This Blog is dedicated to the Lotus Feet of my Spiritual Master - Jagadguru Shri Kripaluji Maharaj, who is the Descension of the Bliss of Divine Love, who is illuminating the entire world with light of His Vedic and Yogic knowledge of our Scriptures. Jai Shree Radhey!!!
Thursday, April 11, 2013
अनंत जन्मों तक माथा पच्ची करने के पश्चात भी जो दिव्य ज्ञान हमें न मिलता वह हमारे गुरु ने इतने सरल और सहज रूप में हमें प्रदान कर दिया, अब इसके बाद हमारी ड्यूटि है कि उस तत्त्वज्ञान को बार-बार चिंतन द्वारा पक्का करके उसके अनुसार प्रैक्टिकल करें। अब हमने यहाँ लापरवाही की, एक ने कुछ परवाह की, एक ने और परवाह की, एक ने पूर्ण परवाह की, पूर्ण शरणागत हो गया, अब महापुरुष ने तो अकारण कृपा सबके ऊपर की, सबको समझाया। लेकिन उसमें एक घोर संसारी ही रहा, एक थोड़ा बहुत आगे बढ़ा, एक कुछ ज्यादा आगे बढ़ा, एक सब कुछ त्याग करके 24 घंटे लग गया लक्ष्य प्राप्ति पर। पर जो 24 घंटे लग गया लक्ष्य प्राप्ति हेतु क्या उसके ऊपर विशेष कृपा हुई, यह सोचना मूर्खता है। कृपा तो सब पर बराबर हुई लेकिन तपे लोहे पर पानी पड़ा छन्न, जल गया और कमल के पत्ते पर पड़ा तो मोती की तरह चमकने लगा और वही पानी अगर सीप में पड़ा स्वाति का तो मोती बन गया। पानी तो सब पर बराबर पड़ रहा है लेकिन जैसा पात्र है, जैसा मूल्य समझा जितना विश्वास किया जितना वैराग्य है जिसको उसका बर्तन उतना बना, उसके हिसाब से उसने उतना लाभ उठाया। तो महापुरुष की यह कृपा है तत्त्वज्ञान करवा देना। क्योंकि बिना तत्त्वज्ञान के हम साधना भी क्या करते, भगवदप्राप्ति का तो प्रश्न ही नहीं है। तर्क, कुतर्क, संशय ही करते रहते, इसी में पूरा जीवन बीत जाता, मानव देह व्यर्थ हो जाता। साधना करते भी तो अपने अल्पज्ञान या गलत ज्ञान के अनुसार ही करते जिससे कोई लाभ नहीं होता।
--------जगद्गुरुत्तम श्री कृपालुजी महाप्रभु।
--------जगद्गुरुत्तम श्री कृपालुजी महाप्रभु।
कबीर जी कहते हैं:- तीन लोक नौ खंड में गुरु से बड़ा न कोय।
करता करे न करि सके,गुरु करे सो होये।।
यदि परमात्मा करना भी चाहे, तो भी न कर पाये। लेकिन गुरु चाहे तो हो जाये। इस वाक्य को पढ़कर आप सोचते होंगे कि ऐसा क्या? कबीर जी ने गुरु को परमात्मा से ऊपर बता दिया ये तो अतिशयोक्ति करते मालूम पड़ते हैं। जी नहीं, ध्यान से विचार करें। कबीर कह रहें हैं कि मार्ग के बिना तुम मंजिल पर पहुँच नहीं सकते। मंज़िल तो एक छोर है, उस छोर तक पहुचने के लिये मार्ग नहीं होगा तो पहुचोंगे कैसे? यानि मार्ग के बिना मंज़िल मिल नहीं सकती तो बताओ मार्ग बड़ा या मंज़िल? क्योंकि मार्ग पर चल दिये तो निश्चित ही एक दिन मंज़िल पर पहुँचोगे।
यानि परमात्मा मंज़िल है तो वो कुछ करना भी चाहे तो कर नहीं सकता काम। 'गुरु रूपी' मार्ग ही है, उसी के द्वारा मंज़िल मिलेगी। बस हमें ठीक से समझना होगा।
करता करे न करि सके,गुरु करे सो होये।।
यदि परमात्मा करना भी चाहे, तो भी न कर पाये। लेकिन गुरु चाहे तो हो जाये। इस वाक्य को पढ़कर आप सोचते होंगे कि ऐसा क्या? कबीर जी ने गुरु को परमात्मा से ऊपर बता दिया ये तो अतिशयोक्ति करते मालूम पड़ते हैं। जी नहीं, ध्यान से विचार करें। कबीर कह रहें हैं कि मार्ग के बिना तुम मंजिल पर पहुँच नहीं सकते। मंज़िल तो एक छोर है, उस छोर तक पहुचने के लिये मार्ग नहीं होगा तो पहुचोंगे कैसे? यानि मार्ग के बिना मंज़िल मिल नहीं सकती तो बताओ मार्ग बड़ा या मंज़िल? क्योंकि मार्ग पर चल दिये तो निश्चित ही एक दिन मंज़िल पर पहुँचोगे।
यानि परमात्मा मंज़िल है तो वो कुछ करना भी चाहे तो कर नहीं सकता काम। 'गुरु रूपी' मार्ग ही है, उसी के द्वारा मंज़िल मिलेगी। बस हमें ठीक से समझना होगा।
साधना का पहला शत्रु है - अहंकार। जहाँ अहंकार आया , समझो दीनता खत्म। दीनता ख़त्म तो समझो कि साधना चौपट हो गयी। आपको उपासना भगवान् की ही करनी है। संसार में बस व्यवहार करना है। बाहर से आदर कीजिये , परन्तु अटैचमेंट न हो , लेकिन ईश्वरीय क्षेत्र में अनन्य प्रेम होना चाहिए।
------जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।
------जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।
अगर आपने वास्तविक गुरु को त्याग दिया,गुरु का अपमान कर दिया या गुरु के साथ छल-कपट किया तो भगवान करोड़ों कोस दूर हो जायेंगे। तुम चाहे अब दिन रात आँसू बहाओ फिर। भगवान सह नहीं सकते अपने भक्त का अपमान। सदा सावधान रहो, जैसी भक्ति भगवान की हो, ठीक वैसी ही भक्ति उनके भक्त यानि वास्तविक महापुरुष की भी करनी ही होगी।
The spiritual aspirant should strictly follow the path advised by his Guru in order to get rid of his mental ailments and attain his supreme goal. He should be so busy taking his medicine in the form of devotional practice that there is no idle time left to find faults in others. The spiritual aspirant must be extremely vigilant to avoid this dangerous, unwholesome habit of contemplating others’ faults.
------jagaddguru shri kripalu ji maharaj.
------jagaddguru shri kripalu ji maharaj.
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मन का अटैचमेंट किसमें करें?
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Baar Baar suno, Baar Baar suno, tab tatvagyan paripakva hoga. Ye jo hum Logo ko Brham hota hai ki yeh to maine bahut suna hai, yeh to mein j...
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गुरु में हरिबुद्धि रखो सदा गुरुधामा | नरबुद्धि आने नहिं पाये आठु यामा || गुरु के प्रति सदैव भगवद् बुद्धि ही रखो | निरन्तर यह सावधानी र...
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