Wednesday, June 5, 2013

BY THE GRACE OF SHRI MAHARAJJI,WE ARE RUNNING TWO GROUPS,FIVE PAGES ON FACEBOOK PLATFORM TO PROPAGATE SHRI MAHARAJJI'S DIVINE PHILOSOPHY TO THE ENTIRE WORLD.WE HAVE ALSO CREATED A BLOG FOR THE SAME PURPOSE OF SPREADING THIS ULTIMATE DIVINE PHILOSOPHY OF SHRI MAHARAJJI TO THE ENTIRE MANKIND.LINKS OF ALL THESE GROUPS AND PAGES ARE GIVEN BELOW.YOU ARE REQUESTED TO ADD AS MANY SATSANGEES TO THESE GROUPS AND PAGES SO THAT THEY MAY ALSO KNOW WHO REAL SHRI MAHARAJJI IS.AND HEARTLY THANKS TO ALL THOSE WHO ARE SUPPORTING US IN SUCH A LARGE NO.FROM VERY BEGINNING.
RADHEY-RADHEY.
Born on October 7Male
जीवन क्षणभंगुर है, अपने जीवन का क्षण क्षण हरि-गुरु के स्मरण में ही व्यतीत करो, अनावश्यक बातें करके समय बरबाद न करो। कुसंग से बचो, कम से कम लोगो से संबंध रखो, काम जितना जरूरी हो बस उतना बोलो।
-----श्री महाराजजी।
जीवन क्षणभंगुर है, अपने जीवन का क्षण क्षण हरि-गुरु के स्मरण में ही व्यतीत करो, अनावश्यक बातें करके समय बरबाद न करो। कुसंग से बचो, कम से कम लोगो से संबंध रखो, काम जितना जरूरी हो बस उतना बोलो।
-----श्री महाराजजी।
हाथ-पैर की सेवा करना कोई बहुत बड़ी सेवा नहीं है,संत जो कहता है,उसके अनुसार चलना,सबसे बड़ी सेवा है।
------श्री कृपालुजी महाराज।
हाथ-पैर की सेवा करना कोई बहुत बड़ी सेवा नहीं है,संत जो कहता है,उसके अनुसार चलना,सबसे बड़ी सेवा है।
------श्री कृपालुजी महाराज।
Shri Maharaj Ji instructed in one of His lectures, pray:

O Krishna! If you Grace your devotees only due to their humility which I do not have any, then please first Grace me with humility.

Shri Maharaj Ji says.. Say this and shed tears. You will have to do this. Human body is momentary. You never know when you will get your ticket.
Shri Maharaj Ji instructed in one of His lectures, pray:

O Krishna! If you Grace your devotees only due to their humility which I do not have any, then please first Grace me with humility.

Shri Maharaj Ji says.. Say this and shed tears. You will have to do this. Human body is momentary. You never know when you will get your ticket.
कुसंग के वातावरण में रहते हुए भी जो सत्संग में निरंतर आगे बढ़ता जाये , वही असली साधक है।
------श्री महाराज जी।
कुसंग के वातावरण में रहते हुए भी जो सत्संग में निरंतर आगे बढ़ता जाये , वही असली साधक है। 
------श्री महाराज जी।
जब तक यह निश्चय न हो जाये कि संसार में सुख नहीं हैं,भगवान में ही सुख है,संसार की सम्पत्ति बटोरने की कामना रहेगी।
-------जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज।
जब तक यह निश्चय न हो जाये कि संसार में सुख नहीं हैं,भगवान में ही सुख है,संसार की सम्पत्ति बटोरने की कामना रहेगी।
-------जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज।
अगर कोई महापुरुष की कृपा को फील करना सीख जाये, तो बस उसे और साधना करने की आवश्यकता नहीं हैं। जिसके पीछे-पीछे भगवान चलता है, उसने हमे दर्शन दिये, बस यही सोच-सोचकर, बलिहार जाकर, हमें हर्ष में पागल हो जाना चाहिये। एक ईश्वरीय अक्षर का भी ज्ञान गुरु करा दे और उसके बदले मेँ सम्पूर्ण पृथ्वी भी अगर कोई दे दे, तो भी गुरु के ऋण से उऋण नहीं हों सकता।

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...