Tuesday, April 2, 2013

हरि ते मिलावे गुरु गोविंद राधे |
ऐसे गुरु ते ही तू मन को मिला दे ||

भावार्थ- गुरु वही है जो जीव को हरि से मिला दे | ऐसे सच्चे गुरु के प्रति जीव को अपने मन का पूर्ण समर्पण कर देना चाहिये |

...
गुरु के प्रपन्न हो जा गोविंद राधे |
मन रूपी डोरी गुरु कर में थमा दे ||

भावार्थ- हे जीव ! गुरु की पूर्ण शरणागति ग्रहण कर | अपने मन की डोर को गुरुदेव के हाथों में सौंप दे |

पूर्ण प्रपन्न हो जा गोविंद राधे |
फिर हरि गुरु तेरा काम बना दें |

भावार्थ- जिस क्षण कोई भी जीव हरि गुरु के पूर्ण शरणागत हो जाता है वे तुरन्त ही उसकी माया निवृति कर देते हैं | वह जीव त्रिगुण, त्रिताप, त्रिकर्म, पंचक्लेश सबके बन्धन से मुक्त हो जाता है |

..................राधा गोविंद गीत ( जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज ).
हरि ते मिलावे गुरु गोविंद राधे | 
ऐसे गुरु ते ही तू मन को मिला दे || 

भावार्थ- गुरु वही है जो जीव को हरि से मिला दे | ऐसे सच्चे गुरु के प्रति जीव को अपने मन का पूर्ण समर्पण कर देना चाहिये |

गुरु के प्रपन्न हो जा गोविंद राधे |
मन रूपी डोरी गुरु कर में थमा दे ||

भावार्थ- हे जीव ! गुरु की पूर्ण शरणागति ग्रहण कर | अपने मन की डोर को गुरुदेव के हाथों में सौंप दे |

पूर्ण प्रपन्न हो जा गोविंद राधे |
फिर हरि गुरु तेरा काम बना दें |

भावार्थ- जिस क्षण कोई भी जीव हरि गुरु के पूर्ण शरणागत हो जाता है वे तुरन्त ही उसकी माया निवृति कर देते हैं | वह जीव त्रिगुण, त्रिताप, त्रिकर्म, पंचक्लेश सबके बन्धन से मुक्त हो जाता है |

  ..................राधा गोविंद गीत ( जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज ).................

साधक जब तक पूर्ण श्रद्धायुक्त नहीं होगा , वो ज्ञान का ग्रहण नहीं कर सकता। अगर पूर्ण श्रद्धा नहीं है, संशय है तो उसका सर्वनाश सुनिश्चित है। यानि वो संत पर दुर्भावना कर बैठेगा। यह बाबाजी कैसे हैं? कैसे हैं? सोचेगा, जैसा हम चाहते हैं, ऐसा बाबा होना चाहिये। हर आदमी इतना बड़ा मूर्ख है कि वो अपनी राय के अनुसार संत चाहता है।"
"साधक जब तक पूर्ण श्रद्धायुक्त नहीं होगा , वो ज्ञान का ग्रहण नहीं कर सकता। अगर पूर्ण श्रद्धा नहीं है, संशय है तो उसका सर्वनाश सुनिश्चित है। यानि वो संत पर दुर्भावना कर बैठेगा। यह बाबाजी कैसे हैं? कैसे हैं? सोचेगा, जैसा हम चाहते हैं, ऐसा बाबा होना चाहिये। हर आदमी इतना बड़ा मूर्ख है कि वो अपनी राय के अनुसार संत चाहता है।"

 

""जिस जीव का अंत:करण जितना पापयुक्त होगा, उसको उतनी ही मात्रा में संत के प्रति अश्रद्धा होगी। वो हर जगह बुद्धि लगायेगा और तर्क, वितर्क, कुतर्क, अतितर्क, संशय करेगा। जितना अधिक पाप होगा अंदर, उतना ही हम दूर जाते जाएंगे महापुरुष और भगवान से।
------जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज.""
""जिस जीव का अंत:करण जितना पापयुक्त होगा, उसको उतनी ही मात्रा में संत के प्रति अश्रद्धा होगी। वो हर जगह बुद्धि लगायेगा और तर्क, वितर्क, कुतर्क, अतितर्क, संशय करेगा। जितना अधिक पाप होगा अंदर, उतना ही हम दूर जाते जाएंगे महापुरुष और भगवान से।
 ------जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज.""

 
 



Shri Maharaj Ji says:

Just as we keep the mind detached from most of the work we perform, in the same way we keep it detached from most individuals of the world. The attachment of our mind is reserved only for a handful of people such as our parents, children, husband, wife, brothers, sisters, and so on. With the rest of the world, we only behave politely. Now if we sever the attachment with even these few people, there will be no difficulty for us in attaining God.

"Shri Maharaj Ji says:

 Just as we keep the mind detached from most of the work we perform, in the same way we keep it detached from most individuals of the world. The attachment of our mind is reserved only for a handful of people such as our parents, children, husband, wife, brothers, sisters, and so on. With the rest of the world, we only behave politely. Now if we sever the attachment with even these few people, there will be no difficulty for us in attaining God."



श्री गुरु चरणों में गोविंद राधे |
सिर को ही नहिं मन को भी झुका दे ||

भावार्थ- जीव को गुरु चरणों में केवल मस्तक को ही नहीं मन को भी झुकाना चाहिये | केवल सिर को गुरु चरणों में झुकाने और मन ही मन उनके प्रति संशय या दोषबुद्धि रखने से कुछ भी प्राप्त नहीं होगा |
 
श्री गुरु चरणों में गोविंद राधे |
तन मन धन अर्पन करवा दे ||

भावार्थ- जीव का हृदय जब किसी को सद्गुरु रूप में स्वीकार कर ले तब उसे अपना तन, मन, धन सब कुछ गुरु चरणों में समर्पित करने में तनिक भी संकोच नहीं करना चाहिये |

......राधा गोविंद गीत ( जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज ).
श्री गुरु चरणों में गोविंद राधे |
सिर को ही नहिं मन को भी झुका दे ||

भावार्थ- जीव को गुरु चरणों में केवल मस्तक को ही नहीं मन को भी झुकाना चाहिये | केवल सिर को गुरु चरणों में झुकाने और मन ही मन उनके प्रति संशय या दोषबुद्धि रखने से कुछ भी प्राप्त नहीं होगा |

श्री गुरु चरणों में गोविंद राधे |
तन मन धन अर्पन करवा दे ||

भावार्थ-  जीव का हृदय जब किसी को सद्गुरु रूप में स्वीकार कर ले तब उसे अपना तन, मन, धन सब कुछ गुरु चरणों में समर्पित करने में तनिक भी संकोच नहीं करना चाहिये |

..................राधा गोविंद गीत ( जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज ).................

 

"True surrender means to strictly follow the instructions of your Guru and not to exercise your intellect independently.
--------Shri Maharajji."

 

Although human body is invaluable, it is transient. Therefore to procrastinate in devotional practice even for a moment is the greatest loss.
---------jagadguru shri kripalu ji maharaj.
Although human body is invaluable, it is transient. Therefore to procrastinate in devotional practice even for a moment is the greatest loss.
 ---------jagadguru shri kripalu ji maharaj.

 

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...