Wednesday, June 5, 2013

सर्वशक्ति प्राकट्य हो , लीला विविध प्रकार |
विहरत परिकर संग जो , तेहि भगवान पुकार ||24||

भावार्थ – जिस स्वरुप में समस्त शक्तियों का पूर्ण प्राकट्य हो एवं अनंत नाम ,रूप ,लीला ,गुण ,धाम तथा परिकर भी हों | नित्य विहार भी करते हों | वह भगवान श्रीकृष्ण का स्वरुप है |

(भक्ति शतक )
जगदगुरु श्री कृपालुजी महाराज द्वारा रचित |
सर्वशक्ति प्राकट्य हो , लीला विविध प्रकार |
विहरत परिकर संग जो , तेहि भगवान पुकार ||24||

भावार्थ – जिस स्वरुप में समस्त शक्तियों का पूर्ण प्राकट्य हो एवं अनंत नाम ,रूप ,लीला ,गुण ,धाम तथा परिकर भी हों | नित्य विहार भी करते हों | वह भगवान श्रीकृष्ण का स्वरुप है |

(भक्ति शतक )
जगदगुरु श्री कृपालुजी महाराज द्वारा रचित |

The past was the present once upon a time, and the present will be the past in the future. Thus, if we were free to act in the past, then we are free to act even in the present. And if we claim that we are not free to act today, that is, we are bound by fate, then we must not have acted freely in the past either. Even a person with a little common sense can understand this logic. In other words, using ‘fate’ as an excuse for negligence in spiritual endeavour, is even greater foolishness. Neither the scriptures, nor worldly people advise you to do nothing on the grounds that ‘fate’ will take care of everything.
------jagadguru shri kripalu ji maharaj.
The past was the present once upon a time, and the present will be the past in the future. Thus, if we were free to act in the past, then we are free to act even in the present. And if we claim that we are not free to act today, that is, we are bound by fate, then we must not have acted freely in the past either. Even a person with a little common sense can understand this logic. In other words, using ‘fate’ as an excuse for negligence in spiritual endeavour, is even greater foolishness. Neither the scriptures, nor worldly people advise you to do nothing on the grounds that ‘fate’ will take care of everything.
------jagadguru shri kripalu ji maharaj.
जिससे प्यार किया जाये उसको प्रिय कहते हैं , जो प्यार करे उसको प्रेमी कहते हैं और जो प्रिय और प्रेमी को जो मिलाने वाला हो उसको प्रेम कहते हैं। ये तीन चीजें होती हैं , प्रेमी , प्रेम और प्रेमास्पद। प्रियतम शब्द का एक विशेष अर्थ में है। प्रियतम कौन हो सकता है ? जिसके पास प्रेमधन हो। प्रेम तो भगवान् की एक विशेष शक्ति का नाम है जिसके वश में भगवान् रहते हैं। इतनी बड़ी शक्ति है।
भगवान् की सबसे प्राइवेट शक्ति का नाम है प्रेम। हम संसार के अज्ञानी लोग प्रेम शब्द को संसार में भी प्रयोग करते हैं। ' हम बाप से प्रेम कर रहे हैं .' ' माँ से प्रेम कर रहे हैं। ' , ' बीबी से प्रेम कर रहे हैं। , यहाँ कहाँ है प्रेम जो करोगे तुम। यहाँ तो सब भिखारी हैं , किसी के पास प्रेम है ही नहीं।
प्रेम भगवान् के पास है या जो भगवान् को प्राप्त कर लेते हैं उन सन्तों के पास है। बाकी जीव तो सब भिखारी हैं क्योंकि मायाधीन हैं इसलिये वो प्रिय नहीं बन सकते। प्रेमास्पद नहीं बन सकते , प्रेमास्पद शब्द का अर्थ है प्रेम का जो खजांची हो , जिसके पास प्रेम हो। जिसके पास धन हो वो धनी कहलाता है , जिसके पास गुण हो वो गुणी कहलाता है। उसी प्रकार जिसके पास प्रेमधन हो , दिव्य प्रेम , वो प्रिय कहलाता है। उससे प्यार करना है हमको।
!! जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज !!
जिससे प्यार किया जाये उसको प्रिय कहते हैं , जो प्यार करे उसको प्रेमी कहते हैं और जो प्रिय और प्रेमी को जो मिलाने वाला हो उसको प्रेम कहते हैं। ये तीन चीजें होती हैं , प्रेमी , प्रेम और प्रेमास्पद। प्रियतम शब्द का एक विशेष अर्थ में है। प्रियतम कौन हो सकता है ? जिसके पास प्रेमधन हो। प्रेम तो भगवान् की एक विशेष शक्ति का नाम है जिसके वश में भगवान् रहते हैं। इतनी बड़ी शक्ति है। 
भगवान् की सबसे प्राइवेट शक्ति का नाम है प्रेम। हम संसार के अज्ञानी लोग प्रेम शब्द को संसार में भी प्रयोग करते हैं। ' हम बाप से प्रेम कर रहे हैं .' ' माँ से प्रेम कर रहे हैं। ' , ' बीबी से प्रेम कर रहे हैं। , यहाँ कहाँ है प्रेम जो करोगे तुम। यहाँ तो सब भिखारी हैं , किसी के पास प्रेम है ही नहीं।
प्रेम भगवान् के पास है या जो भगवान् को प्राप्त कर लेते हैं उन सन्तों के पास है। बाकी जीव तो सब भिखारी हैं क्योंकि मायाधीन हैं इसलिये वो प्रिय नहीं बन सकते। प्रेमास्पद नहीं बन सकते , प्रेमास्पद शब्द का अर्थ है प्रेम का जो खजांची हो , जिसके पास प्रेम हो। जिसके पास धन हो वो धनी कहलाता है , जिसके पास गुण हो वो गुणी कहलाता है। उसी प्रकार जिसके पास प्रेमधन हो , दिव्य प्रेम , वो प्रिय कहलाता है। उससे प्यार करना है हमको।
!! जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज !!
मन की निर्मलता की कसौटी है ,भगवत-विषय में मन का लगाव। यह कसौटी
श्रेष्ठ हैं । ईश्वरीय तत्व को पाने के लिये हमारे मन मे कितनी छ्टपटाहट है, यहि मन की निर्मलता की सबसे बडी कसौटी है।
..........श्री महाराजजी।
मन की  निर्मलता की कसौटी है ,भगवत-विषय में मन का लगाव। यह कसौटी
श्रेष्ठ हैं । ईश्वरीय  तत्व को पाने के लिये हमारे मन मे कितनी छ्टपटाहट है, यहि मन की निर्मलता की सबसे बडी कसौटी है।
..........श्री महाराजजी।
The body is like the clothes we wear. When the clothes get old and worn out, we discard those and wear new ones, in a similar manner we discard our bodies and get into new ones. We have to realize that we are not our body, we are souls and the soul longs for God but we do not realize this because we think of ourselves as the body and not the soul.
The body is like the clothes we wear. When the clothes get old and worn out, we discard those and wear new ones, in a similar manner we discard our bodies and get into new ones. We have to realize that we are not our body, we are souls and the soul longs for God but we do not realize this because we think of ourselves as the body and not the soul.
When you start practicing 'remembrance' and 'chanting meditation' according to the instructions of Jagadguru Shri Kripaluji Maharaj,your heart begins to open up and surge of divine love energy permeates your whole being,bringing contentment,confidence and security in your life.
RADHEY-RADHEY.
ज़ीरो में गुणा करो चाहे ज़ीरो से, चाहे करोड़ से ,जवाब ज़ीरो ही आयेगा। ऐसे ही बिना मन के कोई भी इंद्रिय की कोई भी साधना लिखी नहीं जायेगी साधना मानी नहीं जायेगी। उसको एक्टिंग कहते हैं और भगवान से एक्टिंग करना, यह सबसे बुरी बात है। संसार में करो ठीक है। वह तो एक्टिंग की जगह है ही। वहाँ तो फ़ैक्ट करते हो और जहां फ़ैक्ट करना है वहाँ एक्टिंग करते हो ,लापरवाही करते हो,ये अच्छा नहीं है।
-------जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाप्रभु।
ज़ीरो में गुणा करो चाहे ज़ीरो से, चाहे करोड़ से ,जवाब ज़ीरो ही आयेगा। ऐसे ही बिना मन के कोई भी इंद्रिय की कोई भी साधना लिखी नहीं जायेगी साधना मानी नहीं जायेगी। उसको एक्टिंग कहते हैं और भगवान से एक्टिंग करना, यह सबसे बुरी बात है। संसार में करो ठीक है। वह तो एक्टिंग की जगह है ही। वहाँ तो फ़ैक्ट करते हो और जहां फ़ैक्ट करना है वहाँ एक्टिंग करते हो ,लापरवाही करते हो,ये अच्छा नहीं है।
-------जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाप्रभु।

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...