Thursday, May 30, 2013

श्री महाराज के श्री मुख से ----भगवान् कहते हैं -
अन्त समय में जो मुझको स्मरण करता है। मुझको ही स्मरण करते हुये शरीर छोड़ता है। दोनों शब्दों पर ध्यान दो। ' मां एव ' केवल मुझको स्मरण करे मरते समय , केवल मुझको। ' भी ' नहीं। तो -
वो मेरे लोक को आता है।
स्मरण करना होगा , मन से।
राम श्याम , ओम कोई भगवन्नाम लो साथ में मेरा स्मरण करो। तब मुझको प्राप्त करोगे। खाली नाम से नहीं। यानी तुम्हारी भावना होनी चाहिये इस नाम मैं भगवान् बैठे हैं।
श्री महाराज के श्री मुख से ----भगवान् कहते हैं -
अन्त समय में जो मुझको स्मरण करता है। मुझको ही स्मरण करते हुये शरीर छोड़ता है। दोनों शब्दों पर ध्यान दो। ' मां एव ' केवल मुझको स्मरण करे मरते समय , केवल मुझको। ' भी ' नहीं। तो - 
वो मेरे लोक को आता है। 
स्मरण करना होगा , मन से।
राम श्याम , ओम कोई भगवन्नाम लो साथ में मेरा स्मरण करो। तब मुझको प्राप्त करोगे। खाली नाम से नहीं। यानी तुम्हारी भावना होनी चाहिये इस नाम मैं भगवान् बैठे हैं।



जीवन क्षणभंगुर है, अपने जीवन का क्षण क्षण हरि-गुरु के स्मरण में ही व्यतीत करो, अनावश्यक बातें करके समय बरबाद न करो। कुसंग से बचो, कम से कम लोगो से संबंध रखो, काम जितना जरूरी हो बस उतना बोलो।
-----श्री महाराजजी।
जीवन क्षणभंगुर है, अपने जीवन का क्षण क्षण हरि-गुरु के स्मरण में ही व्यतीत करो, अनावश्यक बातें करके समय बरबाद न करो। कुसंग से बचो, कम से कम लोगो से संबंध रखो, काम जितना जरूरी हो बस उतना बोलो।
-----श्री महाराजजी।


 


The mind is very fickle and uncontrollable. Through constant spiritual practice (attaching it to Shri Krishna) and detaching it from the world, you can bring it under control.
-----shri maharaj ji.
The mind is very fickle and uncontrollable. Through constant spiritual practice (attaching it to Shri Krishna) and detaching it from the world, you can bring it under control.
-----shri maharaj ji.


 


सखि कालि लखी नँदलाल रे |
गई रही कछु काम महरि घर, तहँ खेलत गोपाल रे |
सिर पर वाके मोर चंद्रिका, लट कारी घुंघराल रे |
पीत झँगुलिया झलमल झलकत, हलकत कुंडल गाल रे |
कटि किंकिनि पग पायल बाजति, चलत घुटुरुवनि चाल रे |
...
लखतहिं मदन गुपाल सखी मैं, भई हाल बेहाल रे |
जो ‘कृपालु’ सब जगहिं नचावत, नाचत यशुमति ताल रे ||

भावार्थ - एक सखी अपनी अन्तरंग सखी से कहती है, अरी सखी ! कल मैंने बालकृष्ण को देखा | मैं यशोदा मैया के घर कुछ काम से गयी थी | वहाँ वह खेल रहे थे | उनके सिर पर मोर मुकुट सुशोभित था | उनके बाल अत्यन्त घुँघराले थे | उनके शरीर पर पीले रंग की झँगुली झलमला रही थी | उनके कान के कुण्डल गाल पर हिल रहे थे | उनकी कमर में किंकिणि एवं पैर में पायल बज रही थीं | वह घुटनों के बल चल रहे थे | अरी सखी ! उन मदन गोपाल को देखते ही मैं तत्काल पागल सी हो गयी | ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं कि सब से आश्चर्य की बात तो यह है कि जो सारे संसार को अपनी माया से नचाता है उसको भी मैया अपने हाथों की तालियों से नचा रही थी |

( प्रेम रस मदिरा श्री कृष्ण – बाल लीला – माधुरी )
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
सर्वाधिकार सुरक्षित - राधा गोविन्द समिति.
सखि कालि लखी नँदलाल रे |
गई रही कछु काम महरि घर, तहँ खेलत गोपाल रे |
सिर पर वाके मोर चंद्रिका, लट कारी घुंघराल रे |
पीत झँगुलिया झलमल झलकत, हलकत कुंडल गाल रे |
कटि किंकिनि पग पायल बाजति, चलत घुटुरुवनि चाल रे |
लखतहिं मदन गुपाल सखी मैं, भई हाल बेहाल रे |
जो ‘कृपालु’ सब जगहिं नचावत, नाचत यशुमति ताल रे ||


भावार्थ -  एक सखी अपनी अन्तरंग सखी से कहती है, अरी सखी ! कल मैंने बालकृष्ण को देखा | मैं यशोदा मैया के घर कुछ काम से गयी थी | वहाँ वह खेल रहे थे | उनके सिर पर मोर मुकुट सुशोभित था | उनके बाल अत्यन्त घुँघराले थे | उनके शरीर पर पीले रंग की झँगुली झलमला रही थी | उनके कान के कुण्डल गाल पर हिल रहे थे | उनकी कमर में किंकिणि एवं पैर में पायल बज रही थीं | वह घुटनों के बल चल रहे थे | अरी सखी ! उन मदन गोपाल को देखते ही मैं तत्काल पागल सी हो गयी | ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं कि सब से आश्चर्य की बात तो यह है कि जो सारे संसार को अपनी माया से नचाता है उसको भी मैया अपने हाथों की तालियों से नचा रही थी | 


( प्रेम रस मदिरा   श्री कृष्ण – बाल लीला – माधुरी )
   जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
सर्वाधिकार सुरक्षित - राधा गोविन्द समिति


 
 

Grace and God are one, just like the Divine Bliss and God are one. It means that God Himself is the form of Grace and God Himself is the form of the Bliss. Grace is such a power of God with which all of His absolute and unlimited virtues are revealed. It is the Grace of God that makes a Saint experience His absolute Bliss, beauty and love; and it is the same power of Grace through which a Saint imparts God realization to his disciple. God and Grace are one and the same. So wherever God is, Grace is there.
.......JAGADGURU SHRI KRIPALUJI MAHARAJ.
Grace and God are one, just like the Divine Bliss and God are one. It means that God Himself is the form of Grace and God Himself is the form of the Bliss. Grace is such a power of God with which all of His absolute and unlimited virtues are revealed. It is the Grace of God that makes a Saint experience His absolute Bliss, beauty and love; and it is the same power of Grace through which a Saint imparts God realization to his disciple. God and Grace are one and the same. So wherever God is, Grace is there.
.......JAGADGURU SHRI KRIPALUJI MAHARAJ.


 

Tuesday, May 28, 2013

साधकों को सावधान करते हुये कहा गया है ; भगवान् एवं भगवज्जन के कार्य लीला मात्र हैं। लीला रसास्वादन हेतु होता है। बुद्धि का प्रयोग लीला में वर्जित है। भगवान् के सभी नाम , रूप , लीला , गुण , धाम व जन दिव्य हैं। यानी सांसारिक बुद्धि का प्रयोग करने से जीव भ्रम में पड़ जायगा। ' संशयात्मा विनश्यति ' रामावतार में सीता को खोजते हुये , अज्ञता का अभिनय करते हुये श्रीराम को देखकर सती को भ्रम हो गया। वे उन्हें साधारण राजकुमार समझ कर परीक्षा ले बैठीं। परिणाम स्वरूप भगवान् शिव ने उसका परित्याग कर दिया। पुनः पार्वती के रूप में भगवान् शिव के मुख से श्रद्धा पूर्वक रामचरित्र सुना। सती द्वारा संशय किये जाने से संसार को रामचरित्र प्राप्त हुआ। सती ने स्वयं शंका कर संसार को यह दिखाया कि भगवत्लीला में संशय नहीं करना चाहिये।
(-जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज)
साधकों को सावधान करते हुये कहा गया है ; भगवान् एवं भगवज्जन के कार्य लीला मात्र हैं। लीला रसास्वादन हेतु होता है। बुद्धि का प्रयोग लीला में वर्जित है। भगवान् के सभी नाम , रूप , लीला , गुण , धाम व जन दिव्य हैं। यानी सांसारिक बुद्धि का प्रयोग करने से जीव भ्रम में पड़ जायगा। ' संशयात्मा विनश्यति ' रामावतार में सीता को खोजते हुये , अज्ञता का अभिनय करते हुये श्रीराम को देखकर सती को भ्रम हो गया। वे उन्हें साधारण राजकुमार समझ कर परीक्षा ले बैठीं। परिणाम स्वरूप भगवान् शिव ने उसका परित्याग कर दिया। पुनः पार्वती के रूप में भगवान् शिव के मुख से श्रद्धा पूर्वक  रामचरित्र सुना। सती द्वारा संशय किये जाने से संसार को रामचरित्र प्राप्त हुआ। सती ने स्वयं  शंका कर संसार को यह दिखाया कि भगवत्लीला में संशय नहीं करना चाहिये।
(-जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज)




Realise the importance of the human birth and do not waste it in merely eating, drinking and making merry. This human body is inaccessible even to celestial gods. Having attained this precious birth, if we still fail to attain our ultimate aim in life, we will later regret our foolishness, because there is no other form of life in which we will be able to do anything towards the attainment of our ultimate goal. It is necessary therefore to think about what we are looking for in life.
------jagadguru shri kripalu ji maharaj.
Realise the importance of the human birth and do not waste it in merely eating, drinking and making merry. This human body is inaccessible even to celestial gods. Having attained this precious birth, if we still fail to attain our ultimate aim in life, we will later regret our foolishness, because there is no other form of life in which we will be able to do anything towards the attainment of our ultimate goal. It is necessary therefore to think about what we are looking for in life.
------jagadguru shri kripalu ji maharaj.




मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...