Tuesday, April 2, 2013

बार बार क्षमा माँगे गोविंद राधे |
बार बार पाप करे कैसे क्षमा दे ||

भावार्थ- श्यामसुन्दर जीव से कहते हैं, तू बार बार क्षमा याचना करता है बार-बार पाप करता है | फिर क्षमा माँगने का क्या अर्थ हैं?
 
मन ते तो पाप करे गोविंद राधे |
मुख ते क्षमा माँगे कैसे क्षमा दे ||

भावार्थ- भगवान् कहते हैं हे जीव ! तू मुख से तो क्षमा याचना करता है परन्तु मन से पाप करता है | फिर तुझे क्षमा कैसे प्राप्त होगी ? भगवान् तो सर्वान्तर्यामी हैं उनसे जीव के मन का भाव छिपा नहीं है अत: मन को शुद्ध करना होगा |

गुरु जापै कृपा करे गोविंद राधे |
वाके पाछे हरि चलें सब को बता दे ||

भावार्थ- गुरु कृपा जिस पर होती है हरि उसके पीछे-पीछे चलते हैं |

.राधा गोविंद गीत ( जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज ).
बार बार क्षमा माँगे गोविंद राधे |
बार बार पाप करे कैसे क्षमा दे ||

भावार्थ- श्यामसुन्दर जीव से कहते हैं, तू बार बार क्षमा याचना करता है बार-बार पाप करता है | फिर क्षमा माँगने का क्या अर्थ हैं?

मन ते तो पाप करे गोविंद राधे |
मुख ते क्षमा माँगे कैसे क्षमा दे ||

भावार्थ- भगवान् कहते हैं हे जीव ! तू मुख से तो क्षमा याचना करता है परन्तु मन से पाप करता है | फिर तुझे क्षमा कैसे प्राप्त होगी ? भगवान् तो सर्वान्तर्यामी हैं उनसे जीव के मन का भाव छिपा नहीं है अत: मन को शुद्ध करना होगा |

गुरु जापै कृपा करे गोविंद राधे |
वाके पाछे हरि चलें सब को बता दे ||

भावार्थ- गुरु कृपा जिस पर होती है हरि उसके पीछे-पीछे चलते हैं |

..................राधा गोविंद गीत ( जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज ).................


दिव्य प्रेमास्पद का दिव्य प्रेम ही सर्वोत्कृष्ट तत्व है। प्रेम का तात्पर्य 'तत्सुख सुखित्वं' अर्थात प्रेमास्पद के सुख में ही सुख मानना है।
 ***** जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज*****
दिव्य प्रेमास्पद का दिव्य प्रेम ही सर्वोत्कृष्ट तत्व है। प्रेम का तात्पर्य तत्सुख सुखित्वं अर्थात प्रेमास्पद के सुख में ही सुख मानना है।
!***** जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज*****!

 

We must worship only the supreme, ultimate, divine personality, God and restrict ourselves to having only feelings of respect towards others, like a devoted wife who loves only her husband, but at the same time respects her in-laws and other relations.
------jagadguru shri kripalu ji maharaj.
We must worship only the supreme, ultimate, divine personality, God and restrict ourselves to having only feelings of respect towards others, like a devoted wife who loves only her husband, but at the same time respects her in-laws and other relations.
------jagadguru shri kripalu ji maharaj.

 

When devotees see the manifestation of Divine Love emotions, sattvic bhavas in the Saint from time to time, their enthusiasm and dedication naturally increases. By personally seeing these divine states, the spiritual aspirant develops firm faith in this path and progresses very quickly. He feels confident that he can also attain those divine qualities one day.
-------jagadguru shri kripalu ji maharaj.
When devotees see the manifestation of Divine Love emotions, sattvic bhavas in the Saint from time to time, their enthusiasm and dedication naturally increases. By personally seeing these divine states, the spiritual aspirant develops firm faith in this path and progresses very quickly. He feels confident that he can also attain those divine qualities one day.
-------jagadguru shri kripalu ji maharaj.

 
 

हरि ते मिलावे गुरु गोविंद राधे |
ऐसे गुरु ते ही तू मन को मिला दे ||

भावार्थ- गुरु वही है जो जीव को हरि से मिला दे | ऐसे सच्चे गुरु के प्रति जीव को अपने मन का पूर्ण समर्पण कर देना चाहिये |

...
गुरु के प्रपन्न हो जा गोविंद राधे |
मन रूपी डोरी गुरु कर में थमा दे ||

भावार्थ- हे जीव ! गुरु की पूर्ण शरणागति ग्रहण कर | अपने मन की डोर को गुरुदेव के हाथों में सौंप दे |

पूर्ण प्रपन्न हो जा गोविंद राधे |
फिर हरि गुरु तेरा काम बना दें |

भावार्थ- जिस क्षण कोई भी जीव हरि गुरु के पूर्ण शरणागत हो जाता है वे तुरन्त ही उसकी माया निवृति कर देते हैं | वह जीव त्रिगुण, त्रिताप, त्रिकर्म, पंचक्लेश सबके बन्धन से मुक्त हो जाता है |

..................राधा गोविंद गीत ( जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज ).
हरि ते मिलावे गुरु गोविंद राधे | 
ऐसे गुरु ते ही तू मन को मिला दे || 

भावार्थ- गुरु वही है जो जीव को हरि से मिला दे | ऐसे सच्चे गुरु के प्रति जीव को अपने मन का पूर्ण समर्पण कर देना चाहिये |

गुरु के प्रपन्न हो जा गोविंद राधे |
मन रूपी डोरी गुरु कर में थमा दे ||

भावार्थ- हे जीव ! गुरु की पूर्ण शरणागति ग्रहण कर | अपने मन की डोर को गुरुदेव के हाथों में सौंप दे |

पूर्ण प्रपन्न हो जा गोविंद राधे |
फिर हरि गुरु तेरा काम बना दें |

भावार्थ- जिस क्षण कोई भी जीव हरि गुरु के पूर्ण शरणागत हो जाता है वे तुरन्त ही उसकी माया निवृति कर देते हैं | वह जीव त्रिगुण, त्रिताप, त्रिकर्म, पंचक्लेश सबके बन्धन से मुक्त हो जाता है |

  ..................राधा गोविंद गीत ( जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज ).................

साधक जब तक पूर्ण श्रद्धायुक्त नहीं होगा , वो ज्ञान का ग्रहण नहीं कर सकता। अगर पूर्ण श्रद्धा नहीं है, संशय है तो उसका सर्वनाश सुनिश्चित है। यानि वो संत पर दुर्भावना कर बैठेगा। यह बाबाजी कैसे हैं? कैसे हैं? सोचेगा, जैसा हम चाहते हैं, ऐसा बाबा होना चाहिये। हर आदमी इतना बड़ा मूर्ख है कि वो अपनी राय के अनुसार संत चाहता है।"
"साधक जब तक पूर्ण श्रद्धायुक्त नहीं होगा , वो ज्ञान का ग्रहण नहीं कर सकता। अगर पूर्ण श्रद्धा नहीं है, संशय है तो उसका सर्वनाश सुनिश्चित है। यानि वो संत पर दुर्भावना कर बैठेगा। यह बाबाजी कैसे हैं? कैसे हैं? सोचेगा, जैसा हम चाहते हैं, ऐसा बाबा होना चाहिये। हर आदमी इतना बड़ा मूर्ख है कि वो अपनी राय के अनुसार संत चाहता है।"

 

""जिस जीव का अंत:करण जितना पापयुक्त होगा, उसको उतनी ही मात्रा में संत के प्रति अश्रद्धा होगी। वो हर जगह बुद्धि लगायेगा और तर्क, वितर्क, कुतर्क, अतितर्क, संशय करेगा। जितना अधिक पाप होगा अंदर, उतना ही हम दूर जाते जाएंगे महापुरुष और भगवान से।
------जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज.""
""जिस जीव का अंत:करण जितना पापयुक्त होगा, उसको उतनी ही मात्रा में संत के प्रति अश्रद्धा होगी। वो हर जगह बुद्धि लगायेगा और तर्क, वितर्क, कुतर्क, अतितर्क, संशय करेगा। जितना अधिक पाप होगा अंदर, उतना ही हम दूर जाते जाएंगे महापुरुष और भगवान से।
 ------जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज.""

 
 



मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...