Saturday, April 6, 2013

सदा सर्वत्र श्वास श्वास से ' राधे' , नाम का जप करते रहो। ( रूपध्यान युक्त )
----श्री महाराज जी।
सदा सर्वत्र श्वास श्वास से ' राधे , नाम का जप करते रहो। ( रूपध्यान युक्त )
----श्री महाराज जी।

 

श्री महाराजजी के श्रीमुख से :-

जब तक हम माया के अधीन हैं तब तक क्यों सोचते हो कि मैं प्रशंसा के योग्य हूँ। जब तक तुम शरणागत नहीं हुए तब तक तुम्हें अहंकार किस बात का? किसी भी जीव का वास्तविक स्वरूप श्रीकृष्ण दासत्व ही है। श्रीकृष्ण के दास बन जाओ फिर खूब अहंकार करो। हम छूट देते हैं। लेकिन उस समय तुम अहंकार कर ही नहीं सकते। भगवदप्राप्ति से पहले रहता है अहंकार। अत: सदा सावधान रहो।
श्री महाराजजी के श्रीमुख से :-
 
जब तक हम माया के अधीन हैं तब तक क्यों सोचते हो कि मैं प्रशंसा के योग्य हूँ। जब तक तुम शरणागत नहीं हुए तब तक तुम्हें अहंकार किस बात का? किसी भी जीव का वास्तविक स्वरूप श्रीकृष्ण दासत्व ही है। श्रीकृष्ण के दास बन जाओ फिर खूब अहंकार करो। हम छूट देते हैं। लेकिन उस समय तुम अहंकार कर ही नहीं सकते। भगवदप्राप्ति से पहले रहता है अहंकार। अत: सदा सावधान रहो।

 

Friday, April 5, 2013

प्रेम भिक्षां देहि..................
प्रेम भिक्षां देहि..................

 

    श्यामसुंदर! संसार में भटकते भटकते थक गया। हे करुणा वरूनालय! तुमने अकारण करुणा के परिणाम स्वरूप मानव देह दिया ,गुरु के द्वारा तत्वज्ञान कराया कि किसी तरह तुम्हारे सन्मुख हो जाऊँ तथा अनंत दिव्यानन्द प्राप्त करके सदा सदा के लिए मेरी दुख निव्रत्ति हो जाये लकीन यह मन इतना हठी है कि तुम्हारे शरणागत नहीं होता।
    हे श्यामसुंदर! संसार में भटकते भटकते थक गया। हे करुणा वरूनालय! तुमने अकारण करुणा के परिणाम स्वरूप मानव देह दिया ,गुरु के द्वारा तत्वज्ञान कराया कि किसी तरह तुम्हारे सन्मुख हो जाऊँ तथा अनंत दिव्यानन्द प्राप्त करके सदा सदा के लिए मेरी दुख निव्रत्ति हो जाये लकीन यह मन इतना हठी है कि तुम्हारे शरणागत नहीं होता।

     

    जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाप्रभु के श्रीमुख से:-
    'स्मरण',एक मिनट तो क्या एक क्षण से शुरू होता है, इसे बढ़ाना ही साधना है। इस एक क्षण के स्मरण को मरण तक बढ़ाते रहना है। यह एक क्षण का स्मरण जब एक क्षण को भी विस्मृत न हो ,यही लक्ष्य की सिद्धि है।
    जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाप्रभु के श्रीमुख से:-
 'स्मरण',एक मिनट तो क्या एक क्षण से शुरू होता है, इसे बढ़ाना ही साधना है। इस एक क्षण के स्मरण को मरण तक बढ़ाते रहना है। यह एक क्षण का स्मरण जब एक क्षण को भी विस्मृत न हो ,यही लक्ष्य की सिद्धि है।

     

      श्री महाराजजी के श्रीमुख से:
      एक बात बड़ी इंपोर्टेंट| हरि, गुरु को अपने साथ ,सर्वत्र ,सर्वदा महसूस करो। इसका अभ्यास करो। दस दिन ,बीस दिन, महीने, छ: महीने में यह अभ्यास पक्का हो जायेगा कि हम अकेले नहीं हैं। हम जहां अपने को अकेला मानते हैं वहीं पाप कर बैठते हैं - प्राइवेट| अरे, वेद कहता है, अगर तुम गुरु को न भी मानो तो भगवान को तो मानो कि अंत:करण में वो नित्य हमारे साथ है, हमारे आइडिया नोट कर रहा है। तो हरि-गुरु को अपने साथ अपना रक्षक मानो। यह फीलिंग हो - हम अकेले
      नहीं हैं,सदा वे हमारे साथ है।गलत काम न करें ,गलत चिंतन न करें । सावधानी आयेगी तो अपराध से बचेंगे।
      श्री महाराजजी के श्रीमुख से:
 एक बात बड़ी इंपोर्टेंट| हरि, गुरु को अपने साथ ,सर्वत्र ,सर्वदा महसूस करो। इसका अभ्यास करो। दस दिन ,बीस दिन, महीने, छ: महीने में यह अभ्यास पक्का हो जायेगा कि हम अकेले नहीं हैं। हम जहां अपने को अकेला मानते हैं वहीं पाप कर बैठते हैं - प्राइवेट| अरे, वेद कहता है, अगर तुम गुरु को न भी मानो तो भगवान को तो मानो कि अंत:करण में वो नित्य हमारे साथ है, हमारे आइडिया नोट कर रहा है। तो हरि-गुरु को अपने साथ अपना रक्षक मानो। यह फीलिंग हो - हम अकेले नहीं हैं,सदा वे हमारे साथ है।गलत काम न करें ,गलत चिंतन न करें । सावधानी आयेगी तो अपराध से बचेंगे।

       

      श्री महाराजजी बताते हैं कि: तीन चीज़ प्रमुख है- 'हरि', 'गुरु' और 'हरि-गुरु' की मिलन वाली पावर, 'भक्ति'। इन तीनों में 'अनन्य' रहो।

       

      मन का अटैचमेंट किसमें करें?

      एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...