Wednesday, April 17, 2013

Preparatory devotion leads to perfect devotion through divine grace.
प्रथम साधना-भक्ति साधक को करनी होगी, जब वह भक्ति अन्तःकरण शुद्ध कर देगी, तभी फलरूपा दिव्य-भक्ति प्राप्त होगी।
--jagadguru shri kripalu ji maharaj.
Preparatory devotion leads to perfect devotion through divine grace.
प्रथम साधना-भक्ति साधक को करनी होगी, जब वह भक्ति अन्तःकरण शुद्ध कर देगी, तभी फलरूपा दिव्य-भक्ति प्राप्त होगी।
--jagadguru shri kripalu ji maharaj.

 

क्या आप लोग एक दिन भी वस्त्र पहनना भूलते हैं घर से बाहर निकलते समय? कभी नहीं भूलते। इसी प्रकार भगवान को भी सदा याद रखना होगा। यदि एक क्षण के लिए भी मन से भूल गए तो पाप करने लगेंगे हम लोग। हर समय, हर स्थान पे ये स्मरण बना रहे मन में कि हरि/गुरु सदा हमारे विचारों को नोट कर रहे हैं। अगर कोई केवल इतना ही कर ले तो भगवत प्राप्ति हो जाये और कोई साधना करने की आवश्यकता ही नहीं है।
~~~~~~~जगदगुरु श्री कृपालु जी महाराज~~~~~~~~
क्या आप लोग एक दिन भी वस्त्र पहनना भूलते हैं घर से बाहर निकलते समय? कभी नहीं भूलते। इसी प्रकार भगवान को भी सदा याद रखना होगा। यदि एक क्षण के लिए भी मन से भूल गए तो पाप करने लगेंगे हम लोग। हर समय, हर स्थान पे ये स्मरण बना रहे मन में कि हरि/गुरु सदा हमारे विचारों को नोट कर रहे हैं। अगर कोई केवल इतना ही कर ले तो भगवत प्राप्ति हो जाये और कोई साधना करने की आवश्यकता ही नहीं है। 
~~~~~~~जगदगुरु श्री कृपालु जी महाराज~~~~~~~~

 

Worldly pleasures are limited and transient. They cannot be the subject of the individual soul, who is divine in nature.
----jagadguru shri kripalu ji maharaj .
Worldly pleasures are limited and transient. They cannot be the subject of the individual soul, who is divine in nature. 
----jagadguru shri kripalu ji maharaj .

 
हमारा सम्बन्ध श्री कृष्ण से दासता, और उस सम्बन्ध को पक्का करेगा भक्ति मार्ग, और उससे पुरस्कार मिलेगा प्रेम, और उसका अंतिम लाभ मिलेगा सेवा | उस सेवा का जो आनंद होगा वो अनन्त कोटि ब्रह्मानंद से भी आगे है |
******जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज******

 
 

Monday, April 15, 2013

जिस किसी प्रकार से भी मन भगवान् में आसक्त हो वही साधना है।

...........श्री महाराज जी।
जिस किसी प्रकार से भी मन भगवान् में आसक्त हो वही साधना है।

 ...........श्री महाराज जी।

 

भगवान और गुरु सर्वव्यापक हैं, हमारे क्षण-क्षण के विचारों को, चिंतन को नोट करते हैं, ये विश्वास हमें सदा अपने हृदय में बनाये रखना चाहिये।
------श्री महाराजजी।
भगवान और गुरु सर्वव्यापक हैं, हमारे क्षण-क्षण के विचारों को, चिंतन को नोट करते हैं, ये विश्वास हमें सदा अपने हृदय में बनाये रखना चाहिये।
------श्री महाराजजी।

When we learn to surrender to the will of God, and accept ourselves as His servants, life becomes a festival and a continuous celebration.
------SHRI MAHARAJJI.
When we learn to surrender to the will of God, and accept ourselves as His servants, life becomes a festival and a continuous celebration.
 ------SHRI MAHARAJJI.

 

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...