This Blog is dedicated to the Lotus Feet of my Spiritual Master - Jagadguru Shri Kripaluji Maharaj, who is the Descension of the Bliss of Divine Love, who is illuminating the entire world with light of His Vedic and Yogic knowledge of our Scriptures. Jai Shree Radhey!!!
Thursday, June 20, 2013
अन्दर
न जाने दें गन्दी चीज़। अन्दर तो केवल भगवान् , उनका नाम , उनका गुण ,
उनका रूप , उनकी लीला , उनका धाम , उनके संत बस इतने हमारे अंतःकरण में
जायें। बाकी को बाहर रखें। चारों ऒर बिठा लो अपने कोई बात नहीं। अन्दर न
जाने दो। नहीं तो वैसे ही मन गन्दा है और हो जायेगा। परत की परत मैल जम
जायेगी उसमें। यानी प्यार भगवान् के क्षेत्र में ही हो। व्यवहार संसार भर
में हो।
~~~~~जगद्गुरु श्री कृपालु महाप्रभु~~~~~
~~~~~जगद्गुरु श्री कृपालु महाप्रभु~~~~~
साधक
को भगवान से विमुख करने वाला सबसे महान शत्रु कुसंग ही है। साधक को इसलिये
साधना से भी अधिक दृष्टिकोण कुसंग से बचने पर रखना चाहिये। भगवननाम
संकीर्तन रूपी औषधि के साथ-साथ कुसंग रूपी कुपथ्य से परहेज भी करते रहें तो
रोग ठीक हो जायेगा और हम अपने परमचरम लक्ष्य तक पहुँच पायेंगे।
------जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज।
------जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज।
When
the soul unites with God, the intervening power maya is removed forever
and God directly controls the soul, the intellect, mind and senses. In
other words, whatever a Saint is seen to be doing, is only the
consequence of divine inspiration. The individual is selfishly motivated
until he attains his goal, but once he attains divine bliss there is no
reason to perform any action. Therefore, whatever actions a Saint
performs are inspired by God and so are praiseworthy. It is only God who
knows why He makes the Saints perform ‘good’ or ‘bad’ actions.
----------JAGADGURU SHRI KRIPALU JI MAHARAJ.
----------JAGADGURU SHRI KRIPALU JI MAHARAJ.
श्री महाराज जी द्वारा .......... मेरे प्रिय साधक .....
श्री कृष्ण ही समस्त जीवों के अंशी एवं जीव उनके अंश हैं। अतएव जीव का चरम
लक्ष यही है कि अपने अंशी ( स्वामी , सखा तथा सर्वस्व ) की नित्य दासता
प्राप्त करें।
वह कैंकर्य उनके दिव्य प्रेम ( श्री कृष्ण की सबसे अंतरंग शक्ति ) से ही प्राप्त होगा।
वह दिव्य प्रेम किसी रसिक प्रेमी गुरु से ही मिलेगा।
वह गुरु साधक की अंतःकरण शुद्धि पर ही प्रेमदान करेगा।
वह अंतःकरण शुद्धि गुरु की बतायी साधना से ही होगी।
अतएव प्रथम जीव को गुरु - कृपा प्राप्ति हेतु साधना करनी है।
श्री कृष्ण ही समस्त जीवों के अंशी एवं जीव उनके अंश हैं। अतएव जीव का चरम लक्ष यही है कि अपने अंशी ( स्वामी , सखा तथा सर्वस्व ) की नित्य दासता प्राप्त करें।
वह कैंकर्य उनके दिव्य प्रेम ( श्री कृष्ण की सबसे अंतरंग शक्ति ) से ही प्राप्त होगा।
वह दिव्य प्रेम किसी रसिक प्रेमी गुरु से ही मिलेगा।
वह गुरु साधक की अंतःकरण शुद्धि पर ही प्रेमदान करेगा।
वह अंतःकरण शुद्धि गुरु की बतायी साधना से ही होगी।
अतएव प्रथम जीव को गुरु - कृपा प्राप्ति हेतु साधना करनी है।
Subscribe to:
Posts (Atom)
मन का अटैचमेंट किसमें करें?
एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...
-
Baar Baar suno, Baar Baar suno, tab tatvagyan paripakva hoga. Ye jo hum Logo ko Brham hota hai ki yeh to maine bahut suna hai, yeh to mein j...
-
गुरु में हरिबुद्धि रखो सदा गुरुधामा | नरबुद्धि आने नहिं पाये आठु यामा || गुरु के प्रति सदैव भगवद् बुद्धि ही रखो | निरन्तर यह सावधानी र...
-
ए # मनुष्यों ! # मानव_देह प्राप्त हुआ है , # भगवतप्राप्ति के लिये केवल, इसकाे मत गँवाओ, व्यर्थ # भाेग_विलास में केवल लिप्त रह कर...






