same, therefore keeping your mind attached to any of these is known as devotion."
........SHRI MAHARAJJI.

 

 
"‘Radha’ name is Radha Herself. If you just realize this truth, it is enough to explode your feelings of love for Her and to really feel Her presence in front of you…
------Shri Maharajji."
"‘Radha’ name is Radha Herself. If you just realize this truth, it is enough to explode your feelings of love for Her and to really feel Her presence in front of you… 
------Shri Maharajji."
 
 

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...