Thursday, May 30, 2013

लगति सखि अब ससुरारि पियारि |
अब लौं रह अनजान पिया ते, रही उमरिया वारि |
अब दिय रसिक बताय पिया तव, मोहन मदन मुरारि |
अब न सुहात खेल गुड़ियन इन, दंपति पितु महतारि |
अब सोइ नाम रूप गुन लीला, धाम जनहिं मन हारि |
कह ‘कृपालु’ जेहि चहत पिया बस, सोइ सुहागिनि नारि ||

भावार्थ - अरी सखी ! अब तो ससुराल ही अच्छी लगती है | अब तक मैं अपने प्रियतम को नहीं जानती थी, मायाधीन होने के कारण अज्ञानी थी, किन्तु अब रसिकों ने बता दिया है कि तेरे प्रियतम एकमात्र मदन - मोहन श्यामसुन्दर ही हैं | अब स्त्री, पति, माता, पिता, आदि संसार के नातेदार गुड़ियों के खेल के समान प्रतीत होते हैं | अब तो प्रियतम श्यामसुन्दर के ही नाम, रूप, लीला, गुण, धाम, जन में ही मन अनुरक्त रहता है | ‘श्री कृपालु जी’ प्रेम भरी ईष् र्या में कहते हैं जिसको पिया चाहे वही सुहागिन नारी है | तेरे ऊपर श्यामसुन्दर की कृपा हो गई क्योंकि तूने रसिकों की बात पर विश्वास कर लिया | कभी हमारा भी समय आयेगा |

( प्रेम रस मदिरा सिद्धान्त - माधुरी )
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
सर्वाधिकार सुरक्षित - राधा गोविन्द समिति.
लगति सखि अब ससुरारि पियारि |
अब लौं रह अनजान पिया ते, रही उमरिया वारि |
अब दिय रसिक बताय पिया तव, मोहन मदन मुरारि |
अब न सुहात खेल गुड़ियन इन, दंपति पितु महतारि |
अब सोइ नाम रूप गुन लीला, धाम जनहिं मन हारि |
कह ‘कृपालु’ जेहि चहत पिया बस, सोइ सुहागिनि नारि ||


भावार्थ  -  अरी सखी ! अब तो ससुराल ही अच्छी लगती है | अब तक मैं अपने प्रियतम को नहीं जानती थी, मायाधीन होने के कारण अज्ञानी थी, किन्तु अब रसिकों ने बता दिया है कि तेरे प्रियतम एकमात्र मदन - मोहन श्यामसुन्दर ही हैं | अब स्त्री, पति, माता, पिता, आदि संसार के नातेदार गुड़ियों के खेल के समान प्रतीत होते हैं | अब तो प्रियतम श्यामसुन्दर के ही नाम, रूप, लीला, गुण, धाम, जन में ही मन अनुरक्त रहता है | ‘श्री कृपालु जी’ प्रेम भरी    ईष् र्या में कहते हैं जिसको पिया चाहे वही सुहागिन नारी है | तेरे ऊपर श्यामसुन्दर की कृपा हो गई क्योंकि तूने रसिकों की बात पर विश्वास कर लिया | कभी हमारा भी समय आयेगा |


( प्रेम रस मदिरा  सिद्धान्त  -  माधुरी )
  जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
सर्वाधिकार सुरक्षित - राधा गोविन्द समिति


 


भगवान का नाम,रूप,लीला,गुण,धाम एवं उनके भक्त सब एक ही हैं,इनमे कहीं भी मन का अनुराग अनन्यता ही है।
.......श्री महाराजजी।
भगवान का नाम,रूप,लीला,गुण,धाम एवं उनके भक्त सब एक ही हैं,इनमे कहीं भी मन का अनुराग अनन्यता ही है।
.......श्री महाराजजी।


Spiritual practice or sadhana involves attempting to constantly attach the mind to Shri Krishna. In the state of perfection, the mind will automatically remain attached to Him.
------jagadguru shri kripalu ji maharaj.
Spiritual practice or sadhana involves attempting to constantly attach the mind to Shri Krishna. In the state of perfection, the mind will automatically remain attached to Him.
------jagadguru shri kripalu ji maharaj.




Do not spoil your idle time.In fact,we do not make good use of our spare time and that causes negative feelings of despair to set in.The best remedy of this problem is not to let your mind remain idle.Wherever you go,engage yourself in the thoughts of God.

------- Jagadguru Shree Kripaluji Maharaj."

"Do not spoil your idle time.In fact,we do not make good use of our spare time and that causes negative feelings of despair to set in.The best remedy of this problem is not to let your mind remain idle.Wherever you go,engage yourself in the thoughts of God.

 ------- Jagadguru Shree Kripaluji Maharaj."


 

देखिये ! संसार में चौरासी लाख प्रकार के शरीर हैं उसमें केवल मनुष्य शरीर ऐसा है जिसमें हम साधना के द्वारा दुःखों से छुटकारा पाकर आनंद प्राप्त कर सकते हैं। बहुत बार आप लोगों को बताया गया है कि इसलिये देवता भी इस मानव देह को चाहते हैं । सात अरब आदमियों में सात करोड़ भी ऐसे नहीं हैं जिनके ऊपर भगवान् की ऐसी कृपा हो कि कोई बताने बाला सही - सही ज्ञान करा दे कि क्या करने से तुम्हारे दुःख चले जायेंगे और आनंद मिल जायेगा। और जिन लोगों को ये सौभाग्य प्राप्त हो चुका है , ये जान चुके हैं किसी महापुरुष से वे लोग भी फिर चौरासी लाख का हिसाब बैठा रहे हैं। क्यों ? उत्तर है , लापरवाही ।
----जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।
देखिये ! संसार में चौरासी लाख प्रकार  के शरीर हैं उसमें केवल मनुष्य शरीर ऐसा है जिसमें हम साधना के द्वारा दुःखों से छुटकारा पाकर आनंद प्राप्त कर सकते हैं। बहुत बार आप लोगों को बताया गया है कि इसलिये देवता भी इस मानव देह को चाहते हैं । सात अरब आदमियों में सात करोड़ भी ऐसे नहीं हैं जिनके ऊपर भगवान् की ऐसी कृपा हो कि कोई बताने बाला सही - सही ज्ञान करा दे कि क्या करने से तुम्हारे दुःख चले जायेंगे और आनंद मिल जायेगा। और जिन लोगों को ये सौभाग्य प्राप्त हो चुका है , ये जान चुके हैं किसी महापुरुष से वे लोग भी फिर चौरासी लाख का हिसाब बैठा रहे हैं। क्यों ? उत्तर है , लापरवाही ।
----जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।


 


भगवद विषय में मन लगाये रहो,ताकि मृत्युकाल में भी भगवान का स्मरण रहे।
........श्री महाराजजी।
भगवद विषय में मन लगाये रहो,ताकि मृत्युकाल में भी भगवान का स्मरण रहे।
........श्री महाराजजी।



श्री महाराज के श्री मुख से ----भगवान् कहते हैं -
अन्त समय में जो मुझको स्मरण करता है। मुझको ही स्मरण करते हुये शरीर छोड़ता है। दोनों शब्दों पर ध्यान दो। ' मां एव ' केवल मुझको स्मरण करे मरते समय , केवल मुझको। ' भी ' नहीं। तो -
वो मेरे लोक को आता है।
स्मरण करना होगा , मन से।
राम श्याम , ओम कोई भगवन्नाम लो साथ में मेरा स्मरण करो। तब मुझको प्राप्त करोगे। खाली नाम से नहीं। यानी तुम्हारी भावना होनी चाहिये इस नाम मैं भगवान् बैठे हैं।
श्री महाराज के श्री मुख से ----भगवान् कहते हैं -
अन्त समय में जो मुझको स्मरण करता है। मुझको ही स्मरण करते हुये शरीर छोड़ता है। दोनों शब्दों पर ध्यान दो। ' मां एव ' केवल मुझको स्मरण करे मरते समय , केवल मुझको। ' भी ' नहीं। तो - 
वो मेरे लोक को आता है। 
स्मरण करना होगा , मन से।
राम श्याम , ओम कोई भगवन्नाम लो साथ में मेरा स्मरण करो। तब मुझको प्राप्त करोगे। खाली नाम से नहीं। यानी तुम्हारी भावना होनी चाहिये इस नाम मैं भगवान् बैठे हैं।



मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...