Wednesday, March 27, 2013

मेरे प्राणाधार हैं, श्री गुरुवर के चरणारविंद।
मेरे प्राणाधार हैं, श्री गुरुवर के चरणारविंद।

 
संसार में सभी चीजें सही है, गलत कुछ भी नहीं है। आपको अपने लिये देखना है कि हमारे अनुकूल क्या है।

........श्री महाराजजी।
संसार में सभी चीजें सही है, गलत कुछ भी नहीं है। आपको अपने लिये देखना है कि हमारे अनुकूल क्या है।
 
........श्री महाराजजी।

 
हरि भक्ति सर्वश्रेष्ठ गोविंद राधे |
वाते भी श्रेष्ठ गुरु भक्ति बता दे ||

भावार्थ- सबसे ऊँची भक्ति भगवान् श्रीकृष्ण की है, किन्तु उससे भी ऊँची भक्ति गुरु की है |
 
हरि कह ऊधो मेरी गोविंद राधे |
पूजा ते श्रेष्ठ गुरुपूजा बता दे ||

भावार्थ- भगवान् उद्धव से कहते हैं कि हे उद्धव ! मेरी पूजा से श्रेष्ठ गुरु की पूजा है |

गुरु पाछे हरि चले गोविंद राधे |
गुरु पदरज उड़ि पावन बना दे ||

भावार्थ- गुरु की चरण रज को प्राप्त करने के लिये हरि सदा गुरु के पीछे पीछे चलते हैं कि उनकी चरण रज मस्तक पर धारण करके मैं पवित्र हो जाऊँ |


..राधा गोविंद गीत ( जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज ).
हरि भक्ति सर्वश्रेष्ठ गोविंद राधे |
वाते भी श्रेष्ठ गुरु भक्ति बता दे ||

भावार्थ- सबसे ऊँची भक्ति भगवान् श्रीकृष्ण की है, किन्तु उससे भी ऊँची भक्ति गुरु की है |

हरि कह ऊधो मेरी गोविंद राधे |
पूजा ते श्रेष्ठ गुरुपूजा बता दे ||

भावार्थ- भगवान् उद्धव से कहते हैं कि हे उद्धव ! मेरी पूजा से श्रेष्ठ गुरु की पूजा है |

 गुरु पाछे हरि चले गोविंद राधे |
गुरु पदरज उड़ि पावन बना दे ||

भावार्थ- गुरु की चरण रज को प्राप्त करने के लिये हरि सदा गुरु के पीछे पीछे चलते हैं कि उनकी चरण रज मस्तक पर धारण करके मैं पवित्र हो जाऊँ |

  ..................राधा गोविंद गीत ( जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज ).................

 

You can never repay your Guru for what he has given you, because material treasures cannot pay for spiritual goods, yet the scriptures state emphatically that you must serve your Guru with body, mind and wealth. Your Guru is not stingy with the spiritual gifts he showers upon you, nor does He ever tire of giving you grace. Why do you think that you have served Him enough?
Be greedy in serving the Guru. The best disciple is he who renders service without the Guru asking for it.
........JAGADGURU SHRI KRIPALUJI MAHAPRABHU.

You can never repay your Guru for what he has given you, because material treasures cannot pay for spiritual goods, yet the scriptures state emphatically that you must serve your Guru with body, mind and wealth. Your Guru is not stingy with the spiritual gifts he showers upon you, nor does He ever tire of giving you grace. Why do you think that you have served Him enough?
 Be greedy in serving the Guru. The best disciple is he who renders service without the Guru asking for it. 
........JAGADGURU SHRI KRIPALUJI MAHAPRABHU.

 

एक क़ानून है भगवान का कि भगवान डाइरैक्ट(direct) जीव को कुछ नहीं देते ,गुरु के द्वारा ही दिलवाते हैं। वे कहते हैं में डाइरैक्ट(direct) कुछ नहीं दूंगा, केयरऑफ(care of) महापुरुष तुमको सब कुछ मिलेगा 'तत्वज्ञान से लेकर भगवतप्राप्ति तक'।
एक क़ानून है भगवान का कि भगवान डाइरैक्ट(direct) जीव को कुछ नहीं देते ,गुरु के द्वारा ही दिलवाते हैं। वे कहते हैं में डाइरैक्ट(direct) कुछ नहीं दूंगा, केयरऑफ(care of) महापुरुष तुमको सब कुछ मिलेगा 'तत्वज्ञान से लेकर भगवतप्राप्ति तक'।

 

भगवान का उद्घोष:-

'मैं तो हूँ सन्तन को दास, भगत मेरे मुकुटमणि' ।
भगवान का उद्घोष:-
 
'मैं तो हूँ सन्तन को दास, भगत मेरे मुकुटमणि ।'

 
मन को भरोसा दिलाओ आठु यामा। तेरे तो हैं परम हितेषी श्याम श्यामा।।

और द्वार जाओ न,अनन्य बनो बामा।त्रिगुण ,त्रिताप,त्रिकर्म,काटें श्यामा।।

भोरे बनि जाओ क्योंकि भोरी भारी श्यामा। भोरी भारी को प्रिय भोरा उरधामा।।
...

हरि-गुरु ते न कछु माँगो ब्रजबामा। दोनों ते सदा करो प्रेम निष्कामा।।

माँगना हो तो माँगो सेवा श्याम श्यामा। सेवा हित पुनि माँगो प्रेम निष्कामा।।

जल बिनु मीन ज्यों विकल कह बामा। वैसे मन व्याकुल हो जाये बिनु श्यामा।।

रहा नहीं जाये जब मिले बिनु श्यामा। तब जानो प्रेमबीज़,जामा उरधामा।।

--------जगद्गुरुत्तम श्री कृपालुजी महाराज द्वारा रचित।
मन को भरोसा दिलाओ आठु यामा। तेरे तो हैं परम हितेषी श्याम श्यामा।।
 
और द्वार जाओ न,अनन्य बनो बामा।त्रिगुण ,त्रिताप,त्रिकर्म,काटें श्यामा।।
 
भोरे बनि जाओ क्योंकि भोरी भारी श्यामा। भोरी भारी को प्रिय भोरा उरधामा।।
 
हरि-गुरु ते न कछु माँगो ब्रजबामा। दोनों ते सदा करो प्रेम निष्कामा।।
 
माँगना हो तो माँगो सेवा श्याम श्यामा। सेवा हित पुनि माँगो प्रेम निष्कामा।।
 
जल बिनु मीन ज्यों विकल कह बामा। वैसे मन व्याकुल हो जाये बिनु श्यामा।।
 
रहा नहीं जाये जब मिले बिनु श्यामा। तब जानो प्रेमबीज़,जामा उरधामा।।
 
--------जगद्गुरुत्तम श्री कृपालुजी महाराज द्वारा रचित।

 

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...