Saturday, June 8, 2013

बार - बार हम अपराध किये जाते है वह हमारी चोरी को पकड़ भी लेते है फिर भी कृपा करने को तैयार रहते है हमेशा। ''इतनी बड़ी कृपा '' एक बार संसार में कोई नौकर चोरी में पकड़ा जाय रँगे हाथों फिर वह नौकर चाहे जितनी ईमानदारी करे , मालिक उसे क्षमा नहीं करता , तुरंत बाहर निकाल देता है। लेकिन अनंत बार चोरी करते हुये पकड़ा हुआ जीव जब सच्चे ह्रदय से फिर क्षमा माँग कर शरणागत होना चाहता है तो महापुरुष पुनः गले लगा लेते है।
~~~~ जगद्गुरु श्री कृपालु महाप्रभु जी~~~~
भक्त्ति का मार्ग सरल गोविन्द राधे ।
नाव पर बैठो हरि पार करा दे ॥

The path of Bhakti is so simple that you simply sit in the boat of Bhakti and Krishn will navigate you to his Divine abode.

-राधा गोविन्द गीत (पद - 2531)
-जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज.
मसूरी लीला.........साधक-श्री महाराजजी संवाद।

एक बार एक सत्संगी ने श्री महाराजजी से पूछा कि हम संसार के लोगों को बाकी सभी प्रश्नों के उत्तर तो दे देते हैं किन्तु एक प्रश्न का उत्तर नहीं दे पाते। जब लोग हमसे बहस करते हैं कि रामजी, कृष्णजी,और गौरांग महाप्रभु जी के गुरु थे,तो फिर तुम्हारे गुरु (श्री महाराजजी) के कोई गुरु क्यों नहीं है?

श्री महाराजजी: अरे! तो तुम कह दो न की उनके भी गुरु हैं।

सत्संगी: महाराजजी,लेकिन आपके गुरु तो कोई भी नहीं है।

महाराजजी: हैं.....हैं .....पर बताएँगे नहीं।

सत्संगी: महाराजजी,प्लीज बताइये न?

महाराजजी: जब प्रचारक लोग प्रवचन करते हैं और सत्संगी फिर उनसे जुडते हैं और बाद में ये प्रचारक लोग बताते हैं कि हमारे गुरु 'जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज' हैं। तो सब उन लोगों को छोड़ के मेरे पास आ जाते हैं। इसलिए अगर मैं भी अपने गुरु का नाम बता दूँगा तो तुम लोग भी मुझे छोड़ के उनके पास चले जाओगे, और मैं अकेले बैठा रह जाऊँगा मसूरी में।

थोड़ी देर बाद सिद्धान्त समझाया कि देखो दो प्रकार के महापुरुष होते हैं एक साधन सिद्ध,और एक नित्य सिद्ध। तो साधन सिद्ध को तो गुरु बनाना ही पड़ता है लेकिन नित्य सिद्ध महापुरुष को कोई आवश्यकता नहीं है,फिर भी चाहे तो बना सकते हैं।

इसके बाद फ़िर मज़ाक करते हुए बोले: हमारे भी गुरु हैं पर बताएँगे नहीं।

जय हो ऐसे विनोदी स्वभाव वाले श्री कृपालुजी महाप्रभु की।

*************राधे-राधे**************
प्रिया प्रियतम का रूपध्यान करते हुये उनके नाम ,रूप ,लीला , गुण ,धाम आदि का रो रो कर गायन करो !

....जगद्गुरुत्तम श्री कृपालु महाप्रभु.
The most invaluable treasure attainable in the human form is Selfless Divine Love. This Divine love is the culmination of all spiritual knowledge. It is experienced not through the intellect, but through the heart. When our heart melts for our Beloved Lord, an intense longing for His Divine Vision develops. This cleanses the mirror of the mind and destroys its negativities. The consciousness is united with God in love, and the devotee experiences perfect Bliss.
........SHRI MAHARAJJI.
साधक को भगवान से विमुख करने वाला सबसे महान शत्रु कुसंग ही है। साधक को इसलिये साधना से भी अधिक दृष्टिकोण कुसंग से बचने पर रखना चाहिये। भगवननाम संकीर्तन रूपी औषधि के साथ-साथ कुसंग रूपी कुपथ्य से परहेज भी करते रहें तो रोग ठीक हो जायेगा और हम अपने परमचरम लक्ष्य तक पहुँच पायेंगे।
------जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज।
गुरु द्वारा दिया गया 'तत्त्वज्ञान' हमारे लिये रिवॉल्वर का काम करेगा। बड़ा भारी पहलवान आ रहा है वह हमें मार देगा। अरे! क्या मार देगा। रिवॉल्वर जेब में है तो भागेगा डर के मारे वो पहलवान। तो वो शक्ति है गुरु के उपदेश में कि संसार की बड़ी से बड़ी कठिन परिस्थिति का सामना भी आसानी से कर सकते हो। गुरु की आज्ञा का अगर हम पालन करते तो हम लापरवाही न करते। इसलिए अपने पतन में हम स्वयं कारण है, हमारी बुद्धि, हमारी लापरवाही और उत्थान में गुरु कृपा मानो ,हमारी बुद्धि से उत्थान कभी नहीं हुआ आजतक न होगा ,हमारी बुद्धि तो मायिक है ये तो ईश्वरीय बुद्धि महापुरुष ने दान दी कि ऐसा करो, ऐसा करो, ऐसा न करो, इस बुद्धि के दान के द्वारा भगवननाम लिया, भगवान के लिये आँसू बहाया जो कुछ भी अच्छी चीजें हमारे पास आई वो महापुरुष के द्वारा ही आई। उसकी कृपा से अच्छे काम हो रहें है और गलत काम इसलिए हो रहें है कि महापुरुष के आदेश को, उपदेश को छोड़ दिया और अपनी बुद्धि के बल पर आ गये तो हमारी बुद्धि तो गड़बड़ ही थी, उसने हमें गड़बड़ में डाल दिया बस अब मर गये, अब हम दोष दे रहें है महापुरुष को, भगवान को, इसलिए सदा यह ज्ञान रहना चाहिए कि अच्छे कार्य उनकी ही कृपा से हो रहें है लेकिन गलत कार्य में अपना दोष ही समझना चाहिये क्योकि हमने उनके आदेशों का उल्लंघन किया लापरवाही की और अपनी बुद्धि के बल पर हमने कार्य किया इसलिए पतन हो गया हमारा।
-------जगद्गुरुत्तम श्री कृपालुजी महाराज।

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...