Thursday, April 11, 2013

सावधान ..... यमराज देख रहा है.....

मानव देह क्षण भंगुर है ,कल आवे न आवे। यमराज हर पल तके हुए है .... टाइम पूरा हुआ नहीं कि...... without Permission बिना बताये ले जायेगा वो।

जो मायाधीन है , पापात्मा है ...उसे घसीटते हुए ले जायेगा .....दंड देने के लिए ....
...

काल बड़ा बलवान है........इसमें भगवान् भी दखल नहीं देते......... और न संत .....

हम नहीं याद रखते ...भूल जाते हैं बार बार......इसीलिए ये सब लापरवाही हो रही है सबकी।

जरा सोचो...अगर अभी छिन गया तो फिर ......?......तो फिर जो स्मरण करते होगे आप ....मृत्यु के समय वैसी ही चित्तवृत्ति रहेगी और मरने के बाद वही गति मिलेगी।

बस यही सोचते हैं कि ..अभी तो हम दस साल के हैं , बीस साल के , पचास के हैं।

इसलिए कल कल मत करो ...अभी करो....जल्दी करो......टाइम बीता जा रहा है।

जो करने के लिए भगवान् ने मानव देह दिया है वो करो।

----------- तुम्हारा कृपालु।
सावधान ..... यमराज देख रहा है..... 

मानव देह क्षण भंगुर है ,कल आवे न आवे। यमराज हर पल तके हुए है .... टाइम पूरा हुआ नहीं कि...... without Permission बिना बताये ले जायेगा वो।
 
जो मायाधीन है , पापात्मा है ...उसे घसीटते हुए ले जायेगा .....दंड देने के लिए ....
 
काल बड़ा बलवान है........इसमें भगवान् भी दखल नहीं देते......... और न संत .....
 
हम नहीं याद रखते ...भूल जाते हैं बार बार......इसीलिए ये सब लापरवाही हो रही है सबकी।
 
जरा सोचो...अगर अभी छिन गया तो फिर ......?......तो फिर जो स्मरण करते होगे आप ....मृत्यु के समय वैसी ही चित्तवृत्ति रहेगी और मरने के बाद वही गति मिलेगी।
 
बस यही सोचते हैं कि ..अभी तो हम दस साल के हैं , बीस साल के , पचास के हैं।
 
इसलिए कल कल मत करो ...अभी करो....जल्दी करो......टाइम बीता जा रहा है।
 
जो करने के लिए भगवान् ने मानव देह दिया है वो करो।
 
----------- तुम्हारा कृपालु।

 

वास्तविक महापुरुष से मिलन ही ईश्वर की अंतिम कृपा है। महापुरुष मिलन, ईश्वर मिलन का पक्का प्रमाण है।
--------श्री कृपालुजी महाप्रभु।
वास्तविक महापुरुष से मिलन ही ईश्वर की अंतिम कृपा है। महापुरुष मिलन, ईश्वर मिलन का पक्का प्रमाण है।
 --------श्री कृपालुजी महाप्रभु।

 
अनंत जन्मों तक माथा पच्ची करने के पश्चात भी जो दिव्य ज्ञान हमें न मिलता वह हमारे गुरु ने इतने सरल और सहज रूप में हमें प्रदान कर दिया, अब इसके बाद हमारी ड्यूटि है कि उस तत्त्वज्ञान को बार-बार चिंतन द्वारा पक्का करके उसके अनुसार प्रैक्टिकल करें। अब हमने यहाँ लापरवाही की, एक ने कुछ परवाह की, एक ने और परवाह की, एक ने पूर्ण परवाह की, पूर्ण शरणागत हो गया, अब महापुरुष ने तो अकारण कृपा सबके ऊपर की, सबको समझाया। लेकिन उसमें एक घोर संसारी ही रहा, एक थोड़ा बहुत आगे बढ़ा, एक कुछ ज्यादा आगे बढ़ा, एक सब कुछ त्याग करके 24 घंटे लग गया लक्ष्य प्राप्ति पर। पर जो 24 घंटे लग गया लक्ष्य प्राप्ति हेतु क्या उसके ऊपर विशेष कृपा हुई, यह सोचना मूर्खता है। कृपा तो सब पर बराबर हुई लेकिन तपे लोहे पर पानी पड़ा छन्न, जल गया और कमल के पत्ते पर पड़ा तो मोती की तरह चमकने लगा और वही पानी अगर सीप में पड़ा स्वाति का तो मोती बन गया। पानी तो सब पर बराबर पड़ रहा है लेकिन जैसा पात्र है, जैसा मूल्य समझा जितना विश्वास किया जितना वैराग्य है जिसको उसका बर्तन उतना बना, उसके हिसाब से उसने उतना लाभ उठाया। तो महापुरुष की यह कृपा है तत्त्वज्ञान करवा देना। क्योंकि बिना तत्त्वज्ञान के हम साधना भी क्या करते, भगवदप्राप्ति का तो प्रश्न ही नहीं है। तर्क, कुतर्क, संशय ही करते रहते, इसी में पूरा जीवन बीत जाता, मानव देह व्यर्थ हो जाता। साधना करते भी तो अपने अल्पज्ञान या गलत ज्ञान के अनुसार ही करते जिससे कोई लाभ नहीं होता।
--------जगद्गुरुत्तम श्री कृपालुजी महाप्रभु।

अनंत जन्मों तक माथा पच्ची करने के पश्चात भी जो दिव्य ज्ञान हमें न मिलता वह हमारे गुरु ने इतने सरल और सहज रूप में हमें प्रदान कर दिया, अब इसके बाद हमारी ड्यूटि है कि उस तत्त्वज्ञान को बार-बार चिंतन द्वारा पक्का करके उसके अनुसार प्रैक्टिकल करें। अब हमने यहाँ लापरवाही की, एक ने कुछ परवाह की, एक ने और परवाह की, एक ने पूर्ण परवाह की, पूर्ण शरणागत हो गया, अब महापुरुष ने तो अकारण कृपा सबके ऊपर की, सबको समझाया। लेकिन उसमें एक घोर संसारी ही रहा, एक थोड़ा बहुत आगे बढ़ा, एक कुछ ज्यादा आगे बढ़ा, एक सब कुछ त्याग करके 24 घंटे लग गया लक्ष्य प्राप्ति पर। पर जो 24 घंटे लग गया लक्ष्य प्राप्ति हेतु क्या उसके ऊपर विशेष कृपा हुई, यह सोचना मूर्खता है। कृपा तो सब पर बराबर हुई लेकिन तपे लोहे पर पानी पड़ा छन्न, जल गया और कमल के पत्ते पर पड़ा तो मोती की तरह चमकने लगा और वही पानी अगर सीप में पड़ा स्वाति का तो मोती बन गया। पानी तो सब पर बराबर पड़ रहा है लेकिन जैसा पात्र है, जैसा मूल्य समझा जितना विश्वास किया जितना वैराग्य है जिसको उसका बर्तन उतना बना, उसके हिसाब से उसने उतना लाभ उठाया। तो महापुरुष की यह कृपा है तत्त्वज्ञान करवा देना। क्योंकि बिना तत्त्वज्ञान के हम साधना भी क्या करते, भगवदप्राप्ति का तो प्रश्न ही नहीं है। तर्क, कुतर्क, संशय ही करते रहते, इसी में पूरा जीवन बीत जाता, मानव देह व्यर्थ हो जाता। साधना करते भी तो अपने अल्पज्ञान या गलत ज्ञान के अनुसार ही करते जिससे कोई लाभ नहीं होता।
 --------जगद्गुरुत्तम श्री कृपालुजी महाप्रभु।

 

एक सद्गुरु जो जागा हुआ है, वह सोये हुए को हिला सकता है, जागा सकता है, हालाकि तुम सद्गुरु को भी धोखा दे जाते हो। उससे कहते हो, बस! उठता हूँ। करवट लेकर, आँखें बंद करके, फिर सो जाते हो। अकेले तो तुम्हारा जागना करीब-करीब असंभव है।
एक सद्गुरु जो जागा हुआ है, वह सोये हुए को हिला सकता है, जागा सकता है, हालाकि तुम सद्गुरु को भी धोखा दे जाते हो। उससे कहते हो, बस! उठता हूँ। करवट लेकर, आँखें बंद करके, फिर सो जाते हो। अकेले तो तुम्हारा जागना करीब-करीब असंभव है।

 
कबीर जी कहते हैं:- तीन लोक नौ खंड में गुरु से बड़ा न कोय।
करता करे न करि सके,गुरु करे सो होये।।

यदि परमात्मा करना भी चाहे, तो भी न कर पाये। लेकिन गुरु चाहे तो हो जाये। इस वाक्य को पढ़कर आप सोचते होंगे कि ऐसा क्या? कबीर जी ने गुरु को परमात्मा से ऊपर बता दिया ये तो अतिशयोक्ति करते मालूम पड़ते हैं। जी नहीं, ध्यान से विचार करें। कबीर कह रहें हैं कि मार्ग के बिना तुम मंजिल पर पहुँच नहीं सकते। मंज़िल तो एक छोर है, उस छोर तक पहुचने के लिये मार्ग नहीं होगा तो पहुचोंगे कैसे? यानि मार्ग के बिना मंज़िल मिल नहीं सकती तो बताओ मार्ग बड़ा या मंज़िल? क्योंकि मार्ग पर चल दिये तो निश्चित ही एक दिन मंज़िल पर पहुँचोगे।
यानि परमात्मा मंज़िल है तो वो कुछ करना भी चाहे तो कर नहीं सकता काम। 'गुरु रूपी' मार्ग ही है, उसी के द्वारा मंज़िल मिलेगी। बस हमें ठीक से समझना होगा।
कबीर जी कहते हैं:- तीन लोक नौ खंड में गुरु से बड़ा न कोय।
 करता करे न करि सके,गुरु करे सो होये।।

 यदि परमात्मा करना भी चाहे, तो भी न कर पाये। लेकिन गुरु चाहे तो हो जाये। इस वाक्य को पढ़कर आप सोचते होंगे कि ऐसा क्या? कबीर जी ने गुरु को परमात्मा से ऊपर बता दिया ये तो अतिशयोक्ति करते मालूम पड़ते हैं। जी नहीं, ध्यान से विचार करें। कबीर कह रहें हैं कि मार्ग के बिना तुम मंजिल पर पहुँच नहीं सकते। मंज़िल तो एक छोर है, उस छोर तक पहुचने के लिये मार्ग नहीं होगा तो पहुचोंगे कैसे? यानि मार्ग के बिना मंज़िल मिल नहीं सकती तो बताओ मार्ग बड़ा या मंज़िल? क्योंकि मार्ग पर चल दिये तो निश्चित ही एक दिन मंज़िल पर पहुँचोगे।
 यानि परमात्मा मंज़िल है तो वो कुछ करना भी चाहे तो कर नहीं सकता काम। 'गुरु रूपी' मार्ग ही है, उसी के द्वारा मंज़िल मिलेगी। बस हमें ठीक से समझना होगा।

 

साधना का पहला शत्रु है - अहंकार। जहाँ अहंकार आया , समझो दीनता खत्म। दीनता ख़त्म तो समझो कि साधना चौपट हो गयी। आपको उपासना भगवान् की ही करनी है। संसार में बस व्यवहार करना है। बाहर से आदर कीजिये , परन्तु अटैचमेंट न हो , लेकिन ईश्वरीय क्षेत्र में अनन्य प्रेम होना चाहिए।
------जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।
साधना का पहला शत्रु है - अहंकार। जहाँ अहंकार आया , समझो दीनता खत्म। दीनता ख़त्म तो समझो कि साधना चौपट हो गयी। आपको उपासना भगवान् की ही करनी है। संसार में बस व्यवहार करना है। बाहर से आदर कीजिये , परन्तु अटैचमेंट न हो , लेकिन ईश्वरीय क्षेत्र में अनन्य प्रेम होना चाहिए।
------जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।


अगर आपने वास्तविक गुरु को त्याग दिया,गुरु का अपमान कर दिया या गुरु के साथ छल-कपट किया तो भगवान करोड़ों कोस दूर हो जायेंगे। तुम चाहे अब दिन रात आँसू बहाओ फिर। भगवान सह नहीं सकते अपने भक्त का अपमान। सदा सावधान रहो, जैसी भक्ति भगवान की हो, ठीक वैसी ही भक्ति उनके भक्त यानि वास्तविक महापुरुष की भी करनी ही होगी।
अगर आपने वास्तविक गुरु को त्याग दिया,गुरु का अपमान कर दिया या गुरु के साथ छल-कपट किया तो भगवान करोड़ों कोस दूर हो जायेंगे। तुम चाहे अब दिन रात आँसू बहाओ फिर। भगवान सह नहीं सकते अपने भक्त का अपमान। सदा सावधान रहो, जैसी भक्ति भगवान की हो, ठीक वैसी ही भक्ति उनके भक्त यानि वास्तविक महापुरुष की भी करनी ही होगी।

 

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...