Thursday, June 20, 2013

श्री महाराज जी द्वारा .......... मेरे प्रिय साधक .....
श्री कृष्ण ही समस्त जीवों के अंशी एवं जीव उनके अंश हैं। अतएव जीव का चरम लक्ष यही है कि अपने अंशी ( स्वामी , सखा तथा सर्वस्व ) की नित्य दासता प्राप्त करें।
वह कैंकर्य उनके दिव्य प्रेम ( श्री कृष्ण की सबसे अंतरंग शक्ति ) से ही प्राप्त होगा।
वह दिव्य प्रेम किसी रसिक प्रेमी गुरु से ही मिलेगा।
वह गुरु साधक की अंतःकरण शुद्धि पर ही प्रेमदान करेगा।
वह अंतःकरण शुद्धि गुरु की बतायी साधना से ही होगी।
अतएव प्रथम जीव को गुरु - कृपा प्राप्ति हेतु साधना करनी है।
श्री कृपालु जी महाराज के मुखारविंद से:-

जो आदेश मैंने तुमको दिया है: दीनता, मधुरभाषण, नम्रता , उनका पालन तुम लोग अभी नहीं कर रहे हो। एक भिक्षा माँग रहा हूँ, तुम लोग लापरवाही कर रहे हो, यह बुरी बात है।
ज्ञान की परिभाषा गोविंद राधे।
जिससे बढ़े नित प्रेम श्याम का बता दे।।

कोटि कल्प सिर मारे गोविंद राधे।
भक्ति बिनु ब्रह्म ज्ञान हो ना बता दे।।

भक्ति बिनु ज्ञानी ज्ञान गोविंद राधे।
मिथ्या ज्ञानाभिमान बढ़ा दे।।

ज्ञान वैराग्य दोनों गोविंद राधे।
भक्ति महारानी के पुत्र हैं बता दे।।

भक्ति का मार्ग सरल गोविंद राधे।
नाव पर बैठो हरि पार करा दे।।

सर्व वेदान्त सार गोविंद राधे।
श्रीकृष्ण भक्ति वेदव्यास बता दे।।

प्रेम की सीमा नहीं गोविंद राधे।
किन्तु बढ़ता ही जाये सर्वदा बता दे।।

-----जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाप्रभु।
ज्ञान की परिभाषा गोविंद राधे।
जिससे बढ़े नित प्रेम श्याम का बता दे।।

कोटि कल्प सिर मारे गोविंद राधे।
भक्ति बिनु ब्रह्म ज्ञान हो ना बता दे।।

भक्ति बिनु ज्ञानी ज्ञान गोविंद राधे।
मिथ्या ज्ञानाभिमान बढ़ा दे।।

ज्ञान वैराग्य दोनों गोविंद राधे।
भक्ति महारानी के पुत्र हैं बता दे।।

भक्ति का मार्ग सरल गोविंद राधे।
नाव पर बैठो हरि पार करा दे।।

सर्व वेदान्त सार गोविंद राधे।
श्रीकृष्ण भक्ति वेदव्यास बता दे।।

प्रेम की सीमा नहीं गोविंद राधे।
किन्तु बढ़ता ही जाये सर्वदा बता दे।।

-----जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाप्रभु।
Devotion to Shri Krishna must be exclusive. The attachment of the mind must be reserved for God while worldly duties are being performed externally. The performance of any work requires involvement of the mind, not attachment of the mind.
..........SHRI MAHARAJJI.
अपनी भावना के अनुसार ही हम भगवान और संत को देखते हैं और उसी भावना के अनुसार फल मिलता है। एक भगवतप्राप्ति कर लेता है और एक नामापराध कमा के लौट आता है। और पाप कमा लेता है भगवान के पास जाकर, संत के पा
स जाकर 'ये तो ऐसा लगता है, मेरा ख्याल है कि'.......ये अपना ख्याल लगाता है वहाँ। अरे पहले दो-दो रुपए के स्वार्थ साधने वाले,झूठ बोलने वाले, अपने माँ, बाप ,बीबी को तो समझ नहीं सके तुम और संत और भगवान को समझने जा रहे हो। कहाँ जा रहे हो। हैसियत क्या है तुम्हारी, बुद्धि तो मायिक है। एक ए,बी,सी,डी.......पढ़ने वाला बच्चा प्रोफेसर की परीक्षा ले रहा है कि में देखूंगा प्रोफेसर कितना काबिल है। अरे क्या देखेगा तू तो ए,बी,सी........नहीं जानता। अपनी नॉलेज को पहले देख। अपनी योग्यता को पहले देख। तो इसलिए जिसकी जैसी भावना होती है वैसा ही फल अवतार काल में भी मिलता है अधिक नहीं मिलता।
--------जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज।
People say "Ram Nam Satya hai" (the name of God Ram is the only truth) when they accompany a dead body for cremation. But as soon as they return home (from the cremation ground) they still believe that the wordly attainments are the only truth.

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...