Monday, April 8, 2013

श्री महाराजजी के श्रीमुख से:
एक बात बड़ी इंपोर्टेंट| हरि, गुरु को अपने साथ ,सर्वत्र ,सर्वदा महसूस करो। इसका अभ्यास करो। दस दिन ,बीस दिन, महीने, छ: महीने में यह अभ्यास
पक्का हो जायेगा कि हम अकेले नहीं हैं। हम जहां अपने को अकेला मानते हैं वहीं पाप कर बैठते हैं - प्राइवेट| अरे, वेद कहता है, अगर तुम गुरु को न भी मानो तो भगवान को तो मानो कि अंत:करण में वो नित्य हमारे साथ है, हमारे आइडिया नोट कर रहा है। तो हरि-गुरु को अपने साथ अपना रक्षक मानो। यह फीलिंग हो - हम अकेले नहीं हैं,सदा वे हमारे साथ है।गलत काम न करें ,गलत चिंतन न करें । सावधानी आयेगी तो अपराध से बचेंगे।
श्री महाराजजी के श्रीमुख से:
 एक बात बड़ी इंपोर्टेंट| हरि, गुरु को अपने साथ ,सर्वत्र ,सर्वदा महसूस करो। इसका अभ्यास करो। दस दिन ,बीस दिन, महीने, छ: महीने में यह अभ्यास पक्का हो जायेगा कि हम अकेले नहीं हैं। हम जहां अपने को अकेला मानते हैं वहीं पाप कर बैठते हैं - प्राइवेट| अरे, वेद कहता है, अगर तुम गुरु को न भी मानो तो भगवान को तो मानो कि अंत:करण में वो नित्य हमारे साथ है, हमारे आइडिया नोट कर रहा है। तो हरि-गुरु को अपने साथ अपना रक्षक मानो। यह फीलिंग हो - हम अकेले नहीं हैं,सदा वे हमारे साथ है।गलत काम न करें ,गलत चिंतन न करें । सावधानी आयेगी तो अपराध से बचेंगे।

 

कलियुग में एक मात्र संकीर्तन ही साधना निर्धारित की गई है। यदि यह भी मान लें कि कलियुग में अन्य साधनों से भगवत्प्राप्ति हो सकती है तब भी विचारणीय हो जाता है कि इतनी अमूल्य , सरल एवं शीघ्र फल प्रदान करने वाली संकीर्तन साधना को छोड़कर क्लिष्ट अन्य साधनाओं में प्रवृत होने में बुद्धिमता ही क्या है ?'
...........(जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज).

' कलियुग में एक मात्र संकीर्तन ही साधना निर्धारित की गई है। यदि यह भी मान लें कि कलियुग में अन्य साधनों से भगवत्प्राप्ति हो सकती है तब भी विचारणीय हो जाता है कि इतनी अमूल्य , सरल एवं शीघ्र फल प्रदान करने वाली संकीर्तन साधना को छोड़कर क्लिष्ट अन्य साधनाओं में प्रवृत होने में बुद्धिमता ही क्या है ?'
(जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज)

 



कृष्ण मुस्कुराये कहा गोविंद राधे |
मैंने जानि जानि के ना पोता बता दे ||

भावार्थ- श्रीकृष्ण ने स्मित हास्य के साथ कहा स्वामी मैंने जानबूझकर ऐसा किया है |
 
निज धाम जाने के गोविंद राधे |
पूर्व व्याध मारेगा बाण बता दे ||

भावार्थ- यदि मैं दोनों चरणों के तलवों में खीर पोत लेता तो आपके आशीर्वाद से मुझे शरीर के किसी स्थान पर कोई अस्त्र असर ही न करता | अब अपने धाम जाने के पूर्व एक व्याध द्वारा मारा गया बाण इस कार्य का निमित बनेगा |

श्री गुरु चरणों में गोविंद राधे |
शरणागति हो तो हरि ते मिला दे ||

भावार्थ- यदि जीव की गुरु चरणों में शरणागति हो जाय तो उसे निशित रूप से हरि दर्शन प्राप्त हो जायेगा |

..................राधा गोविंद गीत ( जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज ).
कृष्ण मुस्कुराये कहा गोविंद राधे |
मैंने जानि जानि के ना पोता बता दे ||

भावार्थ- श्रीकृष्ण ने स्मित हास्य के साथ कहा स्वामी मैंने जानबूझकर ऐसा किया है |

निज धाम जाने के गोविंद राधे |
पूर्व व्याध मारेगा बाण बता दे ||

भावार्थ- यदि मैं दोनों चरणों के तलवों में खीर पोत लेता तो आपके आशीर्वाद से मुझे शरीर के किसी स्थान पर कोई अस्त्र असर ही न करता | अब अपने धाम जाने के पूर्व एक व्याध द्वारा मारा गया बाण इस कार्य का निमित बनेगा |

श्री गुरु चरणों में गोविंद राधे |
शरणागति हो तो हरि ते मिला दे ||

भावार्थ- यदि जीव की गुरु चरणों में शरणागति हो जाय तो उसे निशित रूप से हरि दर्शन प्राप्त हो जायेगा |

..................राधा गोविंद गीत ( जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज ).................

 

    जिज्ञासु जन !
    मानव देह दुर्लभ है किन्तु नश्वर है किसी भी क्षण छिन सकता है । अतएव उधार न करो । तत्काल मन से हरि गुरु का स्मरण प्रारंभ कर दो ।
    शरीर से संसारी कार्य करो एवं मन का अनुराग हरि गुरु में हो । मन हरि में तन जगत में , कर्म योग ये हि जान तन हरि में मन जगत में , यह महान अज्ञान ।
    ******** जगद्गुरुत्तम श्री कृपालु महाप्रभु********
    जिज्ञासु जन ! 
मानव देह दुर्लभ है किन्तु नश्वर है किसी भी क्षण छिन सकता है । अतएव उधार न करो । तत्काल मन से हरि गुरु का स्मरण प्रारंभ कर दो । 
शरीर से संसारी कार्य करो एवं मन का अनुराग हरि गुरु में हो । मन हरि में तन जगत में , कर्म योग ये हि जान तन हरि में मन जगत में , यह महान अज्ञान ।
******** जगद्गुरुत्तम श्री कृपालु महाप्रभु********

     

    Sunday, April 7, 2013

    We should attribute our all good deeds to the god's grace and the grace of the guru and for all the wrongs that we may have done,we should hold ourselves responsible.
    We should attribute our all good deeds to the god's grace and the grace of the guru and for all the wrongs that we may have done,we should hold ourselves responsible.

     

    Worship through external images is not a must; it can alternately be practiced with a form of your own imagination. But the important fact is that, rupadhyana is necessary. To practice devotion without absorbing the mind in the form of God is fruitless effort. The greatest advantage of rupadhyana upon the divine form is that the mind becomes easily focused. The reward of this meditational practice will be divine because God is all-pervading and all-knowing. The mind will not only turn away from the world, but will also attain eternal divine benefit.
    -----jagadguru shri kripalu ji maharaj.
    Worship through external images is not a must; it can alternately be practiced with a form of your own imagination. But the important fact is that, rupadhyana is necessary. To practice devotion without absorbing the mind in the form of God is fruitless effort. The greatest advantage of rupadhyana upon the divine form is that the mind becomes easily focused. The reward of this meditational practice will be divine because God is all-pervading and all-knowing. The mind will not only turn away from the world, but will also attain eternal divine benefit. 
-----jagadguru shri kripalu ji maharaj.

     
     

    मन को भगवान में लगाने का अभ्यास करो। आदत डालो। सोचो! यही शरीर है अरबपति का,यही शरीर है भिखारी का,वो भिखारी नंगे पाँव चलता है,जाड़े में,गर्मी में,बरसात में,और अरबपति को एयरकंडिशन (aircondition) चाहिये, अभ्यास है अपना-अपना। जैसा अभ्यास कर लो,वैसा बन जाओगे।
    ..........श्री महाराजजी।
    मन को भगवान में लगाने का अभ्यास करो। आदत डालो। सोचो! यही शरीर है अरबपति का,यही शरीर है भिखारी का,वो भिखारी नंगे पाँव चलता है,जाड़े में,गर्मी में,बरसात में,और अरबपति को एयरकंडिशन (aircondition) चाहिये, अभ्यास है अपना-अपना। जैसा अभ्यास कर लो,वैसा बन जाओगे।
 ..........श्री महाराजजी।

     

    मन का अटैचमेंट किसमें करें?

    एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...