Saturday, June 8, 2013

हमारे श्री महाराजजी कलिमल ग्रसित अधम जीवों को भी सचमुच बरबस ब्रजरस में सराबोर करना चाहते हैं। उनके श्रीमुख से नि:सृत संकीर्तन ब्रज रस ही है, पीने वाला होना चाहिये। श्री महाराजजी की रचनाओं में निहित रस का रसास्वादन तो कोई रसिक ही कर सकता है, फिर भी हम जैसे पतित जीव भी इतना तो महसूस करते ही हैं कि ऐसा रस कभी नहीं मिला।

-------बोलिये रसिक-शिरोमणि भगवान श्री कृपालुजी महाराज की जय.....
Be a lover of God, not of the world. Do not beg your God and Master for health, wealth and material goods. When you bow to God but desire the world, you prove that you love not the Creator, but His creation. If you insist on asking God for something, ask the same thing as Prahlad: "God! Kindly destroy the very seed of desire that exists in my heart."
- shri Maharajji.
केवल भजन कीर्तन पूजापाठ नाम जप तप इत्यादि करने से काम नहीं बनेगा। गान तो गवैये भी करते है लेकिन उनको भगवतप्राप्ति नहीं होती। अतएव गुणगान करते समाये तदनुसार भाव भी लाओ । जैसे हम वस्तुत: अधम है ,पतित है ,अनंत जन्मो के किए पापो की गठरी सिर पर लिए है । और वे अकारण करुण,भक्त वत्सल ,पतित-पावन अधम-उधारनहार आदि हैं।

जगद्गुरु श्री कृपालु महाप्रभु।
1 - ये पहले जगद्गुरु हैं जिनका कोई गुरु नहीं है और वे स्वयं जगद्गुरुतम हैं !
2 - ये पहले जगद्गुरु हैं जिन्होंने एक भी शिष्य नहीं बनाया किन्तु इनके लाखों अनुयायी हैं !
3 - ये पहले जगद्गुरु हैं जिनके जीवन कल में ही जगद्गुरुतम उपाधि की पचासवीं वर्षगाँठ मनाई गई हो !
4 - ये पहले जगद्गुरु हैं जिन्होंने ज्ञान एवं भक्ति दोनों में सर्वोच्चता प्राप्त की व् दोनों का मुक्तहस्त से दान कर रहे हैं !
5- ये पहले जगद्गुरु हैं जो विदेशों में भी स्वयं प्रचाराथ्र गये !
6- ये पहले जगद्गुरु हैं जिन्होंने पुरे विश्व में श्री राधाकृष्ण की माधुर्य भक्ति का धुआंधार प्रचार किया एवं सुमधुर श्री राधे नाम को विश्वव्यापी बना दिया !
7- सभी महान सन्तों ने मन से ईश्वर भक्ति की बात बतायी है , जिसे , ध्यान , सुमिरन , स्मरण या मेडीटेशन आदि नामों से बताया गया है ! श्री कृपालु जी ने प्रथम बार एस ध्यान को ' रूपध्यान ' नाम देकर स्पष्ट किया कि ध्यान कि सार्थकता तभी है जब हम भगवान् के किसी मनोवांछित रूप का चयन करके उस रूप पर ही मन को टिकाये रहें ! मन को भगवान् के किसी एक रूप पर केन्द्रित करने का नाम ही ध्यान या मन से भक्ति करना है , क्योंकि भगवान् के ही एक रूप पर मन को न टिकने से , मन यत्रतत्र संसार में ही भागता रहेगा ! भगवान् को तो देखा नहीं तो फिर उनके रूप का ध्यान कैसे किया जय , उसका क्या विज्ञान है , उसका अभ्यास कैसे करना है , आदि बातों को - भक्तिरसामृत सिन्धु , नारद भक्ति सूत्र , ब्रह्मसूत्र आदि के द्वारा प्रमाणित करते हुए श्री कृपालु जी महाराज ने प्रथम बार अपने ग्रन्थ ' प्रेम रस सिद्धान्त ' में बड़े स्पष्ट रूप से समझाया है !

8- ये पहले जगद्गुरु हैं जो ९० वर्ष की आयु में भी समस्त उपनिषदों , भगवतादी पुराणों , ब्रह्मसूत्र , गीता आदि प्रमाणों के नम्बर इतनी तेज गति से बोलते हैं कि श्रोताओं को स्वीकार करना पड़ता है कि ये श्रोत्रिय ब्रह्मनिष्ठ के मूर्तिमान स्वरूप हैं !
भक्तों की बाहरी क्रियाओं पर कभी ध्यान नहीं देना चाहिये ! बाहर का व्यवहार , चेष्टा , क्रिया देखकर भ्रम हो सकता ! स्वयं को छिपाने के लिये अथवा साधक की मन , बुद्धि की शरणागति की परीक्षा लेने के लिये महापुरुष विपरीत क्रिया एवं चेष्टा भी करते हैं ! अतः महापुरुष की आन्तरिक स्तिथि पर ही ध्यान देना चाहिये !
~~~~जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज~~~~
सर्व वेदान्त सार गोविन्द राधे ।
श्री कृष्ण भक्त्ति वेदव्यास बता दे ॥

Ved Vyasa tells (in the Bhagawatam) that the essence of all the scriptures and all the scriptural knowledges and its related practice is BHAKTI; which is lovingly longing for the vision and love of your beloved God,Krishn, with a dedicated heart and faithful mind while remembering and chanting His name and the leelas, and feelings His 'personal presence' in close proximity with your own being.

-राधा गोविन्द गीत (पद - 3649)
-जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज.
हमसे तो कुछ होता नहीं। यह जो बैठे-बैठे निराशा का चिन्तन करते हो, यही सर्वनाश करता है। निराशा गुरु की शक्ति का अपमान है। निराशा तब होती है जब शरणागत यह सोचता है कि हमारा गुरु हमारी रक्षा नहीं कर रहा है न भविष्य में करेगा। वह रक्षा करने में असमर्थ है। स्वयं से पूछो क्या ऐसा है?
........श्री महाराजजी।

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...