Thursday, June 20, 2013

एक साधक का प्रश्न :- शरीर न चले तो साधना कैसे हो ?

श्री महाराज द्वारा उत्तर :- साधना माने मन साधना। साधना मन को ही करनी है। कैंसर का मरीज़ सोचता है -मैं मर जाऊंगा तो मेरी गृहस्थी का कय होगा आदि। इसमें शरीर नहीं थक रहा है। मन का वर्क हो रहा है। जब कोई शरीर के महत्व को सोचने के स्थान पर सोचेगा " मेरा ( जीवात्मा ) का क्या होगा , श्याम सुन्दर मुझे नहीं मिले , यह सोचकर आंसू बहाता रहेगा। अगर नींद आ गयी तो समझो इम्पोर्टेंस नहीं समझा।"
------------जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।
श्याम ही है मेरो यार.......श्याम ही है मेरो प्यार.....श्याम ही समायों हैं .......'कृपालु' तन मन!!!
औरन को गुरु हो या न हो।
गुरु मेरो कृपालु सुभाग हमारो ॥

सम्पूर्ण भूमंडल जिनकी दिव्य प्रभा से आलोकित हो रहा है, जिनका अवतरण कलिमल ग्रसित दैहिक,दैविक,भौतिक तापों से तप्त जीवों को श्रीकृष्ण के प्रेमानन्द और् प्रेमा-भक्ति में बरबस
सराबोर करने के लिए ही हुआ है,ऐसे दिव्यातिदिव्य परमपुरुष पंचम मूल जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज के पादपल्लवों में कोटि-कोटि नमन् ।

जिन्होंने काशीपुरी के कई शत प्रकांड विद्वानों के ज्ञान-गर्व का मर्दन कर विश्व को नाना प्रकार के मत-मतांतरों के जाल-फ़ंदों से मुक्त किया है और भगवत्प्राप्ति का प्रमाणित और वैज्ञानिक मार्ग प्रशस्त किया है, ऐसे सन्ताग्रगण्य श्रीकृपालुजी महाराज के वैष्णव अभिवंदित चरणकमलों में हमारे भगवद् सेवा हित होने वाले कोटि-कोटि जन्मों का सानंद समर्पण !

श्रीराधे♥♥राधे♥♥राधे♥♥राधे♥♥राधे♥♥राधे♥राधे♥♥राधे♥♥राधे♥♥राधे♥♥राधे♥♥राधे♥♥राधे♥♥श्रीराधे
हरि एवं गुरु से जितना विशुद्ध प्रेम होगा,उतना ही संसार से सच्चा वैराग्य होगा।
........श्री महाराजजी।
Unless god makes us understand, nothing can be understood.

जब तक भगवान न चाहें, हमारे लिए कुछ भी जानना संभव नहीं।
........श्री महाराजजी।
संसार में न दुख है न सुख, वस्तुत: हमारी काल्पनिक मान्यता का परिणाम ही सुख एवं दुख है।
------श्री कृपालुजी महाप्रभु।
"Whatever is difficult to receive, whatever is unattainable, and whatever is beyond the imagination of the human mind, is all obtained through bhakti. Apart from bhakti to Krishn you do not need to do anything else."
------SHRI MAHARAJJI.

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...