Thursday, June 20, 2013

Shri Krishna gives us his assurance in the Gita (9.22) "I take full responsibility and personally attends to the needs of those who constantly remember Me and exclusively love Me."
हे करुणासिन्धु, दीनबंधु, मेरे बलबंधु तुम अपनी अकारण करुणा का स्वरूप प्रकट करते हुए मुझे अपना लो। मैं तो अनन्त जन्मों का पापी हूँ किन्तु तुम तो पतितपावन हो। यही सोचकर तुम्हारे द्वार पर आ गया।
-------श्री महाराजजी।
अन्दर न जाने दें गन्दी चीज़। अन्दर तो केवल भगवान् , उनका नाम , उनका गुण , उनका रूप , उनकी लीला , उनका धाम , उनके संत बस इतने हमारे अंतःकरण में जायें। बाकी को बाहर रखें। चारों ऒर बिठा लो अपने कोई बात नहीं। अन्दर न जाने दो। नहीं तो वैसे ही मन गन्दा है और हो जायेगा। परत की परत मैल जम जायेगी उसमें। यानी प्यार भगवान् के क्षेत्र में ही हो। व्यवहार संसार भर में हो।
~~~~~जगद्गुरु श्री कृपालु महाप्रभु~~~~~
हम शिष्य भी नहीं बनाते एवं समपरदाय भी नहीं चलाते।
यह सब मेरे मत से उचित नहीं हैं। संपरदायों से परस्पर द्वेष फैलता है। मैं सभी संपरदायचार्यों के सिद्धांतों का पूरा समन्वय करता हूँ।
------जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज।
साधक को भगवान से विमुख करने वाला सबसे महान शत्रु कुसंग ही है। साधक को इसलिये साधना से भी अधिक दृष्टिकोण कुसंग से बचने पर रखना चाहिये। भगवननाम संकीर्तन रूपी औषधि के साथ-साथ कुसंग रूपी कुपथ्य से परहेज भी करते रहें तो रोग ठीक हो जायेगा और हम अपने परमचरम लक्ष्य तक पहुँच पायेंगे।
------जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज।
When the soul unites with God, the intervening power maya is removed forever and God directly controls the soul, the intellect, mind and senses. In other words, whatever a Saint is seen to be doing, is only the consequence of divine inspiration. The individual is selfishly motivated until he attains his goal, but once he attains divine bliss there is no reason to perform any action. Therefore, whatever actions a Saint performs are inspired by God and so are praiseworthy. It is only God who knows why He makes the Saints perform ‘good’ or ‘bad’ actions.
----------JAGADGURU SHRI KRIPALU JI MAHARAJ.
श्री महाराज जी द्वारा .......... मेरे प्रिय साधक .....
श्री कृष्ण ही समस्त जीवों के अंशी एवं जीव उनके अंश हैं। अतएव जीव का चरम लक्ष यही है कि अपने अंशी ( स्वामी , सखा तथा सर्वस्व ) की नित्य दासता प्राप्त करें।
वह कैंकर्य उनके दिव्य प्रेम ( श्री कृष्ण की सबसे अंतरंग शक्ति ) से ही प्राप्त होगा।
वह दिव्य प्रेम किसी रसिक प्रेमी गुरु से ही मिलेगा।
वह गुरु साधक की अंतःकरण शुद्धि पर ही प्रेमदान करेगा।
वह अंतःकरण शुद्धि गुरु की बतायी साधना से ही होगी।
अतएव प्रथम जीव को गुरु - कृपा प्राप्ति हेतु साधना करनी है।

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...