Friday, April 12, 2013

Practice to feel the presence of Shri Maharaj Ji everywhere and all the time.
Practice to feel the presence of Shri Maharaj Ji everywhere and all the time.

 

An advanced devotee who shed tears for God and his heart has intense longing for God and who burns in the fire of seperation, is lovingly blaming God for burning his heart and making his eyes shed tears in a loving shayari:


Mere Dil Mein Rehta Hai, To Phir Kyon Jalaata Hai?
Aray Dushman Akal Ke, Apna Bhi Koi Ghar Jalaata Hai?
... You live in my heart, then why are you burning it in the fire of seperation?
Are you crazy? Does anyone burn their own house?

Meri Aakhon Mein Rehta Hai, To Phir Kyon Rulaata Hai?
Aray dushman Akal Ke, Apna Bhi Koi Ghar Dubaata Hai?

You live in my eyes, then why are you making me cry?
Are your crazy? Does anyone drown their own house?
An advanced devotee who shed tears for God and his heart has intense longing for God and who burns in the fire of seperation, is lovingly blaming God for burning his heart and making his eyes shed tears in a loving shayari:
 

Mere Dil Mein Rehta Hai, To Phir Kyon Jalaata Hai?
 Aray Dushman Akal Ke, Apna Bhi Koi Ghar Jalaata Hai?
 You live in my heart, then why are you burning it in the fire of seperation?
 Are you crazy? Does anyone burn their own house?
 
Meri Aakhon Mein Rehta Hai, To Phir Kyon Rulaata Hai?
 Aray dushman Akal Ke, Apna Bhi Koi Ghar Dubaata Hai?
 
You live in my eyes, then why are you making me cry?
 Are your crazy? Does anyone drown their own house?

 
भगवान की सेवा से भगवान की कृपा मिलेगी, उनका प्यार मिलेगा, अंत:करण शुद्ध होगा और वो तुम्हारा योगक्षेम वहन करेंगे।
------श्री महाराजजी।
भगवान की सेवा से भगवान की कृपा मिलेगी, उनका प्यार मिलेगा, अंत:करण शुद्ध होगा और वो तुम्हारा योगक्षेम वहन करेंगे।
 ------श्री महाराजजी।

 
इस धराधाम पर अनन्त बार श्रीहरि के अवतार हुये परन्तु अपने मन के दोष के कारण यह जीव कभी उनकी कृपा का पात्र नहीं बन सका ! ब्रह्म श्रीकृष्ण को भी यहाँ चोर - जार की उपाधि से विभूषित किया गया ! श्रीकृष्ण के अवतार काल में मिथ्या वासुदेव भी था जिसने दो नकली भुजाएं लगा ली थीं ! उनके श्रीकृष्ण के पास संदेश भेजा था कि असली वासुदेव मैं हूँ , तुम नहीं हो !

------जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज.
इस धराधाम पर अनन्त बार श्रीहरि के अवतार हुये परन्तु अपने मन के दोष के कारण यह जीव कभी उनकी कृपा का पात्र नहीं बन सका ! ब्रह्म श्रीकृष्ण को भी यहाँ चोर - जार की उपाधि से विभूषित किया गया ! श्रीकृष्ण के अवतार काल में मिथ्या वासुदेव भी था जिसने दो नकली भुजाएं लगा ली थीं ! उनके श्रीकृष्ण के पास संदेश भेजा था कि असली वासुदेव मैं हूँ , तुम नहीं हो !

------जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज.




Break the Privacy and feel that Shyam Sundar is always with me.
अपनी प्राइवेसी को समाप्त करे और यह फील करे कि मेरे इष्टदेव श्याम सुन्दर सदा मेरे साथ है.
~~~Jagadguru Shri Kripalu ji Maharaj~~~
Break the Privacy and feel that Shyam Sundar is always with me.
अपनी प्राइवेसी को समाप्त करे और यह फील करे कि मेरे इष्टदेव श्याम सुन्दर सदा मेरे साथ है.
~~~~~~Jagadguru Shri Kripalu ji Maharaj~~~~~~

 

तुम लोग अपने मन को अपने शरण्य में रखो। परस्पर प्यार से रहो एवं स्वयं में दोष देखो, अपनी-अपनी सेवा करो। यदि मुझे सुख देना चाहते हो तो, सदा अपने मन को राग द्वेष रहित रखो एवं शरण्य से प्यार बढ़ाओ। मैं सदा तुम लोगो को याद करता हूँ, तथा एक-एक क्षण का आइडिया नोट करता हूँ। वेद से लेकर रामायण तक अनंत कोटि-कल्प तक अध्ययन करके देख लो यही पाओगे कि गुरु और भगवान एक ही है अत: गुरु सेवा ही सर्वश्रेष्ठ लक्ष्य है।
*******जगद्गुरुत्तम श्री कृपालु महाप्रभु********
तुम लोग अपने मन को अपने शरण्य में रखो। परस्पर प्यार से रहो एवं स्वयं में दोष देखो, अपनी-अपनी सेवा करो। यदि मुझे सुख देना चाहते हो तो, सदा अपने मन को राग द्वेष रहित रखो एवं शरण्य से प्यार बढ़ाओ। मैं सदा तुम लोगो को याद करता हूँ, तथा एक-एक क्षण का आइडिया नोट करता हूँ। वेद से लेकर रामायण तक अनंत कोटि-कल्प तक अध्ययन करके देख लो यही पाओगे कि गुरु और भगवान एक ही है अत: गुरु सेवा ही सर्वश्रेष्ठ लक्ष्य है।
*******जगद्गुरुत्तम श्री कृपालु महाप्रभु********

मन का भगवान के पास जाना ही उपासना है। भगवान केवल भाव नोट करते हैं, क्रिया नहीं। जो कर्म भगवान में प्रेम उत्पन्न नहीं करता, वह अधर्म ही है। जिस किसी प्रकार से भी मन भगवान में आसक्त हो वही साधना है।

- जगदगुरु श्री कृपालु जी महाराज.
मन का भगवान के पास जाना ही उपासना है। भगवान केवल भाव नोट करते हैं, क्रिया नहीं। जो कर्म भगवान में प्रेम उत्पन्न नहीं करता, वह अधर्म ही है। जिस किसी प्रकार से भी मन भगवान में आसक्त हो वही साधना है। 

- जगदगुरु श्री कृपालु जी महाराज

 

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...