Thursday, May 2, 2013

यद्दपि हरि गुरु दोनों ही जीव के सच्चे हितैषी हैं पर गुरु का महत्व हरि से अधिक इसलिये है क्योंकि हरि ने प्रेम दान करने का अधिकार अपने भक्तों को ही दिया है। हरि स्वयं अपना प्रेम प्रदान नहीं करते। अतः जीव के स्वार्थ की द्रष्टि से गुरु का स्थान ऊँचा है क्योंकि जब गुरु कृपा करता है तब ही हरि की प्राप्ति होती है।
~~~~~~जगद्गुरु श्री कृपालु महाप्रभु~~~~~~
यद्दपि हरि गुरु दोनों ही जीव के सच्चे हितैषी हैं पर गुरु का महत्व हरि से अधिक इसलिये है क्योंकि हरि ने प्रेम दान करने का अधिकार अपने भक्तों को ही दिया है। हरि स्वयं अपना प्रेम प्रदान नहीं करते। अतः जीव के स्वार्थ की द्रष्टि से गुरु का स्थान ऊँचा है क्योंकि जब गुरु कृपा करता है तब ही हरि की प्राप्ति होती है।
~~~~~~जगद्गुरु श्री कृपालु महाप्रभु~~~~~~


 

गुरु हमारे अत्यन्त निकट हैं , दिन - रात हमारे साथ रहते हैं , उनका वियोग कभी होता ही नहीं।
-----श्री महाराज जी।
गुरु हमारे अत्यन्त निकट हैं , दिन - रात हमारे साथ रहते हैं , उनका वियोग कभी होता ही नहीं।
-----श्री महाराज जी।


 


The only remedy for all suffering is to turn towards God.
---jagadguru shri kripalu ji maharaj .
The only remedy for all suffering is to turn towards God.
---jagadguru shri kripalu ji maharaj .


 



भगवत्कृपा का सबसे पक्का प्रमाण , भगवज्जन मिलन है , कृपा से लाभ लेना तभी संभव है , जब इस कृपा को बार - बार चिंतन में लाया जाय । भगवज्जन का यदि दर्शन मात्र प्राप्त हो जाय तो बार - बार चिंतन कर आनन्द विभोर होना चाहिए । क्योंकि उनके दर्शन को पाने या दिलाने की सामर्थ्य किसी भी साधना में नहीं है । यदि दर्शन के अतिरिक्त और भी सामीप्य मिल जाय फिर तो बात ही क्या है। यदि उस अमूल्य निधि को पाकर भी साधारण भावना या चिन्तन रहा तो महान कृतघ्नता एवं महान दुर्भाग्य ही होगा , क्योंकि इससे अधिक हमें क्या पाना शेष है।
~~~~~~~~~जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज~~~~~~~~~
भगवत्कृपा का सबसे पक्का प्रमाण , भगवज्जन मिलन है , कृपा से लाभ लेना तभी संभव है , जब इस कृपा को बार - बार चिंतन में लाया जाय । भगवज्जन का यदि दर्शन मात्र प्राप्त हो जाय तो बार - बार चिंतन कर आनन्द विभोर होना चाहिए । क्योंकि उनके दर्शन को पाने या दिलाने की सामर्थ्य किसी भी साधना में नहीं है । यदि दर्शन के अतिरिक्त और भी सामीप्य मिल जाय फिर तो बात ही क्या है। यदि उस अमूल्य निधि को पाकर भी साधारण भावना या चिन्तन रहा तो महान कृतघ्नता एवं महान दुर्भाग्य ही होगा , क्योंकि इससे अधिक हमें क्या पाना शेष है।
~~~~~~~~~जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज~~~~~~~~~


 
 
 



Rob God and Guru of everything by offering Them body, mind and soul. If you do not offer these to God and Guru, people of the world will certainly rob you of them.

 ---Jagadguru Shree Kripaluji Maharaj.


 


Surrender of the mind is true surrender.
मन की शरणागति ही वास्तविक शरणागति है।
--shri maharaj ji.
Surrender of the mind is true surrender.
मन की शरणागति ही वास्तविक शरणागति है।
--shri maharaj ji.


 


यह समझे रहना है की हमारे प्रेमास्पद श्री कृष्ण सर्वत्र है एवं सर्वदा है।विश्व में एक परमाणु भी ऐसा नहीं है, जहाँ उसका निवास न हो।जैसे तिल में तेल व्याप्त होता है ऐसे ही भगवान भी सर्वव्यापक है।उनको कोई भी स्थान या काल अपवित्र नहीं कर सकता।वरन वे ही अपवित्र को पवित्र कर देते है।
-----------जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।
यह समझे रहना है की हमारे प्रेमास्पद श्री कृष्ण सर्वत्र है एवं सर्वदा है।विश्व में एक परमाणु भी ऐसा नहीं है, जहाँ उसका निवास न हो।जैसे तिल में तेल व्याप्त होता है ऐसे ही भगवान भी सर्वव्यापक है।उनको कोई भी स्थान या काल अपवित्र नहीं कर सकता।वरन वे ही अपवित्र को पवित्र कर देते है।
-----------जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।


 
 

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...