This Blog is dedicated to the Lotus Feet of my Spiritual Master - Jagadguru Shri Kripaluji Maharaj, who is the Descension of the Bliss of Divine Love, who is illuminating the entire world with light of His Vedic and Yogic knowledge of our Scriptures. Jai Shree Radhey!!!
Wednesday, April 3, 2013
हे! कृपामयी राधे, मेरे ऊपर भी तो कृपा करो, मुझ पर कृपा करने से तुम्हारे कृपा के भंडार मे कोई कमी नहीं आएगी अपितु तुम्हारे यश का ही विस्तार होगा
हे! राधे, तुम्हारा तन, मन, प्राण सब कृपा द्वारा ही निर्मित है। तुम तो कृपा का ही एक दूसरा स्वरूप हो। राधे ! कृपा करने के अतिरिक्त अन्य कोई कार्य तुम नहीं कर सकती कृपा किए बिना तुमसे रहा भी नहीं जाता, जिस प्रकार संसार मे मछ्ली जल से ही जीवित रहती है उसी प्रकार कृपा ही तुम्हारा जीवन है अर्थात तुमने जीवन धारण ही कृपा करने के लिए किया है संसार मे सुर, नर, मुनि भी कृपा करते देखे जाते हैं परंतु वे बिना कारण के कृपा नहीं कर सकते।
........जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज.
हे! राधे, तुम्हारा तन, मन, प्राण सब कृपा द्वारा ही निर्मित है। तुम तो कृपा का ही एक दूसरा स्वरूप हो। राधे ! कृपा करने के अतिरिक्त अन्य कोई कार्य तुम नहीं कर सकती कृपा किए बिना तुमसे रहा भी नहीं जाता, जिस प्रकार संसार मे मछ्ली जल से ही जीवित रहती है उसी प्रकार कृपा ही तुम्हारा जीवन है अर्थात तुमने जीवन धारण ही कृपा करने के लिए किया है संसार मे सुर, नर, मुनि भी कृपा करते देखे जाते हैं परंतु वे बिना कारण के कृपा नहीं कर सकते।
........जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज.
केवल भगवान् की भक्तिकरो । और साथ में 'गुरुदेवतात्मा' गुरु को अपना इष्टदेव मानो,भगवान् के बराबर मानो , अपनी आत्मा मानो । शरणागत हो जाओ । जैसी भक्ति भगवान् में हो वैसी गुरु में हो । और कहीं न हो मन का अटैचमेन्ट ( attachment ) बस ये दावा है , इससे सन्मुख हो जाओ और सन्मुख हो जाओगे तो बस बिगड़ी बन जायेगी । तब तुम्हारा ये कहना सही होगा कि - किशोरी मोरी , बिगरी देहु बनाय ।
***********जगद्गुरु श्री कृपालु महाप्रभु***********
***********जगद्गुरु श्री कृपालु महाप्रभु***********
सर्वप्रथम यह विचार करना है कि जीव का रोग क्या है ? इसका सीधा सा उत्तर है कि जीव को माया की दासता का रोग है माया के अधीन होने के कारण ही भगवान् से विमुख है। भगवान् से विमुख होने के कारण अपने शुद्ध स्वाभाविक स्वरूप को भूल गया है ( मैं सेवक रघुपति पति मोरे ) अपने शुद्ध स्वरूप को भूल जाने के कारण स्वयं को शरीर मानने लगा है। स्वयं को शरीरादि मानने के कारण ही सांसारिक मायिक पदार्थों में ही आनन्द प्राप्ति की निरन्तर साधना कर रहा है। बस यही रोग एवं उनके परिणाम हैं। इस रोग के बड़े - बड़े उपद्रव स्वयं हो गये। यथा काम , क्रोध , लोभ , मोह , ईर्ष्या , द्वेष पाखण्ड आदि । पुनः कर्मबन्धन आदि अनन्त उपद्रव उत्पन्न होते चले गये।
~~~~~~~जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज~~~~~~~~
~~~~~~~जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज~~~~~~~~
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