This Blog is dedicated to the Lotus Feet of my Spiritual Master - Jagadguru Shri Kripaluji Maharaj, who is the Descension of the Bliss of Divine Love, who is illuminating the entire world with light of His Vedic and Yogic knowledge of our Scriptures. Jai Shree Radhey!!!
Wednesday, March 27, 2013
हरि भक्ति सर्वश्रेष्ठ गोविंद राधे |
वाते भी श्रेष्ठ गुरु भक्ति बता दे ||
भावार्थ- सबसे ऊँची भक्ति भगवान् श्रीकृष्ण की है, किन्तु उससे भी ऊँची भक्ति गुरु की है |
हरि कह ऊधो मेरी गोविंद राधे |
पूजा ते श्रेष्ठ गुरुपूजा बता दे ||
भावार्थ- भगवान् उद्धव से कहते हैं कि हे उद्धव ! मेरी पूजा से श्रेष्ठ गुरु की पूजा है |
गुरु पाछे हरि चले गोविंद राधे |
गुरु पदरज उड़ि पावन बना दे ||
भावार्थ- गुरु की चरण रज को प्राप्त करने के लिये हरि सदा गुरु के पीछे पीछे चलते हैं कि उनकी चरण रज मस्तक पर धारण करके मैं पवित्र हो जाऊँ |
..राधा गोविंद गीत ( जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज ).
वाते भी श्रेष्ठ गुरु भक्ति बता दे ||
भावार्थ- सबसे ऊँची भक्ति भगवान् श्रीकृष्ण की है, किन्तु उससे भी ऊँची भक्ति गुरु की है |
हरि कह ऊधो मेरी गोविंद राधे |
पूजा ते श्रेष्ठ गुरुपूजा बता दे ||
भावार्थ- भगवान् उद्धव से कहते हैं कि हे उद्धव ! मेरी पूजा से श्रेष्ठ गुरु की पूजा है |
गुरु पाछे हरि चले गोविंद राधे |
गुरु पदरज उड़ि पावन बना दे ||
भावार्थ- गुरु की चरण रज को प्राप्त करने के लिये हरि सदा गुरु के पीछे पीछे चलते हैं कि उनकी चरण रज मस्तक पर धारण करके मैं पवित्र हो जाऊँ |
..राधा गोविंद गीत ( जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज ).
You can never repay your Guru for what he has given you, because material treasures cannot pay for spiritual goods, yet the scriptures state emphatically that you must serve your Guru with body, mind and wealth. Your Guru is not stingy with the spiritual gifts he showers upon you, nor does He ever tire of giving you grace. Why do you think that you have served Him enough?
Be greedy in serving the Guru. The best disciple is he who renders service without the Guru asking for it.
........JAGADGURU SHRI KRIPALUJI MAHAPRABHU.
Be greedy in serving the Guru. The best disciple is he who renders service without the Guru asking for it.
........JAGADGURU SHRI KRIPALUJI MAHAPRABHU.
मन को भरोसा दिलाओ आठु यामा। तेरे तो हैं परम हितेषी श्याम श्यामा।।
और द्वार जाओ न,अनन्य बनो बामा।त्रिगुण ,त्रिताप,त्रिकर्म,काटें श्यामा।।
भोरे बनि जाओ क्योंकि भोरी भारी श्यामा। भोरी भारी को प्रिय भोरा उरधामा।।
...
हरि-गुरु ते न कछु माँगो ब्रजबामा। दोनों ते सदा करो प्रेम निष्कामा।।
माँगना हो तो माँगो सेवा श्याम श्यामा। सेवा हित पुनि माँगो प्रेम निष्कामा।।
जल बिनु मीन ज्यों विकल कह बामा। वैसे मन व्याकुल हो जाये बिनु श्यामा।।
रहा नहीं जाये जब मिले बिनु श्यामा। तब जानो प्रेमबीज़,जामा उरधामा।।
--------जगद्गुरुत्तम श्री कृपालुजी महाराज द्वारा रचित।
और द्वार जाओ न,अनन्य बनो बामा।त्रिगुण ,त्रिताप,त्रिकर्म,काटें श्यामा।।
भोरे बनि जाओ क्योंकि भोरी भारी श्यामा। भोरी भारी को प्रिय भोरा उरधामा।।
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हरि-गुरु ते न कछु माँगो ब्रजबामा। दोनों ते सदा करो प्रेम निष्कामा।।
माँगना हो तो माँगो सेवा श्याम श्यामा। सेवा हित पुनि माँगो प्रेम निष्कामा।।
जल बिनु मीन ज्यों विकल कह बामा। वैसे मन व्याकुल हो जाये बिनु श्यामा।।
रहा नहीं जाये जब मिले बिनु श्यामा। तब जानो प्रेमबीज़,जामा उरधामा।।
--------जगद्गुरुत्तम श्री कृपालुजी महाराज द्वारा रचित।
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