Saturday, June 8, 2013

आवृत्ति रसकृदुपदेशात...................

बार-बार सुनो,बार-बार सुनो, तब तत्त्वज्ञान परिपक्व होगा। ये जो हम लोगों को भ्रम होता है कि यह तो मैंने बहुत सुना है, ये तो मैं जानता हूँ। यह बहुत बड़ी भूल है। बार-बार सुनो। इससे दो लाभ हैं। बार-बार सुनने से तत्त्वज्ञान परिपक्व होगा ही दूसरे जिस समय हम उपदेश सुनते हैं, उस समय हमारी चित्तवृत्ति जिस प्रकार की होती है, उसी प्रकार से हम उपदेश ग्रहण करते हैं। अगर उस समय हमारी श्रद्धा 50 प्रतिशत है तो 50 प्रतिशत लाभ होगा, 60 है तो 60, यदि श्रद्धा 80 प्रतिशत है तो 80 प्रतिशत लाभ होगा और श्रद्धा अगर सेंट-परसेंट(cent-percent) है तो उसी समय ही हमारा काम बन जायेगा।


जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज।
तृष्णा की नदी गहरी है, शरीर रूपी नाव जीर्ण है, अतएव बिना कुशल नाविक सद्गुरु के तुम भवसागर से कैसे पार उतरोगे। सद्गुरु की शरण ही संसार -सागर से बचाने वाली है।
प्रिया प्रियतम का रूपध्यान करते हुये उनके नाम ,रूप ,लीला , गुण ,धाम आदि का रो रो कर गायन करो !
!! जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज !!
संसारी कामनाओं का कारण है अज्ञान, अज्ञान का कारण है माया और माया का कारण है भगवद बहिर्मुखता !!
**जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज **
भगवदविषय की प्यास ही किशोरी जी का रूप है।
-----श्री महाराजजी।
' गु ' शब्द का अर्थ माया का अन्धकार ,
' रु ' शब्द का अर्थ नाश करना है !
अर्थात जो माया रूपी अन्धकार का नाश करे दे वही गुरु है !
.... जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज .
अगर कोई गलती हमसे हुई भी है तो भविष्य में अब गलती न करें , ये प्रतिज्ञापूर्वक चिंतन के द्वारा ठीक कर लें। तो ये प्राप्त कृपाओं का बार - बार चिंतन करना ही निराशा से बचने का इलाज है।
----श्री महाराज जी।

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...