Saturday, June 15, 2013

संसारी दोष कितने कम हुए, हमे इस पर हर समय दृष्टि रखनी है । हमारे स्वभाव मेँ अहमता, ममता कितनी कम हुई ,इस और ध्यान देना है । स्वाभिमान कितना कम हुआ,अपने अपमान का अनुभव होना कितना कम हुआ,आत्म-प्रशंसा कितनी अचछी लगती है । संसारी विषयों के अभाव मेँ कितना दुख होता है,उनके मिलने मेँ कितना सुख मिलता है, यह सब अपनी आध्यात्मिक उन्नति को नापने का सबसे बढ़िया पैमाना है।
------जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज।
भगवान् का जब सगुण साकार होता है तो अपना नाम , रूप , लीला , गुण , धाम यह वह छोड़ जाते हैं जिसका अवल्बन लेकर अनन्तानन्त जीव भगवान् के प्रेमानंद को प्राप्त होते हैं उदारहणार्थ अगर श्रीकृष्ण का अवतार न होता तो शुकदेव श्रीकृष्ण के लिए व्याकुल न होते जब उन्होंने भगवान् के दयालुता के गुण को सुना कि पूतना जो उन्हें जहर पिलाने लिए गई उसको भी अपना लोक दे दिया। वे तुरंत व्याकुल हो गये। जीवन्मुक्त होने पर भी वे पहली कक्षा में पहुँच गये। भागवत को सुना और परीक्षित को सुनाया। बिना सगुण साकार अवतार लिए भगवान् के सगुण साकार नाम , रूप , लीला ,धाम का विस्तार हमको न मिलता। और बिना इसके प्राप्त हुए घोर मायाबद्ध जीव किस प्रकार भगवत्प्राप्ति करते इसलिए जीव कल्याण के लिए ही भगवान् का अवतार होता है।
-----जगद्गुरु श्री कृपालु महाप्रभु जी की जय हो......
अपना प्रत्येक कार्य करते समय सदा यही विश्वास रखो कि मेरे प्रत्येक कार्य को महाराजजी देख रहें हैं। और वो तो वास्तव में देख ही रहें हैं, हमें realize करना होगा बस।
हमरी ओर टुक हेरो री किशोरी राधे |
यद्यपि भलीभांति हौं जानत, तुम बिनु हितू न मेरो री किशोरी राधे |
तदपि रसिक जन कही न मानत, रहत विषय को चेरो री किशोरी राधे |
परनिंदा परदोष कथन में, चतुर विचित्र चितेरो री किशोरी राधे |
करत नाम अपराध निरंतर, हिय हंकार घनेरो री किशोरी राधे |
बात बनावत ब्रज रसिकन की, मन कामादि बसेरो री किशोरी राधे |
नाम ‘कृपालु’ काम तुम जानति, भलो बुरो जस तेरो री किशोरी राधे ||

भावार्थ - हे वृषभानुनंदिनी राधे ! थोड़ा इस अधम की ओर भी अपनी कृपा - कटाक्ष युक्त दृष्टि डालिए | यद्यपि मैं यह बात पूर्ण रूप से जानता हूँ कि तुम्हारे बिना मेरा कोई भी हितैषी नहीं | तुम ही एकमात्र मुझ अगति की गति हो तथापि महापुरुषों के बताये हुए आदेशों का परिपालन नहीं करता वरन् सांसारिक विषयों का दास ही बना रहता हूँ | दूसरों की निन्दा एवं दोषों के प्रकट करने में मैं एक अद्भुत चित्रकार की भाँति अत्यन्त निपुण हूँ | देहाभिमान के कारण अपनी अहंकारपूर्ण बुद्धि से लोकातीत महापुरुषों में भी दोष निकालते हुए, सर्वदा नामापराध - स्वरूप अक्षम्य पाप करता रहता हूँ | महापुरुषों में भी सर्वश्रेष्ठ ब्रज रसिकों की सी बातें बघारा करता हूँ, किन्तु हृदय में काम, क्रोध, लोभ आदि दोषों को स्थिर रूप से बसाये रहता हूँ | मेरा नाम तो ‘श्री कृपालु जी’ (कृपा करने वाला) है किन्तु कार्य तो तुम भली - भाँति जानती ही हो फिर भी अच्छा - बुरा मैं जैसा भी हूँ केवल तुम्हारा ही तो हूँ |

( प्रेम रस मदिरा दैन्य - माधुरी ).
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज.
सर्वाधिकार सुरक्षित - राधा गोविन्द समिति.
करोड़ों कल्प चौरासी लाख में घूमना पड़ेगा। अनन्त जन्म घूम चुके , आगे भी घूमना पड़ेगा। हमारी जिद्द नहीं काम देगी। ए जी ---हम झगड़े में नहीं पड़ते। जो मन में आता है वो करते हैं। ठीक है।।
जीव कर्म करने में स्वतन्त्र है। मन में आये सो करते जाओ लेकिन फल भोगने में परतंत्र है। फल भोगना पड़ेगा , भगवान् के अनुशासन के अनुसार। वहाँ नहीं चलेगी।
हम नहीं भोगते जी ......... न --जो जस करइ सो तस फल चाखा।
इसलिए सावधान होकर उधार न कर के हम लोगों को साधना में तत्पर हो करके अपने लक्ष्य को प्राप्त करना चाहिए।
-----जगद्गुरु श्री कृपालु महाप्रभु जी।
जीवन वही है जो गुरु सेवा में ही लगा रहे।
-----श्री महाराजजी।
"तू प्रेम रूप रस सार। तेरा अंधाधुंध दरबार।।
तू तो करुणा की अवतार। तू है कृपा रूप साकार।।"

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...