Thursday, May 30, 2013

अरे भाई! कुछ कमा लो,जैसे पहले कुछ कमाया था तो मनुष्य का शरीर मिला और भगवान में थोड़ी सी प्रव्रत्ति हुई।
......श्री महाराजजी।
अरे भाई! कुछ कमा लो,जैसे पहले कुछ कमाया था तो मनुष्य का शरीर मिला और भगवान में थोड़ी सी प्रव्रत्ति हुई।
......श्री महाराजजी।


 


The world can be fooled by external behaviour; but God is controlled only by true love.
........SHRI MAHARAJJI.
The world can be fooled by external behaviour; but God is controlled only by true love.
 ........SHRI MAHARAJJI.


 

श्री कृपालु जी महाराज के मुखारविंद से:-

जो आदेश मैंने तुमको दिया है: दीनता, मधुरभाषण, नम्रता , उनका पालन तुम लोग अभी नहीं कर रहे हो। एक भिक्षा माँग रहा हूँ, तुम लोग लापरवाही कर रहे हो, यह बुरी बात है।
श्री कृपालु जी महाराज के मुखारविंद से:-
 
जो आदेश मैंने तुमको दिया है: दीनता, मधुरभाषण, नम्रता , उनका पालन तुम लोग अभी नहीं कर रहे हो। एक भिक्षा माँग रहा हूँ, तुम लोग लापरवाही कर रहे हो, यह बुरी बात है।


 


संसार में जितने भी रिश्ते-नातेदार है उनको अपने ही हित का पता नहीं है,वो बेचारे हमारा हित क्या करेंगे?
.......श्री महाराजजी।
संसार में जितने भी रिश्ते-नातेदार है उनको अपने ही हित का पता नहीं है,वो बेचारे हमारा हित क्या करेंगे?
.......श्री महाराजजी।




मन प्रतिक्षण कर्म करता है...........

एक क्षण को मन चुप नहीं रहेगा। तो संसार में राग नहीं है, द्वेष नहीं है, तो मन कहेगा हमको काम बताओ। लो भई, संसार में नहीं जाते हम । लेकिन हमको काम बताओ, हम खड़े नहीं रह सकते। साइकिल चलती रहे, उसको घुमा दो, दायें बायें अगर चलना बन्द किया तो गिर जाओगे।

एक पण्डित जी ने भूत सिद्ध किया, भूत। तो वो भूत उनको परेशान करने लगा। हर समय कहे, पण्डित जी काम बताओ। तो किसी आदमी का काम कितना होगा। वो पण्डित जी सो जायें तो जगावे, पण्डित जी काम बताओ। देखिये पण्डितजी, मैंने आपको कहा था न हमको काम बताते रहना पड़ेगा। हम खाली नहीं बैठेंगे। तो पहले तो कह दिया पण्डित जी ने, हाँ-हाँ, लेकिन अब उनका सोना मुश्किल हो गया। वो गये एक महात्मा के पास। अरे महाराज! हम तो अच्छे फँसे, वो भूत सिद्ध किया, वो तो हर समय परेशान करता है कि हमको काम बताओ। तो उनने कहा ऐसा करो, एक बाँस गाड़ दो और उससे कहो-देखो जब तक काम न बतावें तब तक इसके ऊपर चढ़ो-उतरो, चढ़ो-उतरो, ऐसे किया करो।
...

भगवद्-भक्ति,
रचयिता- जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
प्रथम संस्करण मार्च 2008, प्रवचन -4, पृ. 24

भावार्थः- मन, भगवान् द्वारा मनुष्य को प्रदान किया गया एक ऐसा यन्त्र है, जो एक क्षण को भी अकर्मा नहीं रह सकता, ये प्रतिक्षण कर्म करता है। दो ही क्षेत्र हैं, जहाँ मन कर्म कर सकता है-एक है भगवान् का क्षेत्र और एक है संसार का क्षेत्र, तीसरा कोई क्षेत्र है ही नहीं। मन या तो संसार से प्रेम करेगा अर्थात् संसार में आसक्त होगा अथवा भगवान् से अनुराग करेगा, लेकिन इन दोनों में से एक कार्य उसको करना पड़ेगा, क्योंकि मन एक क्षण के सौवें भाग के लिये भी खाली नहीं रह सकता।

-जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाप्रभु.

<मन प्रतिक्षण कर्म करता है>

एक क्षण को मन चुप नहीं रहेगा। तो संसार में राग नहीं है, द्वेष नहीं है, तो मन कहेगा हमको काम बताओ। लो भई, संसार में नहीं जाते हम । लेकिन हमको काम बताओ, हम खड़े नहीं रह सकते। साइकिल चलती रहे, उसको घुमा दो, दायें बायें अगर चलना बन्द किया तो गिर जाओगे।

एक पण्डित जी ने भूत सिद्ध किया, भूत। तो वो भूत उनको परेशान करने लगा। हर समय कहे, पण्डित जी काम बताओ। तो किसी आदमी का काम कितना होगा। वो पण्डित जी सो जायें तो जगावे, पण्डित जी काम बताओ। देखिये पण्डितजी, मैंने आपको कहा था न हमको काम बताते रहना पड़ेगा। हम खाली नहीं बैठेंगे। तो पहले तो कह दिया पण्डित जी ने, हाँ-हाँ, लेकिन अब उनका सोना मुश्किल हो गया। वो गये एक महात्मा के पास। अरे महाराज! हम तो अच्छे फँसे, वो भूत सिद्ध किया, वो तो हर समय परेशान करता है कि हमको काम बताओ। तो उनने कहा ऐसा करो, एक बाँस गाड़ दो और उससे कहो-देखो जब तक काम न बतावें तब तक इसके ऊपर चढ़ो-उतरो, चढ़ो-उतरो, ऐसे किया करो।

भगवद्-भक्ति,
रचयिता- जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
प्रथम संस्करण मार्च 2008, प्रवचन -4, पृ. 24

भावार्थः- मन, भगवान् द्वारा मनुष्य को प्रदान किया गया एक ऐसा यन्त्र है, जो एक क्षण को भी अकर्मा नहीं रह सकता, ये प्रतिक्षण कर्म करता है। दो ही क्षेत्र हैं, जहाँ मन कर्म कर सकता है-एक है भगवान् का क्षेत्र और एक है संसार का क्षेत्र, तीसरा कोई क्षेत्र है ही नहीं। मन या तो संसार से प्रेम करेगा अर्थात् संसार में आसक्त होगा अथवा भगवान् से अनुराग करेगा, लेकिन इन दोनों में से एक कार्य उसको करना पड़ेगा, क्योंकि मन एक क्षण के सौवें भाग के लिये भी खाली नहीं रह सकता।

-जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाप्रभु


 


संत और भगवान दया के सिवाय ओर कुछ कर नहीं सकते अपनी बुद्धि मे जोड़ दो बस पूर्ण शरणागति यही है ।
प्रत्येक अवस्था में दया कौनसी है यह समझ में नहीं आता, कृपालु संत की कृपा का लाभ वही उठा सकता है जो उनकी कृपा के तत्व को समझता है ।
संत भी ऐसे मनुष्य को पाप से नहीं बचा सकता जो उनके कथनानुसार नहीं चलता।

-------जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज।
संत और भगवान दया के सिवाय ओर कुछ कर नहीं सकते अपनी बुद्धि मे जोड़ दो बस पूर्ण शरणागति यही है ।
प्रत्येक अवस्था में दया कौनसी है यह समझ में नहीं आता, कृपालु संत की कृपा का लाभ वही उठा सकता है जो उनकी कृपा के तत्व को समझता है ।
संत भी ऐसे मनुष्य को पाप से नहीं बचा सकता जो उनके कथनानुसार नहीं चलता।

-------जगद्गुरु  श्री कृपालुजी महाराज।
भगवान् और संत ये दो पर्सनेलिटी ऐसी हैं जो शरीर से अलग हुए तो दिखायी पड़ते हैं | एक्टिंग में किसी को छोड़कर जीवनभर को वियोगी बना सकते हैं लेकिन अन्दर से कभी भी अलग नहीं हो सकते | हमारा शरीर नहीं रहता, तब भी वे रहते हैं | नरक में भी वो हमारे साथ रहते हैं और बैकुण्ठ में भी वे हमारे साथ रहते हैं | वे हमारा साथ छोड़ देंगे ऐसा कभी समझना ही नहीं चाहिए | समझना ही नहीं - अनुभव करना चाहिए |

----जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज.
भगवान् और संत ये दो पर्सनेलिटी ऐसी हैं जो शरीर से अलग हुए तो दिखायी पड़ते हैं | एक्टिंग में किसी को छोड़कर जीवनभर को वियोगी बना सकते हैं लेकिन अन्दर से कभी भी अलग नहीं हो सकते | हमारा शरीर नहीं रहता, तब भी वे रहते हैं | नरक में भी वो हमारे साथ रहते हैं और बैकुण्ठ में भी वे हमारे साथ रहते हैं | वे हमारा साथ छोड़ देंगे ऐसा कभी समझना ही नहीं चाहिए | समझना ही नहीं - अनुभव करना चाहिए | 

----जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज.


 




मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...