Saturday, April 6, 2013

One should be extremely cautious about avoiding all kinds of kusang.

 कुसंग से सावधान रहना चाहिये।

 ------SHRI MAHARAJJI.
one should be extremely cautious about avoiding all kindds of kusang.
कुसंग से सावधान रहना चाहिये।
---shri maharaj ji.

 

'SMARANA' (REMEMBRANCE OF GOD) is the life-force of all devotional practices.it can be compared to the soul,while all other devotional practices can be compared to the body.if the soul leaves the body, of what use is the corpse that remains? Always remeber that if your mind is not absorbed in 'RUPDHYANA', all other spiritual practices amount to nothing.
-----JAGADGURU SHRI KRIPALUJI MAHAPRABHU.
'SMARANA' (REMEMBRANCE OF GOD) is the life-force of all devotional practices.it can be compared to the soul,while all other devotional practices can be compared to the body.if the soul leaves the body, of what use is the corpse that remains? Always remeber that if your mind is not absorbed in 'RUPDHYANA', all other spiritual practices amount to nothing.
 -----JAGADGURU SHRI KRIPALUJI MAHAPRABHU.

 

SHRI MAHARAJJI TELLS US THAT :-

Just practise devotion to God.Divine knowledge and detachment from the world will automatically be attained,accordingly.
SHRI MAHARAJJI TELLS US THAT :-
 
Just practise devotion to God.Divine knowledge and detachment from the world will automatically be attained,accordingly.

 

सदा सर्वत्र श्वास श्वास से ' राधे' , नाम का जप करते रहो। ( रूपध्यान युक्त )
----श्री महाराज जी।
सदा सर्वत्र श्वास श्वास से ' राधे , नाम का जप करते रहो। ( रूपध्यान युक्त )
----श्री महाराज जी।

 

श्री महाराजजी के श्रीमुख से :-

जब तक हम माया के अधीन हैं तब तक क्यों सोचते हो कि मैं प्रशंसा के योग्य हूँ। जब तक तुम शरणागत नहीं हुए तब तक तुम्हें अहंकार किस बात का? किसी भी जीव का वास्तविक स्वरूप श्रीकृष्ण दासत्व ही है। श्रीकृष्ण के दास बन जाओ फिर खूब अहंकार करो। हम छूट देते हैं। लेकिन उस समय तुम अहंकार कर ही नहीं सकते। भगवदप्राप्ति से पहले रहता है अहंकार। अत: सदा सावधान रहो।
श्री महाराजजी के श्रीमुख से :-
 
जब तक हम माया के अधीन हैं तब तक क्यों सोचते हो कि मैं प्रशंसा के योग्य हूँ। जब तक तुम शरणागत नहीं हुए तब तक तुम्हें अहंकार किस बात का? किसी भी जीव का वास्तविक स्वरूप श्रीकृष्ण दासत्व ही है। श्रीकृष्ण के दास बन जाओ फिर खूब अहंकार करो। हम छूट देते हैं। लेकिन उस समय तुम अहंकार कर ही नहीं सकते। भगवदप्राप्ति से पहले रहता है अहंकार। अत: सदा सावधान रहो।

 

Friday, April 5, 2013

प्रेम भिक्षां देहि..................
प्रेम भिक्षां देहि..................

 

    श्यामसुंदर! संसार में भटकते भटकते थक गया। हे करुणा वरूनालय! तुमने अकारण करुणा के परिणाम स्वरूप मानव देह दिया ,गुरु के द्वारा तत्वज्ञान कराया कि किसी तरह तुम्हारे सन्मुख हो जाऊँ तथा अनंत दिव्यानन्द प्राप्त करके सदा सदा के लिए मेरी दुख निव्रत्ति हो जाये लकीन यह मन इतना हठी है कि तुम्हारे शरणागत नहीं होता।
    हे श्यामसुंदर! संसार में भटकते भटकते थक गया। हे करुणा वरूनालय! तुमने अकारण करुणा के परिणाम स्वरूप मानव देह दिया ,गुरु के द्वारा तत्वज्ञान कराया कि किसी तरह तुम्हारे सन्मुख हो जाऊँ तथा अनंत दिव्यानन्द प्राप्त करके सदा सदा के लिए मेरी दुख निव्रत्ति हो जाये लकीन यह मन इतना हठी है कि तुम्हारे शरणागत नहीं होता।

     

    मन का अटैचमेंट किसमें करें?

    एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...