Wednesday, May 8, 2013

The absolute essence of all the Divine philosophies is to attach yourself in loving remembrance of your soul beloved krishna with a growing desire to serve Him more and more.
भगवान कहते हैं - मेरी कृपा का रहस्य तुम इतना मान लो की जो कुछ भी हो रहा है वो सब ( कृपा ) ही है।
~~~~~~~श्री कृपालु महाप्रभु~~~~~~~~
भगवान कहते हैं - मेरी कृपा का रहस्य तुम इतना मान लो की जो कुछ भी हो रहा है वो सब ( कृपा ) ही है।
~~~~~~~श्री कृपालु महाप्रभु~~~~~~~~


 


JAGADGURU SHRI KRIPALUJI MAHARAJ is the supreme exponent of Sanatan Dharm,the eternal vedic religion,and his reconcilation of all philosophies and faiths is unparalleled.
JAGADGURU SHRI KRIPALUJI MAHARAJ is the supreme exponent of Sanatan Dharm,the eternal vedic religion,and his reconcilation of all philosophies and faiths is unparalleled.




IF A DEVOTEE DOES NOT INVOLVE HIMSELF IN BAD ASSOCIATIONS AND MAINTAINS THE UNIFORMITY OF HIS DEDICATION AND SERVICE,HE MAY SUCCEED IN FINDING HIS SPIRITUAL GOAL IN HIS LIFE.
IF A DEVOTEE DOES NOT INVOLVE HIMSELF IN BAD ASSOCIATIONS AND MAINTAINS THE UNIFORMITY OF HIS DEDICATION AND SERVICE,HE MAY SUCCEED IN FINDING HIS SPIRITUAL GOAL IN HIS LIFE.


 


अज्ञानता के अंधकार से ज्ञान के प्रकाश की ओर केवल आत्मिक विचार.......... जब हम परमात्मा से प्रेम करने लगते हैं तो कोई भी सांसारिक वस्तु इस लायक नहीं प्रतीत होती कि उससे प्रेम किया जाए। जिस प्रकार चातक को यह विश्वास होता है कि स्वाति नक्षत्र में बरसे जल से ही उसकी पिपासा शान्त होगी, तब चातक पक्षी पावस में गिरने वाली ओस की पहली बूंदों का प्यासा हो जाता है तो उसे न तो तूफान का भय होता है और न ही बादलों की गर्जना का। इसी प्रकार साधक को भी ऎसी प्यास उत्पन्न हो जाये तो परमात्मा की प्राप्ति सुलभ हो जाती है यदि एक बार ईश्वर सानिध्य का स्वाद चख लिया तो फिर उसे संसार की सभी वस्तुयें स्वत: ही बेजान और बेस्वाद लगने लगती हैं। तब सांसारिक सुख-दुख की धरणा मिट जाती है, तब वह परम-आनन्द को प्राप्त कर सभी प्रकार से मुक्त हो जाता हैं।
अज्ञानता के अंधकार से ज्ञान के प्रकाश की ओर केवल आत्मिक विचार.......... जब हम परमात्मा से प्रेम करने लगते हैं तो कोई भी सांसारिक वस्तु इस लायक नहीं प्रतीत होती कि उससे प्रेम किया जाए। जिस प्रकार चातक को यह विश्वास होता है कि स्वाति नक्षत्र में बरसे जल से ही उसकी पिपासा शान्त होगी, तब चातक पक्षी पावस में गिरने वाली ओस की पहली बूंदों का प्यासा हो जाता है तो उसे न तो तूफान का भय होता है और न ही बादलों की गर्जना का। इसी प्रकार साधक को भी ऎसी प्यास उत्पन्न हो जाये तो परमात्मा की प्राप्ति सुलभ हो जाती है यदि एक बार ईश्वर सानिध्य का स्वाद चख लिया तो फिर उसे संसार की सभी वस्तुयें स्वत: ही बेजान और बेस्वाद लगने लगती हैं। तब सांसारिक सुख-दुख की धरणा मिट जाती है, तब वह परम-आनन्द को प्राप्त कर सभी प्रकार से मुक्त हो जाता हैं।


 

JAGADGURU SHRI KRIPALUJI MAHARAJ is the only saint of this age who has been honoured with the title of 'Jagadguru' the highest authority among all hindu vedic saints and scholars.The title is given only to that saint who brings a spiritual revolution in the world through his divine teachings.
JAGADGURU SHRI KRIPALUJI MAHARAJ is the only saint of this age who has been honoured with the title of 'Jagadguru' the highest authority among all hindu vedic saints and scholars.The title is given only to that saint who brings a spiritual revolution in the world through his divine teachings.


 

गुरु की कृपा से मिला हुआ ज्ञान ही स्थायी (permanent) रह सकता है।
......श्री महाराजजी।
गुरु की कृपा से मिला हुआ ज्ञान ही स्थायी (permanent) रह सकता है।
......श्री महाराजजी।


 

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...