Saturday, June 22, 2013

मायाबद्ध जीव का तो गोविन्द राधे !
तनु छुड्वाया जाय कष्ट हो बता दे !!

भावार्थ - मायाबद्ध जीव को शारीर छोड़ते समय असह पीड़ा होती है ! सहस्त्रों बिच्छुओं के एक साथ काटने से जो पीड़ा होती है वही पीड़ा मायाधीन जीव को मृत्यु के समय होती है ! मायाधीन जीव को शरीर छोड़ने को यमराज विवश करते हैं !
-----जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज .
जगदगुरु श्री कृपालु जी महाराज(श्री महाराजजी) ----एक संक्षिप्त परिचय (रोचक तथ्य सहित).....

गुरु मोर ''कृपालु'' सुनाम के, हैं अद्वितीय ''जगदगुरुत्तम'' एक मात्र भू-धाम के।

जगदगुरु श्री कृपालु जी महाराज वर्तमान काल में मूल जगदगुरु हैं. यों तो भारत के इतिहास में इनके पूर्व लगभग तीन हजार वर्ष में चार और मौलिक जगदगुरु हो चुके हैं। किन्तु श्री कृपालु जी महाराज के जगदगुरु होने में एक अनूठी विशेषता यह है की उन्हें ''जगदगुरुत्तम'' (समस्त जगदगुरुओं में उत्तम) की उपाधि से विभूषित किया गया है।यह अलौकिक और ऐतिहासिक घटना 14 जनवरी सन 1957 को हुयी थी, जब श्री कृपालु जी महाराज जी की आयु केवल 35 वर्ष थी।

श्री महाराज जी का जन्म सन 1922 ई. में शरद पूर्णिमा की मध्य रात्रि में भारत के उत्तर प्रदेश प्रान्त के प्रतापगढ़ जिले के मनगढ़ ग्राम में सर्वोच्च ब्राहमन कुल में हुआ।

जगदगुरु श्री कृपालु जी महाराज की प्रमुख विशेषताएं...............

1. ये पहले जगदगुरु हैं जिनका कोई गुरु नहीं है और वे स्वयं ''जगदगुरुत्तम'' हैं।

2. ये पहले जगदगुरु हैं जिन्होंने एक भी शिष्य नहीं बनाया किन्तु इनके लाखों अनुयायी हैं।

3. ये पहले जगदगुरु हैं जिनके जीवन काल में ही ''जगदगुरुत्तम'' उपाधि की पचासवीं वर्षगाँठ मनाई गयी हो।

4. ये पहले जगदगुरु हैं जिन्होंने ज्ञान एवं भक्ति दोनों में सर्वोच्चता प्राप्त की व् दोनों का मुक्तहस्त दान कर रहे हैं।

5. ये पहले जगदगुरु हैं जिन्होंने पूरे विश्व में श्री राधाकृष्ण की माधुर्य भक्ति का धुंआधार प्रचार किया एवं सुमधुर राधा नाम को विश्वव्यापी बना दिया।

6. सभी महान संतों ने मन से इश्वर भक्ति की बात बताई है, जिसे ध्यान, सुमिरन, स्मरण या मेडिटेशन आदि नामों से बताया गया है। श्री कृपालु जी ने प्रथम बार इस ध्यान को ''रूप ध्यान'' नाम देकर स्पष्ट किया कि ध्यान की सार्थकता तभी है जब हम भगवान् के किसी मनोवांछित रूप का चयन करके उस रूप पर ही मन को टिकाये रहे।

७. ये पहले जगदगुरु हैं जो समुद्र पार, विदेशों में प्रचारार्थ गए।

८. ये पहले जगदगुरु हैं जो 91 वर्ष की आयु में भी समस्त उपनिषदों, भागवतादि पुरानों, ब्रम्ह्सुत्र, गीता आदि प्रमाणों के नंबर इतनी तेज गति से बोलते हैं की श्रोताओं को स्वीकार करना पड़ता है की ये श्रोत्रिय ब्रम्हनिष्ठ के मूर्तिमान स्वरुप हैं।

प्राक्तन में महारासिकों ने जिस ब्रज रस की वर्षा की है उसी ब्रज रस को पात्र अपात्र का विचार किये बिना जगदगुरु कृपालु जी सभी को पिला रहे हैं। प्रेमावतार श्री कृपालु जी ने बिना जाति-पांति, साधू, असाधु, पात्र-अपात्र का विचार किये श्रीकृष्ण प्रेम प्रदान कर करुणा की पराकाष्ठा प्रकाशित करके अपने ''कृपालु'' नाम को चरितार्थ कर दिया।

जो सिद्धांत आज से 500 वर्ष पूर्व श्री चैतन्य महाप्रभु ने सिद्धांत रूप में प्रकट किये थे वही अब पूर्ण रूप में प्रकट किये गए हैं। प्रेमाभक्ति के इन दोनों आचार्यों ने श्री राधा नाम सुधा रस जैसे अमूल्य खजाने को बिना किसी मूल्य के जन जन तक पहुचाया है.......श्री कृपालु जी महाराज के द्वारा आचारित, प्रचारित एवं प्रसारित भक्ति एवं प्रेमरस सिद्धांत को देखकर सभी भक्त गुरुदेव को युगलावतार गौरांग महाप्रभु के रूप में ही देखते हैं, जिन जिन सिद्धांतो पर चैतन्य महाप्रभु ने उस अवतार काल में बल दिया और उनकी श्रेष्ठता सिद्ध की, उन्ही को कालान्तर में श्री कृपालु महाराज ने विस्तारित एवं स्थापित किया है।

श्री कृपालु जी का प्रवचन नूतन जलधर की गर्जना के समान है, यह नास्तिकता से पीड़ित मन की व्यथा को हरने वाला है। प्रवचन को सुनकर चित्त रुपी वनस्थली दिव्य भगवदीय ज्ञान के अंकुर को जन्म देती है, कुतर्क युक्त विचारों से विक्षिप्त तथा दुर्भावना से पीड़ित मनुष्यों की रक्षा करने में श्री कृपालु जी महाराज अमृत औषधि के समान हैं। उनकी सदा ही जय हो..............

श्री कृपालु जी महाराज के प्रवचन भारतवर्ष के विभिन्न टी. वी. चैनल्स पर आते हैं। हम सभी धन्य हैं जो श्री कृपालु जी महाराज जैसे अद्वितीय और महारसिक संत आज हमारे बीच हैं, अज्ञानता से भरे हम जन, हम लोगों को निश्चय ही ऐसे दिव्य महापुरुष की शरण में जाकर उनका दिव्य ज्ञान और दिव्य प्रेम रस प्राप्त करना चाहिए, ये महापुरुष हम पर अकारण करुना लुटाने आये हैं, हमें प्रेम रस से भिगोने आये हैं, आइये इनकी शरण में चलकर धन्य हो जाएँ और अपना लक्ष्य प्राप्त करें।

निम्न टी. वी. चैनल्स पर श्री महाराज जी के प्रवचन आते हैं, आप सभी इसका लाभ अवश्य लें......

संस्कार - सोमवार से शनिवार - सुबह 5.30 से 6 .00बजे तक।

साधना - प्रतिदिन सुबह 7 .10 से 7 .40 बजे तक।

जी जागरण - प्रतिदिन शाम 6 .00 से 6 .30 बजे तक।

आस्था - प्रतिदिन शाम 6 .20 से 6 .45 बजे तक।

प्रेम रस सिद्धांत, प्रेम रस मदिरा, ब्रज रस माधुरी, राधा गोविन्द गीत, भक्ति शतक, श्यामा श्याम गीत इत्यादि ग्रन्थ हैं श्री महाराज जी के, जिनमे उन्होंने अपना सारा तत्वज्ञान अति ही सरल और सरस वाणी में प्रस्तुत किया है, जिसमे से ''प्रेम रस सिद्धांत'' तो अद्वितीय है, अन्य ग्रंथो में श्री महाराज जी ने कीर्तन रूप में सारा ब्रज रस उडेला हैं........इस ग्रुप में इन्ही सब ग्रंथो से आपको रोज़ दिव्य ज्ञान उपलब्ध कराया जा रहा है।

आपसे अनुरोध है की ऐसे महापुरुष की दिव्य वाणी से एक बार अवश्य भीगे.........

इस गुरु पूर्णिमा पर( 22 जुलाई,2013) को जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज भक्ति धाम,मनगढ़(इलाहाबाद के निकट) जो की उनकी जन्म भूमि भी है, में रहेंगे, आप सभी वहां उनके सत्संग का लाभ लेकर अपना जीवन धन्य बनाएं........।

कोई भी अन्य जानकारी के लिये इस ग्रुप से जुड़े रहें,औरों को भी इससे जोड़े,जिससे,सभी को अधिकधिक संख्या में श्री महाराजजी के दिव्य ज्ञान का लाभ मिल सके।

****************राधे - राधे*************
अन्दर न जाने दें गन्दी चीज़। अन्दर तो केवल भगवान् , उनका नाम , उनका गुण , उनका रूप , उनकी लीला , उनका धाम , उनके संत बस इतने हमारे अंतःकरण में जायें। बाकी को बाहर रखें। चारों ऒर बिठा लो अपने कोई बात नहीं। अन्दर न जाने दो। नहीं तो वैसे ही मन गन्दा है और हो जायेगा। परत की परत मैल जम जायेगी उसमें। यानी प्यार भगवान् के क्षेत्र में ही हो। व्यवहार संसार भर में हो।
~~~~~जगद्गुरु श्री कृपालु महाप्रभु~~~~~
जिनके चरण कमलों का स्पर्श त्रिगुण , त्रिताप पाप से मुक्ति प्रदान कर श्री राधाकृष्ण का प्रेम प्रदान करता है
ऐसे श्री राधाकृष्ण मूर्तिमान स्वरूप प्रिय गुरुवर को कोटि कोटि प्रणाम !
"This World is like a Marketplace where Merchants from various places keep coming and going. Some People earn here, where as others lose even their capital. Various powerful thieves like Lust, Anger and Greed are to be found here, who rob one of one's earnings. However in this Market it is also possible to attain the priceless gem of divine love, if we understand the importance of Human Life, by practicing devotion to Lord Krishna........"
- Jagadguru Shri Kripaluji Maharaj.
Devotion to Shri Krishna must be exclusive. The attachment of the mind must be reserved for God while worldly duties are being performed externally. The performance of any work requires involvement of the mind, not attachment of the mind.
..........SHRI MAHARAJJI.
"Reserve some time for God every day. Never miss an appointment with Him. Besides, thinking of Him while you perform your daily chores, spend some time alone with Him. Do not think that this is craziness and mere imagination. The fact is that God alone is real, all else is imaginary and also this is the purpose of your Human LIFE. This is the Real Wealth of your life which will go with you after death also."
- Jagadguru Shri Kripaluji Maharaj.

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...