Saturday, March 30, 2013

माना मैं हूँ सब विधि दोषी नंदनंदन, तू तो है 'कृपालु' कृपा करो नंदनंदन।।
माना मैंने पिछला बिगारा नंदनंदन, अगला तो अब तू बना दे नंदनंदन।
 माना मैं हूँ सब विधि दोषी नंदनंदन, तू तो है 'कृपालु' कृपा करो नंदनंदन।।

 

Making a big show of one's devotion in order to attract people is also Kusang.
----SHRI MAHARAJJI.
Making a big show of one's devotion in order to attract people is also Kusang. 
----SHRI MAHARAJJI.

 

"हमारे प्यारे श्री महाराजजी ने ब्रजरस को प्रवाहित किया और हमारी प्यारी-प्यारी ममतामयी माँ (प्यारी अम्माजी) ने यह रस सबको पिलाया। हमारी प्यारी-प्यारी भोरी-भारी 'अम्मा का स्वरूप' ही 'निष्काम प्रेम' की अनुपम शिक्षा देने के लिए प्रकट हुआ।"
"हमारे प्यारे श्री महाराजजी ने ब्रजरस को प्रवाहित किया और हमारी प्यारी-प्यारी ममतामयी माँ (प्यारी अम्माजी) ने यह रस सबको पिलाया। हमारी प्यारी-प्यारी भोरी-भारी 'अम्मा का स्वरूप' ही 'निष्काम प्रेम' की अनुपम शिक्षा देने के लिए प्रकट हुआ।"

 

जो आँसू स्वयं हरि-गुरु आकर न पोंछे, तब तक उन्हें झूठे आँसू मानो।
-----श्री महाराजजी।
जो आँसू स्वयं हरि-गुरु आकर न पोंछे, तब तक उन्हें झूठे आँसू मानो।
-----श्री महाराजजी।

 

A devotee prays, “May there always be sorrow and suffering in my life, so that I may never forget God!” “Cursed be the happiness that makes me forget my Lord; blessed be the sorrows that make me remember Him.” Strive to become a true lover of God by not objecting to His will and by embracing His mysterious ways.

----JAGADGURU SHRI KRIPALU JI MAHARAJ.
A devotee prays, “May there always be sorrow and suffering in my life, so that I may never forget God!” “Cursed be the happiness that makes me forget my Lord; blessed be the sorrows that make me remember Him.” Strive to become a true lover of God by not objecting to His will and by embracing His mysterious ways.

 ----JAGADGURU SHRI KRIPALU JI MAHARAJ.

बिना हरि के भक्ति सम्भव है किन्तु बिना गुरु कृपा के भक्ति तत्व को नहीं जाना जा सकता है। अतएव भक्ति में गुरु तत्व ही प्रधान है।
-----जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।

 

तू प्रेम रूप रस सार। तेरा अंधाधुंध दरबार।।
तू तो करुणा की अवतार। तू है कृपा रूप साकार।।"

"तू प्रेम रूप रस सार। तेरा अंधाधुंध दरबार।।
 तू तो करुणा की अवतार। तू है कृपा रूप साकार।।"

 

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...