This Blog is dedicated to the Lotus Feet of my Spiritual Master - Jagadguru Shri Kripaluji Maharaj, who is the Descension of the Bliss of Divine Love, who is illuminating the entire world with light of His Vedic and Yogic knowledge of our Scriptures. Jai Shree Radhey!!!
Monday, March 11, 2013
टाइम बरबाद न करो। जितना समय पेट भरने के लिए जरूरी है उतना समय संसार को दो,बाकी टाइम का उपयोग करो। भगवदविषय में लगाओगे तो बहुत जल्दी आगे बढ़ जाओगे अंत:करण की शुद्धि की और। और अगर मर गए बीच में तो जो साधना की है हमारी है वो तुमको फिर मनुष्य बना देगी और फिर कोई गुरु मिल जायेगा या तुम्हारा वही पुराना गुरु दूसरा रूप धारण करके आ जायेगा और तुमको फिर आगे बढ़ाएगा। अँधेर नहीं है भगवान के यहाँ कि बीच में छोड़ दिया गुरुजी ने। ऐसा नहीं होता। वो सदा के लिए हमारा साथ देता है भगवद प्राप्ति तक। इसलिए टाइम का उपयोग करो,समय नष्ट न करो, साधना करते रहो।
------भगवान श्री कृपालुजी के मुखारविंद से.................
------भगवान श्री कृपालुजी के मुखारविंद से.................
Saturday, March 9, 2013
गुरु हरि का ही रूप गोविंद राधे |
जानो अरु मानो अरु औरों को जना दे ||
भावार्थ- ‘आचार्य मां विजानीयान्नावमन्येत कर्हिचित् |’ सद्गुरु प्राप्त हो जाने पर ‘गुरु भी हरि का ही रूप है’ स्वयं ऐसा विश्वास हृदय में धारण कर लेना चाहिये एवं दूसरों को भी यह सिद्धांत भली भाँति समझा देना चाहिये जिससे जीव नामापराध से बच सके |
जाने का अर्थ माने गोविंद राधे |
माने का अर्थ क्रिया रूप दे बता दे ||
भावार्थ- जानने का वास्तविक तात्पर्य है मानना एवं मानने का वास्तविक अर्थ ज्ञान को क्रिया रूप में परिणत करना है |
जाना तो अनंत बार गोविंद राधे |
माना नहिं हेतु महापाप बता दे ||
भावार्थ- जीव ने न जाने कितनी बार संत व भगवान् का दर्शन, संग आदि किया पर उन पर विश्वास नहीं किया अत: पाप ही करता रहा |
..................राधा गोविंद गीत ( जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज ).........
जानो अरु मानो अरु औरों को जना दे ||
भावार्थ- ‘आचार्य मां विजानीयान्नावमन्येत कर्हिचित् |’ सद्गुरु प्राप्त हो जाने पर ‘गुरु भी हरि का ही रूप है’ स्वयं ऐसा विश्वास हृदय में धारण कर लेना चाहिये एवं दूसरों को भी यह सिद्धांत भली भाँति समझा देना चाहिये जिससे जीव नामापराध से बच सके |
जाने का अर्थ माने गोविंद राधे |
माने का अर्थ क्रिया रूप दे बता दे ||
भावार्थ- जानने का वास्तविक तात्पर्य है मानना एवं मानने का वास्तविक अर्थ ज्ञान को क्रिया रूप में परिणत करना है |
जाना तो अनंत बार गोविंद राधे |
माना नहिं हेतु महापाप बता दे ||
भावार्थ- जीव ने न जाने कितनी बार संत व भगवान् का दर्शन, संग आदि किया पर उन पर विश्वास नहीं किया अत: पाप ही करता रहा |
..................राधा गोविंद गीत ( जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज ).........
पापों ते मलिन मन गोविंद राधे |
वेद गुरु वचनों में शंका करा दे ||
भावार्थ- जब तक मन शुद्ध नहीं होता तब तक वेद-वाणी एवं गुरु वचनों पर विश्वास नहीं होता |
भव रोग वैध वेद गोविंद राधे |
वेद ज्ञान गुरु ते गुरु वैध बता दे ||
भावार्थ- भव रोग का चिकित्सक शास्त्र है | शास्त्र-ज्ञान गुरु से होता है अत: गुरु ही वैध है |
वैध कहे औषधि ले गोविंद राधे |
रोगी कहे पूर्व मोहिं स्वस्थ बना दे ||
भावार्थ- रोगी का रोग दूर करने के लिये वैध औषधि लेने की सम्मति प्रदान करता है | यदि रोगी कहे कि पहले मुझे स्वस्थ कर दो फिर मैं औषधि ग्रहण करूँगा तो वैध भला रोगी की क्या सहायता कर सकता है |
..................राधा गोविंद गीत ( जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज )...........
वेद गुरु वचनों में शंका करा दे ||
भावार्थ- जब तक मन शुद्ध नहीं होता तब तक वेद-वाणी एवं गुरु वचनों पर विश्वास नहीं होता |
भव रोग वैध वेद गोविंद राधे |
वेद ज्ञान गुरु ते गुरु वैध बता दे ||
भावार्थ- भव रोग का चिकित्सक शास्त्र है | शास्त्र-ज्ञान गुरु से होता है अत: गुरु ही वैध है |
वैध कहे औषधि ले गोविंद राधे |
रोगी कहे पूर्व मोहिं स्वस्थ बना दे ||
भावार्थ- रोगी का रोग दूर करने के लिये वैध औषधि लेने की सम्मति प्रदान करता है | यदि रोगी कहे कि पहले मुझे स्वस्थ कर दो फिर मैं औषधि ग्रहण करूँगा तो वैध भला रोगी की क्या सहायता कर सकता है |
..................राधा गोविंद गीत ( जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज )...........
तुम लोग अपने मन को अपने शरण्य में रखो। परस्पर प्यार से रहो एवं स्वयं में दोष देखो, अपनी-अपनी सेवा करो। यदि मुझे सुख देना चाहते हो तो, सदा अपने मन को राग द्वेष रहित रखो एवं शरण्य से प्यार बढ़ाओ। मैं सदा तुम लोगो को याद करता हूँ, तथा एक-एक क्षण का आइडिया नोट करता हूँ। वेद से लेकर रामायण तक अनंत कोटि-कल्प तक अध्ययन करके देख लो यही पाओगे कि गुरु और भगवान एक ही है अत: गुरु सेवा ही सर्वश्रेष्ठ लक्ष्य है।
..........श्री महाराजजी।
..........श्री महाराजजी।
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मन का अटैचमेंट किसमें करें?
एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...






