Sunday, April 21, 2013

बोलिये! जय-जय श्री राधे। जय-जय श्री राधे। जय-जय श्री राधे।।
बोलिये! जय-जय श्री राधे। जय-जय श्री राधे। जय-जय श्री राधे।।

 

अपने से नीचे वाले को देखोगे तो 50 परसेंट दुख, अशांति, टेंशन चला जायेगा।
-----श्री महाराजजी।
अपने से नीचे वाले को देखोगे तो 50 परसेंट दुख, अशांति, टेंशन चला जायेगा।
 -----श्री महाराजजी।

 
 

यह समझे रहना है की हमारे प्रेमास्पद श्री कृष्ण सर्वत्र है एवं सर्वदा है।विश्व में एक परमाणु भी ऐसा नहीं है, जहाँ उसका निवास न हो।जैसे तिल में तेल व्याप्त होता है ऐसे ही भगवान भी सर्वव्यापक है।उनको कोई भी स्थान या काल अपवित्र नहीं कर सकता।वरन वे ही अपवित्र को पवित्र कर देते है।
-----------जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।
यह समझे रहना है की हमारे प्रेमास्पद श्री कृष्ण सर्वत्र है एवं सर्वदा है।विश्व में एक परमाणु भी ऐसा नहीं है, जहाँ उसका निवास न हो।जैसे तिल में तेल व्याप्त होता है ऐसे ही भगवान भी सर्वव्यापक है।उनको कोई भी स्थान या काल अपवित्र नहीं कर सकता।वरन वे ही अपवित्र को पवित्र कर देते है।
-----------जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।

 

सद्गुरु के पास किसी को इंकार नहीं है। जो डूबने को राजी है सद्गुरु उसे लेने को तैयार है। वह शर्ते नहीं रखता। वह पात्रताओं के जाल खडे नहीं करता। अपात्र को पात्र बना ले, वही तो सद्गुरु है। अयोग्य को योग्य बना ले वही तो सद्गुरु है। संसारी को सन्यासी बना ले, वही तो सद्गुरु है।
-----श्री महाराजजी।

 

हमसे तो कुछ होता नहीं। यह जो बैठे-बैठे निराशा का चिन्तन करते हो, यही सर्वनाश करता है। निराशा गुरु की शक्ति का अपमान है। निराशा तब होती है जब शरणागत यह सोचता है कि हमारा गुरु हमारी रक्षा नहीं कर रहा है न भविष्य में करेगा। वह रक्षा करने में असमर्थ है। स्वयं से पूछो क्या ऐसा है?
-----श्री महाराजजी।
हमसे तो कुछ होता नहीं। यह जो बैठे-बैठे निराशा का चिन्तन करते हो, यही सर्वनाश करता है। निराशा गुरु की शक्ति का अपमान है। निराशा तब होती है जब शरणागत यह सोचता है कि हमारा गुरु हमारी रक्षा नहीं कर रहा है न भविष्य में करेगा। वह रक्षा करने में असमर्थ है। स्वयं से पूछो क्या ऐसा है? 
-----श्री महाराजजी।

 

सदा यह चिन्तन बनाये रखो कि मुझे मेरे प्रिय गुरुवर (श्री महाराजजी) का जितना स्नेह, अनुग्रह मिल चुका है वही अनंत जन्मों के पुण्यों से असम्भव है। अतएव पूर्व प्राप्त स्नेह एवं अनुग्रह का चिन्तन करके बार-बार बलिहार जाओ।
सदा यह चिन्तन बनाये रखो कि मुझे मेरे प्रिय गुरुवर (श्री महाराजजी) का जितना स्नेह, अनुग्रह मिल चुका है वही अनंत जन्मों के पुण्यों से असम्भव है। अतएव पूर्व प्राप्त स्नेह एवं अनुग्रह का चिन्तन करके बार-बार बलिहार जाओ।


Thursday, April 18, 2013

Sinful minds are purified by meditating on the Lotus Feet of Shri Radha-Krishna.
Sinful minds are purified by meditating on the Lotus Feet of Shri Radha-Krishna.

 

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...